A Dark Secret – Chapter 9
मैं खड़ा हुआ। अपने कपड़ों पर लगी कीचड़ को झाड़ी। मेरे हाथ काँप रहे थे और मुझे यह नहीं दिखाना था कि काँप रहे हैं। इसलिए मैंने दोनों हाथ जेब में डाल दिए।
मेरी बाईं जेब में रुमाल और तार था। मेरी दाईं जेब में पैसे और पापा की घड़ी के लिए एक पुरानी रसीद।
जब मैंने दायाँ हाथ जेब में डाला, तो मेरी उँगलियाँ किसी धातु की नोक पर टिकीं।
चुभी।
मैंने हाथ वापस खींचा। देखा — उँगली पर खून की एक छोटी बूँद। फिर मैंने धीरे से जेब में हाथ डाला और उस चीज़ को बाहर निकाला।
केबल का एक टुकड़ा। छोटा। मेरे अंगूठे के नाखून से बड़ा नहीं। साफ़ कटा। सिरा सपाट। तेल में डूबा।
मेरा दिल धक् से रह गया।
यह वो टुकड़ा नहीं था जो मैंने सुबह उठाया था। वो लंबा था, एक बालिश्त से ज़्यादा। और वो अभी भी मेरी बाईं जेब में रुमाल में लिपटा था।
यह एक नया टुकड़ा था। छोटा। और यह अभी किसी ने मेरी जेब में डाला था।
कब? कैसे?
मेरा दिमाग़ दौड़ने लगा। भीड़ में जब धक्का लगा था, तब। जब क्रेन की ज़ंजीर चरमराई और सब आगे बढ़े थे। किसी ने मेरे पीछे से हाथ बढ़ाया और यह टुकड़ा मेरी जेब में खिसका दिया। इतनी सफ़ाई से कि मुझे पता भी नहीं चला।
कौन?
कालू?
पर क्यों? अगर वो सबूत मिटा रहा था, तो मुझे नया सबूत क्यों देगा?
या फिर यह कोई और था?
मैंने चारों तरफ़ देखा। भीड़ वैसी ही थी। सिपाही वहीं था। ट्रेलर पर ट्रक चढ़ रहा था। कोई किसी की तरफ़ नहीं देख रहा था।
मैंने उस छोटे टुकड़े को रुमाल के अंदर, पहले टुकड़े के साथ लपेट दिया। दोनों अब एक ही रुमाल में थे। दो टुकड़े। दो कटे सिरे। दो सवाल।
और मैं सोचने लगा — क्यों?
अगर कालू ने मुझे फँसाना होता, तो यह टुकड़ा मेरी जेब में डालने की ज़रूरत नहीं थी। वो सीधे सिपाही को बुला सकता था और कह सकता था, "साहब, इस लड़के की जेब देखिए।"
पर उसने नहीं किया। उसने चुपचाप, इतनी सफ़ाई से यह मेरी जेब में रखा, जैसे कोई उपहार दे रहा हो। या कोई चेतावनी।
या शायद… कोई संदेश।
मैंने एक लंबी साँस ली। फिर मैंने धीरे से कहा, अपने ही अंदर, "खेल शुरू हो गया है, अर्जुन।"
उसी वक़्त सिपाही की आवाज़ आई। "ओए, तू! इधर आ।"
मैं चौंका। सिपाही मेरी तरफ़ ही देख रहा था।
मेरा पेट कस गया।
वो मेरे पास आया। हाथ में रजिस्टर। आँखों में वो सरकारी थकान जो हर सिपाही की आँख में होती है।
"नाम?"
"अर्जुन," मैंने कहा।
"कहाँ से?"
मैंने एक पल सोचा। फिर कहा, "सिमरिया। मध्य प्रदेश।"
"यहाँ काम क्या?"
"मैकेनिक। तेरे-तुम्हारे ट्रक ठीक करता हूँ।"
सिपाही ने मुझे ऊपर से नीचे देखा। कीचड़ में सना मेरा कुर्ता। कटी हुई उँगली। टूटी सिलाई वाली घड़ी।
"यहाँ क्यों खड़ा है?"
"तमाशा देख रहा था, साहब।"
"तमाशा?" उसने पलक झपकाई। "ये तमाशा नहीं है, बेटा। ये हादसा है।"
"हादसा ही तो तमाशा है, साहब," मैंने कहा। "जिसको देखने के लिए भीड़ जमा होती है।"
वो मेरी तरफ़ देखता रहा। फिर उसने अपनी रजिस्टर में कुछ लिखा और बिना कुछ कहे आगे बढ़ गया।
मैं वहीं खड़ा रहा। साँस रोके।
इतना सन्नाटा तो नहीं था, पर मुझे लगा जैसे पूरी सड़क मेरी साँस सुन रही है।
फिर भीड़ में से एक और आवाज़ आई। इस बार पीछे से। "ओ भाई, तू वही है न? जो सुबह ट्रक के नीचे गया था?"
मैं मुड़ा।
एक आदमी था। पतला। पैंतीस-चालीस के बीच। हाथ में चाय का गिलास। पर यह कोई आम चायवाला नहीं था — इसकी कमीज़ नीली थी, और कमीज़ की जेब पर एक छोटा सा बैज चमक रहा था, जिस पर लिखा था — "खनन विभाग"।
"हाँ," मैंने कहा।
"तू वही है जिसने केबल निकाली थी?"
