A Dark Secret93 / 536

A Dark Secret – Chapter 93

7 min read November 6, 2026

"वो काग़ज़ जो मैं अभी नहीं दे सकता," मैंने कहा। "पर जिसकी एक आवाज़ मेरे पास है — अलमारी के अंदर बजती हुई।"

नैना कुछ देर मेरी तरफ़ देखती रही।

"अर्जुन," उसने कहा, "तेरी आवाज़ क्यों धीमी हो गई?"

मैंने कुछ नहीं कहा।

क्योंकि मुझे अभी भी कानों में वो आवाज़ सुनाई दे रही थी, जो देवा भाई ने बहुत प्यार से बोली थी — सत्ताईस भूल जा।

और उस प्यार के नीचे, कहीं गहरे में, वो तीसरी आवाज़ थी जिसे मैं पहचानता था। धातु की घिसाई। हवा का रिसाव। और वो हिस्सा जो बाक़ी सबको सिर्फ़ शोर लगता है।

सिर्फ़ शोर।

मैं गाड़ी में बैठा।

और मैंने मन में तय किया कि मैं उस आवाज़ को पहचानूँगा। चाहे उसके लिए मुझे एक और चाय पीनी पड़े, एक और ठंडी।

पर इस बार चाय मैं अपनी मेज़ पर पिऊँगा।

॥

गाड़ी में बैठते ही मुझे उसका पहला सुर सुनाई दिया। बायाँ पिछला पहिया। हवा कम थी, इसलिए सड़क की हर दरार उसके अंदर से होकर आ रही थी, जैसे कोई चलते-चलते साँस रोक ले और फिर छोड़ दे।

"तेरी गाड़ी का पिछला पहिया बोल रहा है," मैंने कहा।

नैना ने गाड़ी स्टार्ट की और मेरी तरफ़ देखा भी नहीं।

"मेरी गाड़ी हमेशा बोलती है," उसने कहा। "मुझे इसकी आदत है। तू नई बात बता।"

"नई बात ये है कि आज तक मैंने किसी कमरे में तीन फ़ोन नहीं देखे।"

उसने गाड़ी टोल के रास्ते से मोड़ी। धूल इतनी थी कि आगे का ट्रक दिखना बंद हो गया, बस उसका पीछा करता लाल बत्ती जैसा दिख रहा था।

"तीन फ़ोन?" उसने पूछा।

"दो मेज़ पर। एक अलमारी के अंदर।"

"और उस अलमारी की चाबी?"

"जेब में," मैंने कहा। "देवा भाई की जेब में। और मुझे लगता है कि वो चाबी सिर्फ़ अलमारी के लिए नहीं है।"

नैना कुछ देर चुप रही। फिर बोली, "तू अंदर गया, चाय पी, और बाहर आ गया। कुछ और नहीं?"

"कुछ और भी हुआ," मैंने कहा। "जब मैंने सीधा सवाल पूछा कि रजिस्टर कहाँ है, तब देवा भाई की उँगली, जो अंगूठी पर टिकी थी, उसकी टक रुक गई।"

"टक?"

"अंगूठी मेज़ पर टक-टक कर रही थी। धीरे-धीरे, जैसे कोई घड़ी चल रही हो। फिर रुक गई। और ठीक उसी वक़्त अलमारी के अंदर फ़ोन हिला।"

"यानी जिसका फ़ोन था, वो उनसे बड़ा है," नैना ने कहा।

मैंने उसकी तरफ़ देखा। ये लड़की सवाल नहीं पूछती थी, नतीजा बता देती थी।

"हाँ," मैंने कहा। "और उसके बाद सफ़ेद फ़ोन बजा। उस पर कोई अम्मा के बारे में बोल रहा था। दवा के बारे में। देवा भाई की आवाज़ उस वक़्त बदल गई थी, नैना। मीठी नहीं थी। थकी हुई थी।"

"तो वो इंसान भी है।"

"सब इंसान ही होते हैं," मैंने कहा। "समस्या यही है।"

हम ढाबे के मोड़ पर पहुँचे। दोपहर ढल रही थी और रातरानी के तंदूर से धुआँ सीधा आसमान की तरफ़ जा रहा था, बिना हिले, जैसे उस दिन हवा भी छुट्टी पर हो।

रुक्मा दीदी चूल्हे पर रोटी बना रही थीं। मेरी तरफ़ देखा और हाथ का लोई वैसे ही पकड़े रह गईं।

"तेरा चेहरा देखकर लग रहा है कि तू उस कमरे से चाय नहीं, कोई बीमारी पीकर आया है," उन्होंने कहा।

"चाय अच्छी थी, दीदी," मैंने कहा। "बस उसमें जो मिलाया गया था, वो अच्छा नहीं था।"

मैं बेंच पर बैठ गया। नैना सामने बैठी, बैग गोद में, कैमरा बगल में रखा।

फिर मैंने सब बताया।

एक-एक करके।

देवा भाई का कमरा। वही कमरा जिसके बाहर से सादा दरवाज़ा था और अंदर से ठंड। दीवार पर एक ही तस्वीर, किसी पुराने मंदिर की। मेज़ पर दो फ़ोन। एक काला, एक सफ़ेद। सफ़ेद उलटा पड़ा था, जैसे किसी ने उसे जानबूझकर मुँह के बल लिटा दिया हो।

"और चाय?" नैना ने पूछी।

"इलायची वाली। मुनीम जी लाए। दो कटोरे। एक मेरे आगे, एक उनके आगे।"

"तूने पी?"

"पी। ठंडी हो रही थी, और मुझे लगा कि जब तक मैं पी नहीं लेता, वो बोलेंगे नहीं।"

नैना ने पेन निकाला। "क्या बोले?"

"बोले कि उस रात मेरे पापा काली जिल्द वाला रजिस्टर लेकर आए थे। उन्होंने वो मेज़ पर रखा। और फिर वो रजिस्टर ग़ायब हो गया।"

"ग़ायब हो गया या उठा लिया गया?"

"देवा भाई के शब्द थे, ग़ायब हो गया। पर जब कोई बूढ़ा आदमी किसी चीज़ के लिए ग़ायब शब्द चुनता है, तो उसका मतलब होता है कि उसने उस चीज़ को आख़िरी बार अपनी आँखों से देखा था, अपने हाथों से नहीं छुआ था।"

नैना ने लिखा।

"और फिर?"

"और फिर मैंने पूछा कि उस रात कमरे में कौन-कौन था।"

"तो?"

"तो वो मुस्कुराए। वही मुस्कान, नैना, जो हर आदमी को बेटा कहकर बाँटती है। और बोले, अर्जुन, तू अभी छोटा है। सत्ताईस भूल जा।"

मैंने अपना गिलास उठाया। खाली था, फिर भी उठा लिया।

"और फिर बोले कि अगर तू इसी तरह सवाल पूछता रहा, तो एक दिन तेरा ट्रक भी लोहे का ढेर बन जाएगा, और तू उसके नीचे खड़ा होगा।"

रुक्मा दीदी ने रोटी तवे से उतारी और ज़ोर से पटकी।

"यही बात," उन्होंने कहा। "यही बात उन्होंने मेरे पति से भी कही थी।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा।

"कब?"

"जब उन्होंने पहली बार पूछा था कि सत्ताईस की रात ट्रक के पीछे मेरी गाड़ी क्यों लगी थी।" रुक्मा दीदी ने आँचल से हाथ पोंछा। "देवा भाई ने उस दिन भी चाय भेजी थी। ठंडी नहीं थी। इलायची वाली थी। और हम दोनों ने पी थी, क्योंकि हमें लगा था कि जो आदमी चाय भेजता है, वो मारता नहीं।"

नैना ने देखा, "दीदी, आपने पहले कभी ये नहीं बताया।"

"तूने पहले कभी ऐसे नहीं पूछा था।" दीदी मेरे सामने आकर बैठ गईं। चाबियों का गुच्छा कमर पर खनका। "सुन, अर्जुन। मैं तुझे एक बात बताती हूँ जो मैंने किसी को नहीं बताई। तेरे पापा को भी देवा भाई बेटा कहते थे।"

मैं चुप हो गया।

"बेटा रघुवीर।" दीदी ने वैसे ही कहा, जैसे देवा भाई बोलते थे। वो नक़ल इतनी सही थी कि मेरी गर्दन के बाल खड़े हो गए। "हर हफ़्ते यहाँ आते थे। वही बेंच। वही चाय। और वो जब बैठते थे, तो उनकी जेब में एक काली जिल्द वाली डायरी हमेशा रहती थी।"

"डायरी?" मैंने कहा।

"काली जिल्द। वही जो अब लोग रजिस्टर कहते हैं।" दीदी ने मेरी तरफ़ देखा। "मैंने उन्हें एक बार पूछा था, भाई साहब, इसमें क्या लिखते हो? तो हँसकर बोले, दीदी, इसमें मैं वो लिखता हूँ जो लोग भूल जाते हैं।"

मेरे हाथ में चाय का गिलास था। उसने मेरी उँगलियों के नीचे धीरे से खुद को गर्म किया, और मुझे लगा कि कमरा ठंडा नहीं है, मैं ही ठंडा हो रहा हूँ।

"और एक बात," दीदी ने कहा। "देवा भाई ने आज तक अपने हाथ से कोई गंदा काम नहीं किया। न किसी की गाड़ी का तार काटा, न किसी को मारा। वो बस चाय भेजते हैं, लिफ़ाफ़ा भेजते हैं, और एक नाम बोल देते हैं। बाकी काम उनका आदमी करता है।"

"और जो आदमी करता है," नैना ने कहा, "उसके हाथ में भी कोई और होता है।"

दीदी ने उसकी तरफ़ देखा और पहली बार मुस्कुराईं, पर मुस्कान में कोई ख़ुशी नहीं थी।

"तू समझती है," उन्होंने कहा।

तभी नीम के पीछे से जुगनू आया। नंगे पाँव, घुटने पर वही पुरानी चोट, हाथ में टूटी पतंग।

"अर्जुन भैया," वो सीधा मेरे पास आकर बैठ गया, "आज सुबह से एक सफ़ेद गाड़ी दो बार इस गली के मोड़ पर आई। अंदर कोई नहीं उतरा। बस खिड़की खुली और बंद हो गई।"

"कितनी बार?"

"दो बार।" उसने उँगली उठाई। "पहली बार जब तुम ढाबे पर थे। दूसरी बार जब तुम गए थे।"

"गाड़ी की आवाज़ याद है?"

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