A Dark Secret – Chapter 94
जुगनू ने आँखें ऊपर कर लीं, जैसे छत पर लिखा हुआ पढ़ रहा हो।
"इंजन हल्का है," उसने कहा। "चलते वक़्त पीछे से टिन जैसी आवाज़ आती है। और बंद करने पर एक बार धीरे से टन होता है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। ग्यारह साल का लड़का मुझे वो बता रहा था जो मैंने खुद उस पुराने पुल पर सुना था।
"जुगनू," मैंने कहा, "तू इन चीज़ों को कहाँ लिखता है?"
"कहीं नहीं," उसने कहा। "यहाँ लिखता हूँ।" और उसने अपना सिर खटखटाया। "यहाँ पूरा टोल नाका घूमता रहता है, भैया। रात में मैं ढोल पर बैठकर गिनता हूँ कि कौन सी गाड़ी गई, कौन सी आई। सोता हूँ तो सपने में भी गाड़ियाँ गिनता हूँ।"
उसने मेरी तरफ़ देखा।
"तेरी वाली बात सच है क्या? जो तू कान लगाकर पकड़ता है?"
"कभी-कभी," मैंने कहा।
"तो फिर उस सफ़ेद गाड़ी को पकड़," उसने कहा, और उठकर भाग गया।
नैना ने कैमरा उठाया।
"अर्जुन," उसने धीरे से कहा, "ये ख़बर छपनी चाहिए। आज। तेरे पापा का रजिस्टर, देवा का कमरा, ग़ायब होना, धमकी। मैं इसे रात तक अपनी वेबसाइट पर डाल सकती हूँ।"
"और उसके बाद?"
"उसके बाद लोग जागेंगे।"
"नहीं, नैना।" मैंने गिलास रखा। "उसके बाद देवा भाई का आदमी तेरे दफ़्तर पहुँचेगा, तेरे एडिटर को फ़ोन जाएगा, और कल सुबह वो ख़बर उसी वेबसाइट पर नहीं होगी। और तेरे चौदह काग़ज़ों में से दो ग़ायब होंगे।"
"तो क्या करें? चुप रहें?"
"बिना काग़ज़ के ये ख़बर नहीं है," मैंने कहा। "ये सिर्फ़ एक आरोप है। मैं एक मज़दूर हूँ, नैना। मैं कहूँगा कि देवा भाई ने धमकाया, वो कहेंगे कि बेटा बेटा करके प्यार किया। मैं कहूँगा कि रजिस्टर ग़ायब हुआ, वो कहेंगे कि इस लड़के के पापा ही रजिस्टर ले गए थे, और इस लड़के पर ग़म का साया है।"
नैना ने पेन मेज़ पर रख दिया।
"तुझे पता है तेरी सबसे बड़ी कमज़ोरी क्या है?" उसने कहा। "तू सच बोलता है, इसलिए तुझे हमेशा सबूत चाहिए। और जिसके पास सत्ता होती है, उसे सबूत की ज़रूरत नहीं होती। उसे सिर्फ़ तारीख़ चाहिए। सत्ताईस।"
"फिर भी," मैंने कहा, "हमें वही काग़ज़ चाहिए जो वो नहीं बना सकते।"
तभी पीछे से एक आवाज़ आई।
"काग़ज़ की बात कर रहे हो?"
कबीर था। साफ़ कपड़े, हाथ में कैलकुलेटर, जेब में दो पेन। उसने बिना पूछे बेंच पर बैठकर मेरे सामने पीतल का एक छोटा टुकड़ा रख दिया। वही टुकड़ा, जो कालू के प्लायर से गिरा था। उस पर घिसा हुआ अक्षर र।
"मैंने इसकी धातु देखी," कबीर ने कहा। "ये बाज़ार का पीतल नहीं है। ये पुराना है। ऐसे पीतल के पुर्ज़े तीस साल पहले बनते थे, और ऐसा ही पीतल तेरे पापा के थैले वाले पुलर पर भी है।"
"तूने थैला कब देखा?" मैंने पूछा।
"जब तू मेरी दुकान पर आया था," उसने कहा, बिना झिझक। "तू चाय पीने में लगा था।"
मैं हँस पड़ा, और यही कारण था कि मुझे उस पर गुस्सा नहीं आया।
फिर उसने नैना की तरफ़ देखा।
"तुम्हारा वो पुराना काग़ज़, जो तुमने कल दिखाया था। जोशी साहब के हादसे का।"
"क्या उसका?"
"वो असली है," कबीर ने कहा। "मैंने उसका काग़ज़ देखा, उसकी स्याही देखी, मोहर का उभार देखा। वो उस दफ़्तर से आया है जो अब बदल चुका है, पर उसका काग़ज़ अब भी वही बनता है।"
नैना ने उसकी तरफ़ झुककर देखा।
"तू इतना कैसे जानता है?"
"क्योंकि मैंने दो साल बीमा के काग़ज़ों के नीचे बिताए हैं," कबीर ने कहा। "जो आदमी एक बार काग़ज़ पर हस्ताक्षर कर दे, वो ज़िंदगी भर उसका हिसाब ढोता है।"
फिर उसने पेन निकाला, नीली स्याही वाला, और मेज़ पर एक खड़ी लकीर खींच दी, जैसे कुछ गिन रहा हो।
"पर एक दिक्कत है," उसने कहा। "ऐसे हिसाब दो बार लिखे जाते हैं। एक पर्ची दफ़्तर जाती है, एक गाड़ी वाले के पास रहती है। तुम्हारे पास पहली है।"
"और दूसरी?" मैंने कहा।
"दूसरी कहीं ग़ायब है।" कबीर ने अपना कैलकुलेटर उठाया और फिर रख दिया। "और अगर दूसरी मिल जाए, तो उस पर वो नाम भी होगा जो पहली पर मिटा दिया गया है।"
"तुम्हें कैसे पता?" नैना ने पूछा।
"क्योंकि जो आदमी नाम मिटाता है, वो पहली पर्ची पर मिटाता है," कबीर ने कहा। "दूसरी वो भूल जाता है। हमेशा।"
थोड़ी देर कोई नहीं बोला। रुक्मा दीदी तवे पर पानी के छींटे मार रही थीं, और उसकी चटचटाहट ऐसी लग रही थी जैसे कोई चुपचाप कुछ जला रहा हो।
तभी नैना का फ़ोन बजा।
वो पुराना, मोटा, चटका हुआ फ़ोन था। उसने स्क्रीन देखी और मेरी तरफ़ देखने लगी।
"नंबर नहीं है," उसने कहा।
"फिर भी उठा," मैंने कहा।
उसने उठाया और स्पीकर पर डाल दिया।
पहले कुछ सुनाई नहीं दिया। फिर एक आवाज़ आई। कोई चीख नहीं, कोई गाली नहीं। बहुत ठंडी, बहुत धीमी आवाज़। जैसे कोई बात करते-करते बीच में रुक जाए और सोचे कि अगला शब्द कितना देना है।
"बेटा," उस आवाज़ ने कहा।
मेरा हाथ मेज़ पर रखा रह गया।
"आप कौन?" नैना ने पूछा। उसकी आवाज़ में डर नहीं था। गुस्सा था।
"ये बात नहीं," आवाज़ ने कहा। "बात ये है कि तू अपने पापा की बेटी है। और तेरे पापा ने भी जल्दी की थी।"
नैना की उँगली फ़ोन पर जम गई।
"अपने पापा की तरह जल्दी मत कर," आवाज़ ने कहा। "काग़ज़ जलते हैं, लड़कियाँ जलती हैं, गाड़ियाँ जलती हैं। सब जलता है। बस आदमी का नाम नहीं जलता।"
फिर एक आवाज़ आई, जैसे कोई भारी लोहे का फाटक बंद हुआ हो। और फिर लाइन कट गई।
नैना ने फ़ोन नीचे रखा। उसके हाथ काँप नहीं रहे थे। यही सबसे डरावना था।
मैंने आँखें बंद कर लीं।
वही तीन चीज़ें। धातु की घिसाई। हवा का रिसाव। और वो हिस्सा जो बाकी सबको सिर्फ़ शोर लगता है।
मैंने उन्हें अलग किया।
पहले, आवाज़ के पीछे एक लगातार गूँज थी। हल्की। जैसे कोई पंखा चल रहा हो, पर बहुत धीमा।
दूसरे, बीच में एक बार एक चीज़ खड़खड़ाई। जैसे लोहे की सीढ़ी पर कोई पाँव रखे।
और तीसरे, आख़िर में वो फाटक। भारी। एक लंबी कर्कश आवाज़, फिर टन।
"अर्जुन," नैना ने कहा। "तेरी आँखें बंद हैं।"
"रहने दे," मैंने कहा।
"तू कुछ सुन रहा है?"
"अभी नहीं," मैंने कहा। "अभी मैं याद कर रहा हूँ।"
मैंने उसे बताया। उस फाटक की आवाज़ मैंने आज ही सुनी थी। टोल के पीछे वाला जंग लगा फाटक, जो टीटू रात को खोलता है। उसकी कुंडी अधूरी है, इसलिए जब वो बंद होता है, तो पहले लंबी कर्कश आवाज़ आती है और फिर टन।
नैना की आँखें बड़ी हो गईं।
"यानी वो आदमी टोल के अंदर था? बात करते वक़्त?"
"या वहाँ से गुज़र रहा था।" मैंने कहा। "पर ये भी हो सकता है कि वो जानबूझकर वहाँ गया हो, ताकि मुझे लगे कि वो शहर में कहीं भी है। और ये भी हो सकता है कि मैं ग़लत हूँ। मैं हर बार सही नहीं होता, नैना।"
"तो अब?"
"अब मुझे उस आदमी को ढूँढना है जो उस रात चाय पीने वालों में से रजिस्टर उठा ले गया," मैंने कहा। "और उसके लिए मुझे उस ट्रक तक जाना होगा जिस पर मेरे पापा का नाम लिखा है।"
कबीर ने अचानक सिर उठाया।
"अर्जुन," उसने धीमे से कहा, "वो पीला ट्रक जिस पर रघुवीर लिखा है, वो अब भी टोल के पीछे उसी कोने में खड़ा है। मुझे पता है क्योंकि कल शाम मैंने उसे देखा था। कोई उसकी चादर ठीक कर रहा था।"
"कौन?"
"नहीं पता," उसने कहा। "पर वो ऐसे खड़ा था जैसे वहाँ किसी का इंतज़ार कर रहा हो।"
नैना उठ खड़ी हुई।
"मैं साथ चलूँगी।"
"नहीं," मैंने कहा। "आज नहीं।"
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