A Dark Secret – Chapter 91
"तू बदल गया है, बेटा।"
"मैं तो वैसा ही हूँ, भाई साहब। बस अब चाय मुफ़्त नहीं पीता।"
वो कुर्सी पर बैठे। उनकी अंगूठी मेज़ के काँच पर टक-टक करने लगी। उस आवाज़ में ऐसा कुछ था जो कह रहा था — मैं यहाँ मालिक हूँ, और तू यहाँ मेहमान है।
"इस शहर में हर आदमी की एक क़ीमत होती है, बेटा," उन्होंने कहा। "हर आदमी की। कोई दो हज़ार का है, कोई दो लाख का, और कोई सिर्फ़ एक कप चाय का। जिस दिन तू क़ीमत समझ जाएगा, उस दिन तू भी शहर वाला हो जाएगा।"
"और मेरी क़ीमत?"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। बहुत देर तक। फिर बोले, "तेरी क़ीमत तू खुद तय करेगा। पर क़ीमत तय करने वाले को हिसाब भी देना पड़ता है।"
कमरे में पंखा चल रहा था। ऊपर, छत पर, धीरे-धीरे। उसकी चरचराहट कभी-कभी इतनी तेज़ हो जाती थी जैसे बोल रही हो कि ये बातचीत अच्छी नहीं होने वाली।
"तेरे पापा भी मेरे बेटे थे," देवा भाई ने अचानक कहा।
मेरा हाथ गिलास पर रुक गया।
"हाँ, बेटा। बिल्कुल बेटे की तरह। मैंने उन्हें अपने हाथ से चाय पिलाई थी। उस रात भी पिलाई थी।"
मेरे अंदर कुछ हिला। ऐसे हिला जैसे स्टैंड पर रखा ट्रक हिलता है जब उसके नीचे से कोई पुर्ज़ा निकाल दे। मैंने गिलास हाथ में ही रखा और आँखें नीची रखीं।
"उस रात भी?" मैंने पूछा। आवाज़ मेरी अपनी थी, पर ऐसी लगी जैसे किसी और की हो।
"उस रात भी।" देवा भाई ने कहा। "मैंने उसे बुलाया था। समझाने के लिए। मैंने कहा था — रघुवीर, तू अपने हाथ से अपना घर मत जला। पर वो नहीं माना। उसने चाय पी, गिलास रखा, और चला गया।"
"और हाथ में क्या था?"
देवा भाई की अंगूठी फिर टक हुई।
"ये सवाल कितने आदमियों ने पूछा है, बेटा, तू जानता है?" उन्होंने कहा। "बहुत लोगों ने। पर जवाब किसी को नहीं मिला।"
"मुझे चाहिए।"
"क्यों?"
"क्योंकि मैं उसका बेटा हूँ," मैंने कहा। "और बेटे को पता होना चाहिए कि उसके पापा आख़िरी बार घर से क्या लेकर निकले थे।"
देवा भाई ने चाय का घूँट लिया। बहुत आराम से। जैसे कोई सोच रहा हो कि कितना बताए। फिर उन्होंने मेज़ पर गिलास रखा और बोले —
"उसके हाथ में एक रजिस्टर था।"
मैं शांत बैठा रहा। पर मेरे भीतर सब कुछ रुक गया था। पंखे की आवाज़ भी दूर हो गई थी।
"रजिस्टर?"
"काली जिल्द वाला। पुराना। उसमें उसके हिसाब थे। उसने मेज़ पर रखकर कहा — भाई साहब, अब ये हिसाब देख लीजिए, और फिर जो होगा, देखा जाएगा। मैंने कहा, बैठ, चाय पी। उसने कहा, नहीं, मुझे जल्दी है। और वो चला गया।"
"तो वो रजिस्टर?"
देवा भाई ने कुर्सी की पीठ पर हाथ रखा। मुस्कुराए। पर उस मुस्कान में अब कुछ और था। कुछ ऐसा जो सीधा मेरे सामने रखा जा रहा था, चुपचाप।
"वही तो सवाल है, बेटा। जब मैं वापस आया, रजिस्टर मेज़ पर नहीं था।" उन्होंने कहा। "और तब से आज तक नहीं मिला।"
कमरे में ऐसी चुप्पी आई जिसमें सिर्फ़ पंखे की चरचराहट और बाहर किसी ट्रक का हॉर्न बचा रह गया।
मैंने उस चुप्पी को सुना। मैंने उसकी आवाज़ सुनी। और मैंने ये भी सुना कि उनकी आवाज़ में वो हल्की कंपन थी या नहीं।
नहीं थी।
वो सच बोल रहे थे।
या वो इतने सालों से झूठ बोल-बोलकर इतना सीख गए थे कि उनकी आवाज़ भी अब उनके साथ झूठ बोलती थी। ये बात मुझे उस वक़्त नहीं पता थी। ये मुझे बहुत बाद में समझ आई, जब बनवारी का चश्मा टूटा मिला और टीटू ने अपनी छोटी चाबी वाली बात दोहराई।
"तो आप मुझे बता रहे हैं," मैंने धीरे से कहा, "कि मेरे पापा का रजिस्टर आपके कमरे से गया, और आपको पता नहीं कौन ले गया?"
