A Dark Secret – Chapter 96
"छोड़ी थी, नहीं छोड़ूँगा," मैंने कहा। "ये चादर वाला हिस्सा अपनी जगह है। मैं इसे छूने नहीं जा रहा। मैं बस अंदर एक बात देखने जा रहा हूँ जो मुझे पहली बार में दिखनी चाहिए थी और नहीं दिखी।"
"क्या?"
"पाइप।"
ट्रक के नीचे टॉर्च लेकर अंदर जाना अलग बात है और ट्रक के नीचे टॉर्च लेकर सोचना अलग बात है। पहली बार में मैं जल्दी में था। मैंने नट देखा, बूँद देखी, चाबी देखी और मैंने अपने आप को जीता हुआ मान लिया।
यही ग़लती थी।
जीत जल्दी मिल जाए, तो समझो अभी लड़ाई शुरू नहीं हुई।
मैं फिर पेट के बल लेटा। इस बार टॉर्च मुँह में दबाकर, ताकि दोनों हाथ खाली रहें। लोहे की ठंडक मेरी छाती पर लगी। ऊपर एक इंच की जगह थी और उसी इंच में मेरा पूरा ध्यान ज़रूरी था।
पाइप धीरे-धीरे मेरी आँखों के सामने साफ़ होने लगी।
पहले मुझे सिर्फ़ काला दिखा। फिर उसका घुमाव दिखा। फिर वो जगह दिखी जहाँ नट बैठता है।
मैं रुका।
मैंने टॉर्च थोड़ा दूर की और उस जगह को देखा।
पाइप के ऊपर धूल की एक मोटी परत थी। सालों की धूल। उस पर उँगली फेरो तो लकीर बन जाए।
पर नट के ठीक बगल में, एक इंच की जगह पर, धूल नहीं थी।
वहाँ लोहा नंगा था।
और वो नंगा लोहा चिकना नहीं था, घिसा हुआ नहीं था, पुराना नहीं था।
वो कटा हुआ था।
साफ़। सीधा। एक ही बार में। जैसे किसी ने प्लायर को ठीक उसी जगह रखा, दबाया, और एक झटके में मोड़ दिया।
मेरी साँस अंदर ही अटक गई।
क्योंकि ये कट मैंने पहले देखा था।
मोती की केबल। वही कट। वही सफ़ाई। वही आत्मविश्वास।
कोई आदमी जल्दी में काटता है तो कट टेढ़ा होता है, चीरा फटता है, तार के रेशे बाहर निकल आते हैं। जो आदमी रोज़ काटता है, वो सीधा काटता है, जैसे काग़ज़ काटते हैं।
ये कोई पहली बार नहीं कर रहा था।
ये उसका काम था।
मेरा माथा ट्रक के नीचे ठंडा हो रहा था और मेरे भीतर कुछ गरम हो रहा था। दोनों एक साथ चल रहे थे और मैं बीच में पिस रहा था।
मैंने पाइप पर उँगली फेरी। कट के किनारे पर उँगली अटकी।
और तभी मुझे वो आवाज़ सुनाई दी।
नहीं, आवाज़ नहीं। आवाज़ का अभाव।
ट्रक चुप था।
पीला ट्रक, ठाकुर ट्रांसपोर्ट, जिसके आगे पापा का नाम लिखा था, वो चुप था। बिल्कुल चुप। जैसे कोई बीमार आदमी साँस रोककर सुन रहा हो कि दूसरे कमरे में उसके बारे में क्या बोला जा रहा है।
"सुन रहा है?" मैंने धीरे से कहा।
कोई जवाब नहीं।
"डर मत," मैंने कहा। "मैं तेरे नीचे हूँ। तेरे ही नीचे। अब तू अकेला नहीं है।"
मुझे पता है, ये बातें पागलों जैसी लगती हैं। गाड़ी से बात करना। लेकिन जिस आदमी ने चालीस साल सड़क पर बिताए हों, वो जानता है कि गाड़ी बोलती है। बस उसे सुनने वाला चाहिए।
और मैं सुनने वाला था।
मैं सरककर पीछे की तरफ़ गया। पिछले पहिये के पास जगह ज़्यादा थी, वहाँ मैं आधा उठ सका।
मैंने टॉर्च नीचे की और…
रुक गया।
ज़मीन पर, पहिये के ठीक पास, एक लाल निशान था।
ताज़ा।
इतना ताज़ा कि उसकी चमक अभी गई नहीं थी। पान की पीक। लाल, गाढ़ी, और उसके बगल में चप्पल की एड़ी का निशान, जिसकी लकीरें धूल में साफ़ छपी थीं।
ये वही था।
वही निशान जो बाईपास पर मैंने आगे के पहिये के पास देखा था। वही निशान जो कबीर की दुकान के दरवाज़े के बाहर मिला था।
किसी ने यहाँ खड़े होकर पान थूका था और फिर अपनी एड़ी घुमाई थी, जैसे कोई तमगा लगाकर जाता हो।
मेरी जीभ सूख गई।
क्योंकि अगर पीक ताज़ा थी, तो मतलब वो आदमी यहाँ से अभी गया था।
मैं जितनी देर ट्रक के नीचे पेट के बल पड़ा था, उतनी देर में कोई मेरे ऊपर से गुज़रा था। मेरे ऊपर। मेरी छाती के ऊपर।
मैंने टॉर्च बंद कर दी।
अंधेरा मुझ पर गिरा, जैसे कोई कंबल मुँह पर रख दे।
मेरा दिल धौंकनी की तरह चल रहा था और मैं उसे सुन नहीं रहा था, क्योंकि मैं बाहर सुन रहा था। कदम। साँस। कुछ भी।
कुछ नहीं।
और फिर, नाली की तरफ़ से, पानी की आवाज़। बहता हुआ। रुकता हुआ। फिर बहता हुआ।
किसी ने नाली में कुछ फेंका था।
मैं बाहर निकला। धीरे। बहुत धीरे। एक कोहनी, फिर दूसरी। जैसे कोई घायल जानवर बिल से निकलता है।
और जैसे ही मेरा सिर बाहर आया —
"भैया!"
जुगनू। नंगे पाँव। दौड़ता हुआ। उसका चेहरा सफ़ेद था। ऐसा सफ़ेद जो सिर्फ़ डर से होता है, धूल से नहीं।
वो मेरे पास पहुँचा और मेरा हाथ पकड़ लिया। उसकी हथेली बर्फ़ जैसी ठंडी थी।
"भैया, वो आदमी आपके ट्रक के नीचे था।"
मैं जम गया।
"क्या बोला तूने?"
"मैंने देखा।" उसकी आवाज़ हाँफ रही थी। "मैं मोड़ पर खड़ा था। मैंने सोचा कि भैया को बोलूँ कि मुझे खाँसी आ रही है, पर फिर मैंने देखा कि आपने मुझे खाँसने से मना किया था, तो मैं चुप रहा।"
"जुगनू, धीरे।"
"मैं चुप ही था, भैया। मैं चुप ही था।" उसका गला काँप रहा था। "और फिर मैंने सुना — ठक। ठक। ठक।"
मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
"धीरे?" मैंने पूछा।
"धीमी। जैसे कोई छोटी चीज़ बजा रहा हो। जैसे झंडू भाई की तराज़ू। पर नहीं, ये अलग थी।" उसने मेरी कलाई पकड़ी। "और फिर मैंने आपको नहीं देखा। मैंने सोचा भैया कहाँ गए। मैं मोड़ से एक कदम आगे आया, और फिर —"
"फिर?"
"फिर मैंने ट्रक के पीछे एक आदमी को खड़े देखा।"
"कौन? कैसा दिख रहा था?"
"मैं उसका चेहरा नहीं देख पाया, भैया। वो झुका हुआ था। पीछे से। पर उसके गले में…" उसने अपना गला छुआ। "काली माला थी।"
मेरे भीतर का सारा धूल बैठ गया।
काली माला।
कालू।
"जुगनू, उसने तुझे देखा?"
"नहीं, भैया। मैं दीवार के पीछे छिप गया। मैं साँस भी नहीं ले रहा था।" वो थोड़ा रुका। "फिर वो धीरे-धीरे झुका, जैसे कुछ देख रहा हो। और फिर हाथ बढ़ाया।"
"कहाँ?"
"नीचे। ट्रक के पीछे। पहिये के पास।"
मेरी नज़र अपने आप पीछे के पहिये की तरफ़ गई — जहाँ पान की पीक थी, जहाँ एड़ी का निशान था।
"और तू यहाँ कैसे आया? वो नाली की तरफ़ गया या नहीं?"
जुगनू उलझ गया।
"बोल ना!"
"वो नाली की तरफ़ ही गया, भैया। मैंने देखा। वो झुका था, और फिर सीधा खड़ा हुआ, और फिर —"
"किस तरफ़?"
उसने हाथ बढ़ाया।
उसकी उँगली मोड़ से आगे, पुरानी नाली की तरफ़, वहाँ इशारा कर रही थी जहाँ पानी काई के ऊपर से बहता है, जहाँ रात में रोशनी नहीं पहुँचती। नाली के उस पार गाड़ी महल की ज़मीन शुरू होती है। उसके भी बाद, बाईस नंबर टोल के पीछे का पत्थर वाला रास्ता।
"वो वहाँ गया?"
जुगनू ने सिर हिलाया। फिर, बहुत धीमे, जैसे कहने से पहले माफ़ी माँग रहा हो:
"भैया, मैंने उसे जाते हुए देखा।"
"तो?"
"वो दौड़ नहीं रहा था।"
मेरा मुँह सूख गया।
क्योंकि अगर कोई चोर पकड़ा जाने के डर से भागता है, तो वो दौड़ता है। जो दौड़ता नहीं, वो जानता है कि उसे कोई नहीं पकड़ सकता। या फिर वो चाहता है कि तुम उसे देखो।
"वो रुका?" मैंने पूछा। "कहीं?"
"हाँ, भैया। एक बार। नाली के मोड़ पर। उसने पीछे देखा।"
"मेरी तरफ़?"
"ट्रक की तरफ़।" जुगनू ने गला साफ़ किया। "और फिर उसने सिर हिलाया।"
"सिर हिलाया?"
"जैसे… जैसे कोई कहे, ठीक है।"
मेरे शरीर से पसीना बहकर ठंडा हो गया।
मैं आधा उठा। मेरी जेब में पापा की चाबी थी, मेरी उँगली पर उनका तरल था, और मेरे सामने नाली का अंधेरा खुला पड़ा था।
मैंने एक कदम बढ़ाया।
और मेरी कलाई पीछे खिंच गई।
"कहाँ?"
रुक्मा दीदी।
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