A Dark Secret92 / 536

A Dark Secret – Chapter 92

7 min read November 6, 2026

उनकी आवाज़ बदल गई थी। मिठास ग़ायब। अब वो आवाज़ थी जिसमें थकान थी और किसी की फ़िक्र। ये वो आवाज़ थी जो मुझे उनसे नफ़रत करने से रोकती थी, और मुझे यही सबसे ज़्यादा चुभता था।

मैंने उस वक़्त उस फ़ोन पर कोई सवाल नहीं किया। ये बात मुझे काफ़ी बाद में पता चली कि उस वक़्त कौन बीमार था और दवा कहाँ से आती थी। पर उस दिन मैंने सिर्फ़ इतना देखा — कि जब देवा भाई ने फ़ोन रखा, तो उन्होंने पहले अलमारी की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़।

और तब उनकी मुस्कान लौटी।

इस बार वो पहले से ज़्यादा मीठी थी। इतनी कि मुझे ठंड लग गई।

"भाई साहब," मैंने कहा, "अगर मेरे पापा का रजिस्टर आपके कमरे से गया, तो मुझे आपसे एक बात पूछनी है।"

"पूछ।"

"आपने उसे ढूँढा?"

"बहुत ढूँढा।"

"किसके पास?"

देवा भाई ने कुर्सी की बाहें पकड़ीं। फिर बहुत धीरे, जैसे कोई बच्चे को सुलाते वक़्त बोलता है, बोले —

"सत्ताईस भूल जा, बेटा।"

मैं चुप रहा।

"वरना अगली सुबह तेरा ट्रक सिर्फ़ लोहे का ढेर मिलेगा।"

उन्होंने ये नहीं कहा कि ट्रक जल जाएगा। नहीं कहा कि फिर मरम्मत होगी। उन्होंने सिर्फ़ ये कहा कि सिर्फ़ लोहे का ढेर मिलेगा। जो ट्रक चलता नहीं, वो लोहा है। और जो लोहा है, वो किसी के काम का नहीं।

कमरे का पंखा चल रहा था। चरचराहट वही थी। फिर वो अचानक रुक गया — बिजली गई — और कमरे में ऐसी चुप्पी बैठी जिसमें मेरी साँस तेज़ सुनाई दे रही थी।

मैंने गिलास उठाया। चाय अब ठंडी हो चुकी थी।

मैंने पूरा गिलास पी लिया।

एक घूँट में नहीं। धीरे-धीरे। जैसे किसी की सगाई में पीते हैं। फिर गिलास मेज़ पर रख दिया, ठीक उस जगह जहाँ अंगूठी टक करती थी।

"भाई साहब," मैंने कहा, "चाय अच्छी थी। पर एक बात बताऊँ?"

"बता।"

"जो ट्रक सिर्फ़ लोहे का ढेर मिलता है," मैंने कहा, "उसकी आवाज़ बंद हो जाती है। और जिसकी आवाज़ बंद हो जाए, उसे पूरा शहर ढूँढने निकलता है। आप शहर के मालिक हैं, आपको पता होना चाहिए।"

देवा भाई की आँखों में कुछ हिला। बहुत हल्का। जैसे तेल में एक बूँद पानी गिरे और अपनी अलग शक्ल बना ले।

"तू मुझे धमका रहा है?"

"नहीं, भाई साहब। मैं तो मज़दूर आदमी हूँ। धमकाना उनका काम होता है जिनके पास बहुत कुछ हो।" मैंने कहा। "मैं बस इतना कह रहा हूँ कि जब मेरा ट्रक निकलेगा, तो उसके पीछे पूरा शहर आवाज़ सुनेगा। और आप जानते हैं, आवाज़ वाले आदमी के पास सबसे पहले कौन पहुँचता है?"

"कौन?"

"सच," मैंने कहा।

देवा भाई ने कोई जवाब नहीं दिया।

मैं उठा। कुर्सी की आवाज़ तेज़ हुई। मैंने अपनी कमीज़ के नीचे हाथ फेरा, ताकि जेब में लगा वो छोटा काला माइक अपनी जगह पर रहे। मुझे लगा कि उनकी नज़र मेरी जेब तक आई। पर वो वहीं रुक गई, मेरी कलाई पर।

"ये घड़ी तेरे पापा की है ना?" उन्होंने पूछा।

"हाँ।"

"कितना समय दिखा रही है?"

"पाँच मिनट आगे।" मैंने कहा। "मैंने कभी ठीक नहीं की।"

देवा भाई मुस्कुराए। इस बार बिना मिठास के। ऐसी मुस्कान जिसमें कुछ बहुत पुराना दर्द छिपा था। मुझे यही बात सबसे ज़्यादा उलझाती थी — जब मैं उनसे नफ़रत करता, तो कहीं उनके कमरे में किसी बीमार का फ़ोन बजता रह जाता था, और जब मैं उन पर तरस खाता, तो उनकी आवाज़ में वो चीज़ आ जाती जो कहती कि अगली सुबह मेरा ट्रक लोहे का ढेर हो जाएगा।

मैंने दरवाज़े की तरफ़ क़दम बढ़ाया।

"अर्जुन।"

मैं रुका।

"तेरे पापा ने उस रात मुझसे कहा था, अगर मैं न लौटूँ तो मेरा बेटा आएगा।" देवा भाई ने कहा। "मैंने कहा था, आ जाने दे। मैं उसे भी वही चाय पिलाऊँगा जो तेरे पापा को पिलाई थी।"

