A Dark Secret – Chapter 90
"नीचे!" मैंने नैना का कंधा पकड़कर खींचा।
पत्थर हमारे ठीक पीछे, पुल के पत्थर पर लगा और टकराकर नीचे लुढ़क गया।
उसमें से एक काग़ज़ निकला। पतला, मुड़ा हुआ, और उस पर कुछ लपेटा हुआ था — एक पतला काला धागा, जो अब ढीला पड़ गया था।
नैना ने पहले देखा। "अर्जुन—"
"मत छू।"
"ये गिरा है, चलो—"
"मत छू।" मैंने दोबारा कहा और मैं खुद उतरकर पत्थर के पास गया।
पत्थर आम पत्थर नहीं था। वो लाल-भूरा था, चिकना, नए टूटे कोने वाला — ऐसा पत्थर सड़क किनारे नहीं मिलता। ऐसा पत्थर पुल के नीचे मिलता है जहाँ नदी बहती थी।
मतलब उठाया हुआ।
मैंने काग़ज़ खोला।
उस पर एक ही लाइन थी। छोटे, साफ़, छपे हुए अक्षरों में — टाइप किए हुए, हाथ से नहीं लिखे:
कल चाय ठंडी नहीं होगी।
बस इतना।
मैं वहीं बैठ गया।
नैना मेरे पास आकर बैठ गई और उसने काग़ज़ को मेरे हाथ में ही पढ़ा।
"ये धमकी है," उसने कहा।
"नहीं।" मैंने कहा।
"तो?"
"ये हिसाब है।" मैंने कहा। "ये काग़ज़ धमकी नहीं है। धमकी में डर होता है। इस काग़ज़ में एक भी शब्द डर का नहीं है। इसमें सिर्फ़ चाय है।"
मैंने उसे पलटा।
दूसरी तरफ़, कोने के पास, बहुत हल्का, पानी जैसे फीके नीले रंग का एक गोल निशान था। इतना फीका कि अगर धूप में न देखो तो दिखे ही नहीं।
वही निशान।
मैंने काग़ज़ को नाक के पास लाया। उसमें हल्की इलायची की गंध थी। और उसके नीचे चाय की। और उसके नीचे — स्याही की, जो अभी कुछ घंटे पुरानी थी।
मैंने काग़ज़ मोड़कर अपनी जेब में डाल लिया।
"अर्जुन।" नैना ने कहा। "तू ये क्या कर रहा है?"
"रख रहा हूँ।"
"ये सबूत है। इसे मेरे पास रहने दे। मैं इसे सील कर दूँगी —"
"नहीं।" मैंने कहा। "अगर ये तेरे पास रहेगा और कोई इसे ढूँढेगा, तो तेरे पास हाथ डालेगा। और मैं नहीं चाहता कि आज किसी के हाथ तेरी जेब तक जाएँ।"
वो चुप हो गई।
हम दोनों उस पुल पर बैठे रहे। नीचे हवा रेत उड़ा रही थी। दूर कहीं एक ट्रक ने हॉर्न बजाया, फिर एक और, फिर एक और — जैसे पूरा शहर एक साथ अपना गला साफ़ कर रहा हो।
"तेरे पास पाँच मिनट कम हैं," नैना ने कहा।
"मुझे पता है।"
"तू जाएगा?"
"जाऊँगा।" मैंने कहा।
"तो फिर ये काग़ज़ क्यों भेजा उसने?"
"क्योंकि वो चाहता है कि मैं जाऊँ।" मैंने कहा। "पर वो ये भी चाहता है कि मैं डरकर जाऊँ। डरा हुआ आदमी जल्दी बोलता है, जल्दी मान जाता है, और जल्दी अपनी जेब दिखा देता है।"
मैं उठा। अपनी कमीज़ झाड़ी। बालों में हाथ फेरा।
"पर एक बात है," मैंने कहा।
"क्या?"
"जो आदमी धमकी देता है, वो 'कल' नहीं लिखता।" मैंने कहा। "वो 'आज' लिखता है। क्योंकि उसे आज ही डराना होता है। 'कल' लिखने का मतलब है कि उसने ये काग़ज़ कल लिखा था। या किसी को कल से पता था कि आज क्या होगा।"
नैना ने मेरी तरफ़ देखा।
"यानी ये काग़ज़—"
"यानी ये काग़ज़ पहले लिखा गया था," मैंने कहा। "और आज सिर्फ़ फेंका गया है। ये तैयारी है, नैना। ये गुस्से में नहीं लिखा गया।"
मैंने पुल से नीचे उतरते हुए कहा, "और अगर आज चाय ठंडी ही होनी है, तो मैं उसे ठंडी ही पीऊँगा। पर मैं उसकी मेज़ पर नहीं पीऊँगा।"
"तो कहाँ पीएगा?"
"अपनी जगह पर," मैंने कहा। "वो जहाँ चाय दे, मैं वहाँ पीऊँगा। पर जो हिसाब मैं लेकर जाऊँगा, वो उसकी मेज़ का नहीं होगा। वो मेरी जेब का होगा।"
नैना भी उठी। उसने अपना बैग कंधे पर चढ़ाया और चश्मा ऊपर धकेला।
"मैं पीछे-पीछे आऊँगी," उसने कहा। "गाड़ी में। टोल से पहले रुक जाऊँगी। अंदर नहीं आऊँगी।"
"अच्छा।"
"और अगर तू एक शब्द भी बोलेगा," उसने कहा, "तो मैं सीधे थाने जाऊँगी और शोर करूँगी। चाहे कुछ भी हो जाए।"
"एक शब्द कौन सा?"
"कोई भी।" उसने कहा। "क्योंकि जब तू अंदर होगा और तेरी आवाज़ बाहर आएगी, तो उसका मतलब है कि तू फँस गया।"
मैंने सिर हिलाया।
हम सड़क तक चले आए। उसकी गाड़ी वहीं खड़ी थी, धूल से ढकी, एक पहिया थोड़ा झुका हुआ।
"नैना।"
"हाँ।"
"तेरे पास चौदह काग़ज़ हैं।"
"हाँ।"
"आज शाम तक पंद्रह हो जाएँगे।" मैंने कहा। "ये काग़ज़ मैं तेरे हिसाब में नहीं जोड़ रहा। पर जो लिखा है, वो सच है — कल चाय ठंडी नहीं होगी। और मुझे लगता है कि ये चाय आज किसी और के लिए बन रही है।"
मैं अपनी जेब में हाथ डालकर चल पड़ा।
टोल की तरफ़। दस बजे की तरफ़।
और चलते-चलते मैंने अपनी घड़ी फिर देखी। पाँच मिनट आगे।
पापा हमेशा जल्दी निकलते थे।
और पापा कभी नहीं लौटे।
मैंने क़दम तेज़ कर दिए।
पीछे से नैना की गाड़ी का इंजन बोला — वो पुराना, थका हुआ, धड़म-धड़म वाला इंजन, जिसमें एक पहिया अलग बोलता था और ऊपर का धातु का फ्रेम हर गड्ढे पर हल्का खनकता था।
मुझे वो आवाज़ अच्छी लगी।
क्योंकि वो आवाज़ ईमानदार थी। वो कुछ छिपा नहीं रही थी।
सफ़ेद गाड़ी की आवाज़ ऐसी नहीं थी।
और मुझे अब यही सीखना था — जो आवाज़ बहुत साफ़ हो, उससे पहले उसके नीचे छिपी चीज़ ढूँढनी पड़ती है।
दस बजे मैं उस कमरे में था।
और चाय, जैसा लिखा था, ठंडी नहीं थी।
वो अभी बन ही रही थी।
॥
चाय अभी बन ही रही थी।
केतली से भाप उठ रही थी और कमरे में इलायची की महक ऐसे फैल रही थी जैसे किसी ने पूरे कमरे पर चादर बिछा दी हो। बाहर धूप थी, पर इस कमरे में एक अलग ही मौसम था। ठंडा। साफ़। बहुत ज़्यादा साफ़।
मैं दरवाज़े पर खड़ा था और मेरे पीछे कालू खड़ा था, जेब में प्लायर ठक-ठक करता हुआ। मुनीम जी आगे आए, पतले, झुके हुए, हाथ जोड़े हुए।
"आइए, आइए, अर्जुन भाई। भाई साहब आपका ही इंतज़ार कर रहे थे। चाय बन रही है। इलायची वाली।"
"अरे मुनीम जी," मैंने कहा, "मुझे इंतज़ार में रखने का काम भाई साहब का है, आपका नहीं। आप तो हिसाब रखने वाले आदमी हो। आप गिनती रखिए, इंतज़ार भाई साहब खुद कर लेंगे।"
मुनीम जी हँसे। ऐसी हँसी जिसमें हँसी कम और डर ज़्यादा था। फिर उन्होंने दरवाज़ा खोल दिया।
कमरा बाहर से सादा था। अंदर से ऐसा था जैसे किसी ने धूल को बाहर ही छोड़ दिया हो। फ़र्श पर लाल कालीन, दीवार पर एक ही तस्वीर, एक लकड़ी की मेज़, दो कुर्सियाँ, एक पुरानी अलमारी जिसका रंग थोड़ा उतरा हुआ था और जिसकी चाबी देवा भाई की जेब में थी। मुझे वो चाबी नहीं दिख रही थी, पर मुझे पता था कि वही है, क्योंकि चलते वक़्त उनकी जेब में धातु की एक छोटी सी टक-टक हो रही थी।
मेज़ पर दो फ़ोन रखे थे। एक काला, एक सफ़ेद। सफ़ेद वाला उलटा पड़ा था, स्क्रीन नीचे की तरफ़।
"आ, बेटा। बैठ।"
देवा भाई उठे। सफ़ेद कुर्ता-पाजामा, इस्त्री किया हुआ, कहीं एक भी सिलवट नहीं। सोने की अंगूठी उँगली पर, चश्मा जेब से आधा बाहर। भारी शरीर, पर चलने में उतनी ही हल्की आवाज़ जितनी बिल्ली की होती है।
उन्होंने खुद चाय उठाई। केतली से गिलास में डाली। दूर से, ऊँचाई से, जैसे कोई ढाबे वाला डालता है। चाय की धार का अपना ही गाना था। फिर गिलास मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।
"ले। इलायची वाली है। तेरे पापा को भी इलायची वाली ही पसंद थी।"
मैंने गिलास लिया। उँगली जल गई। मैंने उसे नीचे रख दिया।
"भाई साहब," मैंने कहा, "मेरी दुकान पर चाय ठंडी हो रही है।"
देवा भाई एक पल रुके। फिर हँसे। छोटी सी हँसी, नपी-तुली, जैसे किसी ने हँसी को मापकर छोड़ा हो।
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