"मैं तुझे ये बता रहा हूँ, बेटा, कि तेरे पापा ने अपने हाथ से अपना हिसाब बिगाड़ दिया।"
देवा भाई की आवाज़ में पहली बार मिठास से ज़्यादा कुछ और आया। धीमापन। "वो अच्छा आदमी था। पर अच्छा आदमी और सही आदमी — दोनों एक नहीं होते।"
मेरे हाथ की उँगलियाँ गिलास पर कस गईं।
मुझे उस दिन की गंध याद आई। दस साल पहले। हमारे आँगन में काग़ज़ जल रहे थे और अम्मा चूल्हे के पास बैठी रो रही थीं, और कोई कह रहा था कि हादसा हो गया। सिर्फ़ हादसा।
मेरी आवाज़ उलटी धीमी हो गई। ऐसा हमेशा होता है। जब मुझे गुस्सा आता है, मैं तेज़ नहीं बोलता। मैं धीमा बोलता हूँ। और यही सबसे बड़ा ख़तरा होता है, क्योंकि धीमी आवाज़ में आदमी अपना असली चेहरा दिखा देता है।
"भाई साहब," मैंने कहा, "मेरे पापा हिसाब बिगाड़ते, तो घर में बैठे होते। जो आदमी हिसाब बिगाड़ता है, वो भागता नहीं। वो पूछता है — कौन सा हिसाब, कहाँ का हिसाब, दिखाओ।"
देवा भाई मुस्कुराए। बहुत प्यार से।
"तू अपने पापा की तरह बोलता है, बेटा। बिल्कुल। वही ज़िद, वही गुस्सा। और वही जल्दबाज़ी।"
"जल्दबाज़ी नहीं, भाई साहब। मैंने आज सुबह से एक भी काम जल्दी में नहीं किया।"
"अच्छा?"
"मैंने चाय भी आपके बनाने का इंतज़ार किया।"
देवा भाई ने सिर हिलाया। फिर उन्होंने अपनी जेब से रुमाल निकाला और होंठ पोंछे। रुमाल साफ़ था, सफ़ेद, कोने पर छोटा सा कढ़ाई का निशान।
"कुछ चीज़ें होती हैं, बेटा," उन्होंने कहा, "जो जल्दी लौटा देना ही अच्छा होता है। ज़िंदगी में भी, काग़ज़ों में भी। जो चीज़ तेरी नहीं है, वो तेरे पास रखी भी अच्छी नहीं लगती। और जो चीज़ तेरे पास है, वो लौटा देने से आदमी हल्का हो जाता है।"
मैंने उनकी आँखों में देखा।
"कौन सी चीज़, भाई साहब?"
"तू समझ गया है।"
"नहीं समझा। मैं तो मज़दूर आदमी हूँ। मुझे सीधी बात चाहिए।"
देवा भाई ने कुर्सी पर थोड़ा झुककर कहा, "जो तेरे पास नहीं है, उसे मत ढूँढ। और जो तेरे पास है, उसे लौटा दे। बाक़ी भगवान भला करेगा।"
तभी अलमारी में कुछ हिला।
मैंने सुना। बहुत हल्का। एक कंपन, फिर एक और। जैसे किसी फ़ोन की घंटी दबी हुई हो, कपड़े में लिपटी हुई, और वो अपनी जगह पर दो बार हिलकर रह जाती हो।
मैंने देवा भाई की तरफ़ देखा।
उन्होंने अलमारी की तरफ़ नहीं देखा। एक बार भी नहीं।
पर उनकी अंगूठी की टक-टक रुक गई थी।
एक पल के लिए मुझे लगा कि वो मेरे कान की तरफ़ देख रहे हैं। फिर उन्होंने अपना कीमती चश्मा जेब से निकाला, पोंछा, और पहन लिया। काँच के पीछे से उनकी आँखें छोटी लगने लगीं।
"बेटा, तुझे पता है, इस कमरे में आने वाला हर आदमी ये सोचकर आता है कि वो मुझसे कुछ छिपा सकता है?" उन्होंने कहा। "कोई चाय पीता है, कोई बातें करता है, कोई रोता है, कोई मेरे पैर छूता है। पर कोई भी सीधा नहीं बोलता। तू सीधा बोलता है। यही तेरी अच्छाई है। और यही तेरी कमज़ोरी भी।"
"अच्छाई कमज़ोरी कैसे हो गई, भाई साहब?"
"क्योंकि सीधे आदमी का रास्ता सबको दिख जाता है।" उन्होंने कहा। "और जिसका रास्ता दिख जाए, उसको रोकना आसान होता है। फिर तेरे जैसा आदमी मुझे ग़लत नहीं लगता। मुझे ग़लत लगता है तेरे पीछे खड़ा आदमी। जो तुझे आगे धकेल रहा है।"
"मेरे पीछे कोई नहीं है।"
"है।" देवा भाई ने कहा। "और उसका नाम तू जानता है।"
अचानक सफ़ेद फ़ोन बजा।
देवा भाई ने उसे उलटा ही रहने दिया। नाम पढ़ा, स्क्रीन देखी, और उनका चेहरा ऐसे बदला जैसे किसी ने कमरे की रोशनी एक पल के लिए कम कर दी हो।
"हाँ," उन्होंने फ़ोन उठाकर कहा। "हाँ, अम्मा। दवा ले आया हूँ। रखी हुई है, वही मेज़ पर। तू बैठ क्यों रही है? बेटा, ज़रा सँभाल के…"
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