मैंने पीछे मुड़कर देखा।

"और मैंने आपको क्या कहा था, भाई साहब?" मैंने कहा। "मैंने कहा था कि जो ट्रक बोलता है, वो मरता नहीं। पापा मर गए, पर ये शहर आज भी उनकी आवाज़ में बोलता है। आपने सुना है कभी? तीन सीधे निशान। सत्ताईस की रात। बाईस नंबर टोल। ये सब आवाज़ें हैं, भाई साहब, और मैं हर आवाज़ याद रखता हूँ।"

देवा भाई ने कुछ नहीं कहा।

पर जब मैं दरवाज़े से निकल रहा था, तो मैंने उनकी कुर्सी की आवाज़ सुनी। बहुत हल्की।

और मैंने ये भी सुना कि उनकी उँगली, जो मेज़ पर थी, अब काँप रही थी।

बाहर मुनीम जी खड़े थे। कालू दरवाज़े के पास, हाथ बाँधे।

"अर्जुन भाई, चाय पी ली?" मुनीम जी ने पूछा।

"पी ली। बहुत बढ़िया थी।"

"भाई साहब ने कुछ कहा?"

मैंने उनके कंधे पर हाथ रखा।

"कहा," मैंने कहा। "कहा कि इस शहर में हर आदमी की एक क़ीमत होती है। तो मुनीम जी, आप मुझे बताइए — आपकी क़ीमत क्या है?"

मुनीम जी हँसे। हँसी गले में ही अटक गई। उन्होंने कुछ नहीं कहा।

मैं धूप में निकला। सूरज सिर पर था और आँखें चौंधिया गईं। बाहर ट्रकों की क़तार लगी थी, कोई हॉर्न बजा रहा था, कोई हाथ से इशारा कर रहा था। मैंने अपनी कमीज़ के नीचे से वो काला माइक निकाला। बैटरी अभी बची थी। रेड लाइट धीरे-धीरे झपक रही थी।

मैंने साँस ली।

मुझे लगा था कि आज मैं उनके कमरे से कुछ बड़ा लेकर निकलूँगा। कोई काग़ज़, कोई नाम, कोई रसीद। पर मैं सिर्फ़ तीन चीज़ें लेकर निकला — एक ठंडी चाय, एक नया सवाल और एक आवाज़ जो मुझे अब तक किसी ने नहीं सुनाई थी।

अलमारी के अंदर वो जो हिला था।

मुझे पता था कि वो फ़ोन था। पर मुझे ये भी पता था कि जिस कमरे में दो फ़ोन हों और तीसरा अलमारी में बजे, तो उस तीसरे फ़ोन पर वो आवाज़ होती है जिसे दुनिया को सुनना नहीं चाहिए।

मैं टोल से पहले वाली सड़क पर चल पड़ा। नैना की गाड़ी वहीं खड़ी थी, धूल से ढकी, एक पहिया थोड़ा झुका हुआ। मैंने खिड़की पर हाथ रखा।

उसने शीशा नीचे किया। चश्मा नाक पर था, हाथ में पेन।

"कुछ बोला?" मैंने पूछा।

"तू अंदर था," उसने कहा। "मैंने कुछ सुना नहीं। पर मैंने तेरी आवाज़ गिनी। कम से कम चार बार तेरी आवाज़ ऊपर आई।"

"कितनी?"

"चार।"

मैं मुस्कुराया। "तो एक शब्द में बात नहीं बनी, नैना।"

उसने पेन नीचे रखा।

"क्या मिला?"

"चाय मिली," मैंने कहा। "और इतना पता चला कि मेरे पापा उस रात एक रजिस्टर लेकर उनके पास गए थे। और वो रजिस्टर उस कमरे से ग़ायब हो गया।"

नैना ने कुछ लिखा। फिर रुकी।

"ग़ायब हो गया या ग़ायब कर दिया गया?"

"यही सवाल मैं भी सोच रहा हूँ," मैंने कहा। "देवा भाई की आवाज़ में कंपन नहीं थी। पर उनकी उँगली काँप रही थी।"

"इसका मतलब?"

"इसका मतलब ये है कि आदमी की आवाज़ झूठ बोल सकती है, पर उसकी उँगली नहीं।" मैंने कहा। "वो रजिस्टर उनके पास नहीं है। वो सच बोल रहे थे। और उन्हें ये डर है कि वो किसके पास है।"

नैना ने अपना चश्मा ऊपर धकेला।

"तो अब क्या?"

मैंने अपनी घड़ी देखी। पाँच मिनट आगे। हमेशा की तरह।

"अब हम उस आदमी को ढूँढेंगे जो उस कमरे से रजिस्टर उठाकर ले गया," मैंने कहा। "और मुझे लगता है कि वो आदमी उस रात चाय पीने वालों में से ही कोई था।"

"कितने थे?"

"तीन," मैंने कहा। "मेरे पापा, देवा भाई, और वो जिसका नाम आज भी किसी काग़ज़ पर नहीं आता।"

मैं गाड़ी की तरफ़ चल पड़ा, फिर रुककर बोला, "और नैना, तेरे चौदह काग़ज़ों में एक और जुड़ गया है।"

"कौन सा?"

मैंने जेब से वो पीली पर्ची निकाली — जिस पर सत्ताईस सितंबर, दो गाड़ियाँ, दवा की खेप और चार सौ उन्नीस लिखा था। मेरे पास वो नहीं थी। मेरे पास सिर्फ़ उसकी नक़ल थी, मेरी सिली हुई कॉपी में, सातवें घर के नीचे।

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho