A Dark Secret95 / 536

A Dark Secret – Chapter 95

7 min read November 6, 2026

"अर्जुन।"

"नैना, तेरे पापा की गाड़ी जली थी," मैंने कहा। "और मेरे पापा का ट्रक अब भी खड़ा है। मुझे उसे अकेले देखना है। अगर वहाँ कुछ है, तो मुझे उसे अकेले सुनना है। भीड़ में मैं कुछ नहीं सुनता।"

उसने मेरी तरफ़ देखा और उसकी आँखों में वो बात थी जो पापा के काग़ज़ों को जलाने वाले दिन अम्मा की आँखों में थी।

"ठीक है," उसने कहा। "पर एक शर्त है। तेरे पास वो काला माइक है। उसे जेब के पास लगाकर रख। अगर तू एक घंटे में फ़ोन नहीं करता, तो मैं थाने जाऊँगी।"

"थाने जाने से क्या होगा?"

"कुछ नहीं होगा," उसने कहा। "पर तेरी लाश तो नहीं सड़ेगी।"

रुक्मा दीदी ने करछुल मेज़ पर रख दी।

"मैं भी एक बात कहूँगी," उन्होंने कहा। "तू रात को अकेले नहीं जाएगा।"

"दीदी।"

"मैं तेरे साथ नहीं जाऊँगी," उन्होंने कहा। "मैं तेरी तरह बेवकूफ़ नहीं हूँ। मैं बस ये कहूँगी कि जुगनू को साथ ले जा। वो तेरे पीछे नहीं जाएगा, वो तेरे आगे चलेगा, और वो किसी को शक में नहीं डालेगा, क्योंकि वो हर रात वहीं घूमता है।"

मैंने सोचा। सोचना पड़ा। और फिर मैंने हाँ कह दिया, क्योंकि मुझे उस रात किसी ऐसे आदमी की ज़रूरत थी जिसकी आँखें मेरे कानों के साथ चलें।

शाम को मैंने अपना थैला खोला। पापा के औज़ार। दो नंबर का पाना, जिसके हैंडल पर तार लिपटा था। चार रिंच में से तीन। छोटा भारी हथौड़ा, जिसके हैंडल पर जले का निशान था। पुरानी स्क्रू ड्राइवर, जिसकी नोक घिस गई थी।

और पापा का बनाया बेयरिंग पुलर।

मैंने उसे उँगलियों में घुमाया। उस पर वही घिसाई थी। वही निशान जो उन दो पीतल के नटों पर था। पापा ने ये अपने हाथों से बनाया था, किसी कारखाने में नहीं। और जिसने भी वो नट बनाए, उसने पापा का यही औज़ार इस्तेमाल किया था।

यानी उस आदमी के हाथ में मेरे पापा का औज़ार था।

या उस आदमी के पास मेरे पापा का पूरा थैला था।

रात ग्यारह बजे मैं जुगनू के साथ निकला। वो नंगे पाँव चल रहा था, और सड़क की धूल उसके पंजों पर चिपक रही थी। उसने रास्ते में एक बार भी नहीं पूछा कि हम कहाँ जा रहे हैं। बस एक बार बोला, "भैया, टोल के पीछे आज तीसरी गाड़ी आई है जो वहीं रुकी है। कोई उतरा नहीं।"

"कौन सी गाड़ी?"

"पता नहीं," उसने कहा। "पर उसका इंजन बंद हुआ और फिर स्टार्ट नहीं हुआ। यानी वो वहीं खड़ी है।"

मेरी गर्दन के पीछे ठंडी हवा चली, जबकि रात गर्म थी।

हम कोने से मुड़े। टोल के पीछे की जगह रात में और भी बड़ी लगती है। ऊपर एक टिमटिमाता बल्ब, नीचे कुट्टी हुई ज़मीन, और दूर बाएँ कोने में, चादर से ढका वो पीला ट्रक खड़ा था।

रघुवीर।

मैंने चादर के नीचे से आगे का हिस्सा खोला। धूल की परत थी, पर बंपर साफ़ था। किसी ने उसे पोंछा था। हाल में।

"जुगनू," मैंने धीरे से कहा। "तू वहाँ मोड़ पर खड़ा हो जा। अगर कोई आए तो ज़ोर से खाँस देना। बस खाँस देना, कुछ बोलना नहीं।"

"भैया, मुझे खाँसी नहीं है।"

"तो भी खाँस देना," मैंने कहा।

वो गया। मैं ट्रक के नीचे झुका।

ज़मीन पर पेट के बल लेटा और सीने के नीचे हाथ रखकर आगे बढ़ा। मेरी कलाई पर पापा की घड़ी थी, और वो मेरी हड्डी से टकरा रही थी। पाँच मिनट आगे। हमेशा की तरह।

पहले मुझे केवल धूल की गंध आई। फिर पसीने की। फिर…

फिर वो गंध।

तेल नहीं थी।

तेल भारी होता है, दम घोलता है, जीभ पर चिपकता है। ये गंध अलग थी। हल्की मीठी, और उसके पीछे एक तीखापन, जैसे कोई दवा हो।

मैंने टॉर्च जलाई और उसे अपनी छाती से सटाकर रखा, ताकि रोशनी दूर तक न जाए।

मेरे ऊपर ब्रेक की लोहे की पाइप चल रही थी। उसका जोड़, एक छोटा सा नट, जिससे होकर तरल जाता है।

और उस जोड़ से एक बूँद लटकी थी।

मैंने उसे देखा। बूँद धीरे-धीरे बड़ी हुई, फिर भारी होकर नीचे गिरी, और ज़मीन पर बनी छोटी सी गील में मिल गई।

मैंने नट की तरफ़ देखा।

उसकी कोर चमक रही थी। बाकी पाइप पर धूल थी, पर नट की कोर पर एक भी कण नहीं था। किसी ने उसे आज ही खोला था और फिर थोड़ा सा बंद कर दिया था। पूरा नहीं।

मेरी साँस रुक गई।

नट के नीचे, ज़मीन पर, एक टिन का छोटा प्लेट रखा था। उस प्लेट में तरल जमा था। कोई इसे टपकने दे रहा था और साफ़-साफ़ जमा कर रहा था, ताकि ज़मीन पर दाग़ न बने और कोई पूछे नहीं।

ये चोरी नहीं थी।

ये इंतज़ार था।

कोई इस ट्रक को धीरे-धीरे खोखला कर रहा था। रोज़ थोड़ा-थोड़ा। जैसे कोई जानवर को खाना खिलाता है, और फिर एक दिन…

मैं पीछे सरका। मेरी कोहनी किसी चीज़ से टकराई। मैंने टॉर्च उस तरफ़ घुमाई।

वो चाबी थी।

ट्रक की चाबी, ज़मीन पर पड़ी, उसी जगह जहाँ मैंने उसे आख़िरी बार इग्निशन में देखा था। पर अब वो इग्निशन में नहीं थी। किसी ने निकाली थी और नीचे गिरा दी थी, जैसे जल्दी में हो।

मैंने चाबी उठाई। हाथ धूल से भरा था।

और फिर मैंने अपनी उँगली देखी।

उस पर बूँद लगी थी। एक छोटी सी, गोल, चमकती बूँद।

मैंने उसे रगड़ा।

धुली नहीं।

मैंने उसे सूँघा।

वो तेल नहीं था।

मेरी उँगली पर ब्रेक का तरल लगा था, वो द्रव जिस पर पूरी गाड़ी रुकती है, जिसके बिना ट्रक पहाड़ी पर एक लोहे का पत्थर बन जाता है, जिसके बिना आदमी के पास ब्रेक नहीं होता, सिर्फ़ दुआ होती है।

और वो अभी भी टपक रहा था।

मैं वहीं पेट के बल पड़ा रहा, ट्रक के नीचे, अंधेरे में, और मेरे ऊपर से एक बूँद गिरी, फिर दूसरी, फिर तीसरी, बिना रुके, बिना आवाज़ के, जैसे कोई मेरे कान में गिनती बोल रहा हो।

एक।

दो।

तीन।

किसी ने इस ट्रक को मारने का फ़ैसला कर लिया था और उसका इंतज़ार शुरू कर दिया था।

मैं धीरे से बाहर निकला और चादर को वैसे ही छोड़ दिया, जैसे थी। क्योंकि अगर उस आदमी को पता चलता कि मैंने देख लिया, तो वो इंतज़ार बंद कर देता।

और मुझे उसका इंतज़ार चाहिए था।

मुझे उसका हाथ चाहिए था।

जुगनू मोड़ पर खड़ा था। उसने मेरी तरफ़ देखा।

"भैया, तेरे हाथ से कुछ टपक रहा है।"

"पता है," मैंने कहा।

"क्या है?"

"ये वो चीज़ है," मैंने कहा, "जो किसी को नहीं दिखती, जब तक कि कोई गाड़ी न पलट जाए।"

॥

जुगनू ने मेरी उँगली देखी, फिर मेरा चेहरा। उसका मुँह खुला रह गया।

"भैया, ये लाल क्या है?"

"ब्रेक का तरल," मैंने कहा।

"मतलब?"

"मतलब ये कि जो आदमी इस ट्रक को मार रहा है, वो जल्दबाज़ नहीं है। वो मरीज़ की तरह इंतज़ार कर रहा है। रोज़ थोड़ा खून निकालता है और गिनता है कि कब आदमी बेहोश होगा।"

जुगनू ने गला साफ़ किया, जैसे उसके अंदर कुछ अटक गया हो।

"और मैं…" उसने कहा, "मैं सोच रहा था कि यहाँ आप ही चोरी करने आए हो।"

"तो तूने मुझे पकड़ने की तैयारी कर ली थी?"

"मैंने सोचा, भैया अगर चोर निकले तो मैं क्या करूँगा।" उसने सिर खुजाया। "फिर मैंने सोचा, भैया चोर होते तो पहले मुझे चुप कराते। वो तो मुझे खाँसने की शर्त दे गए।"

मैं हँसा नहीं। हँसी गले में ही रुक गई, क्योंकि मेरी उँगली पर तरल अभी भी चिपचिपा था, और मैं उसे पोंछने के लिए अपनी शर्ट का कोना इस्तेमाल कर रहा था, जो पहले से ही तेल से सना हुआ था।

"तू यहीं रुक," मैंने कहा। "चुप्पी से।"

"आप कहाँ जा रहे हो?"

"दोबारा।"

"अभी?"

"अभी।"

"भैया, आपने अभी चादर वैसी छोड़ी थी।"

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