मेरा दिल एक बार फिर धक् हुआ।
"केबल?"
"हाँ, वो कटी हुई। जो ट्रक के नीचे लटक रही थी। मैंने देखा था। तूने उसे उतारा।"
मैंने चारों तरफ़ नज़र दौड़ाई। कोई सुन तो नहीं रहा? सिपाही दूर जा चुका था। क्रेन की आवाज़ तेज़ थी।
"तुमने देखा?" मैंने धीरे से पूछा।
"देखा।" उसने चाय का घूँट लिया। "और अब मैं तुझे एक बात बताता हूँ। वो ट्रक के नीचे सुबह तीन आवाज़ें थीं। तीन। मैंने भी सुना था।" उसने उँगली उठाई। "पहली — क्रेन की ज़ंजीर। दूसरी — तेरे पैरों की आहट। और तीसरी…" वो रुका।
"तीसरी?"
"तीसरी वो थी जो मुझे सुनकर लगा कि मेरे पीछे कोई खड़ा है।" उसने पीछे देखा, जैसे अब भी डर रहा हो। "पर जब मैंने पलटकर देखा, तो कोई नहीं था। सिर्फ़ एक आदमी दूर जा रहा था। बनियान पहने हुए। गले में काला धागा।"
कालू।
मेरे हाथ मुट्ठी में बंध गए।
"तुमने उसे पहचाना?" मैंने पूछा।
"नहीं। पर मैंने सुना है वो यहाँ का पुराना आदमी है। किसी बड़े आदमी के लिए काम करता है।" उसने चाय का आख़िरी घूँट लिया और गिलास पास की रेहड़ी पर रख दिया। "सुन, बेटा। मैं यहाँ खनन विभाग में हूँ। मुझे इन झगड़ों से मतलब नहीं। पर एक बात कहूँ?"
"कहो।"
"जो चीज़ तूने सुबह निकाली, वो अब तेरे पास है। इसे किसी को मत दिखाना। और…" वो मेरे कान के पास झुका। "इस शहर में जो आदमी सबसे ज़्यादा हँसता है, वही सबसे ज़्यादा डरता है।"
वो पलटकर चला गया। भीड़ में घुल गया। मैं उसका नाम भी नहीं पूछ पाया।
मैं वहीं खड़ा रहा। मेरे सामने ट्रेलर पर ट्रक चढ़ चुका था। क्रेन अब खाली थी और उसकी ज़ंजीर ढीली लटक रही थी। सिपाही रजिस्टर बंद कर रहा था। भीड़ बिखरने लगी थी।
पर मैं नहीं हिला।
क्योंकि एक बात मेरे दिमाग़ में लगातार गूँज रही थी।
यह शहर आवाज़ों से चलता है।
कालू का प्लायर — वो आवाज़ मैंने सुबह सुनी। ध्यान नहीं दिया। अब समझ आया — वो प्लायर सिर्फ़ औज़ार नहीं। वो कालू का हस्ताक्षर है। जब भी वो किसी चीज़ को काटता है, वो प्लायर उसकी जेब में बजता रहता है। जैसे कोई लेखक अपनी किताब के हर पन्ने पर अपना नाम लिखता हो।
और आज उसने मुझे यह नाम दिया। मेरी जेब में एक छोटा सा टुकड़ा डालकर।
क्यों?
मेरे दिमाग़ में एक ही जवाब आ रहा था — क्योंकि वो चाहता है कि मैं खेलूँ। वो चाहता है कि मैं इस टुकड़े को लेकर आगे बढ़ूँ। वो मुझे ट्रैक पर रख रहा है।
और मैं उस ट्रैक पर चलूँ या नहीं, यह मेरी मर्ज़ी है।
मैंने अपना रास्ता बदला। थाना छब्बीस नंबर की तरफ़ जाने वाली सड़क छोड़कर मैं एक गली में मुड़ गया। वहाँ एक छोटी सी चाय की दुकान थी, जिसके बाहर एक बेंच पड़ी थी। मैं बेंच पर बैठ गया और अपने दोनों हाथ गोद में रख लिए।
फिर मैंने धीरे से रुमाल निकाला। उसे खोला। दोनों टुकड़े मेरी हथेली पर पड़े थे।
एक लंबा। एक छोटा।
दोनों साफ़ कटे। दोनों तेल में। दोनों के सिरे सपाट।
मैंने दोनों को मिलाकर देखा। लंबे टुकड़े की लंबाई और छोटे टुकड़े की लंबाई जोड़ो, तो लगभग एक पूरी केबल बनती थी।
पर एक बात खटकी।
छोटे टुकड़े पर एक हल्की सी लकीर थी। जैसे किसी ने उसे गाड़ी में लगाने की कोशिश की हो और फिर वापस काट दिया हो। या जैसे कोई पुराना टुकड़ा हो जो पहले किसी और गाड़ी में लगा था।
मतलब?
मतलब यह टुकड़ा मोती की गाड़ी का नहीं था। यह किसी और गाड़ी का था। और किसी ने इसे जान-बूझकर मेरी जेब में रखा।
तो सवाल यह नहीं था कि केबल किसने काटी थी। सवाल यह था — यह दूसरा टुकड़ा किस गाड़ी का था, और यह मेरी जेब तक कैसे पहुँचा?
मैंने रुमाल में दोनों टुकड़े लपेटे और जेब में रखे। फिर मैंने अपनी घड़ी फिर देखी। पाँच बज चुके थे।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno