A Dark Secret – Chapter 8
वो एक पल मुझे देखता रहा। फिर उसने अपनी जेब से लिफाफा निकाला और एक पल उसे देखा। फिर वो वापस जेब में डाल दिया और बिना कुछ कहे लंगड़ाते हुए चला गया।
मैं वहीं खड़ा रहा। सामने क्रेन ट्रक को ऊपर उठा रही थी। ट्रक के पहिये हवा में हिल रहे थे, जैसे कोई जानवर अपने पैर हिला रहा हो। और ट्रक के नीचे, सड़क पर, तेल की काली लकीर फैल रही थी।
मैंने जेप से रुमाल निकाला और तार को उँगलियों में घुमाया। तेल की चमक अब भी उस पर थी। छोटी, ताज़ा, चमकदार।
और मेरे कानों में दूर से एक आवाज़ आई — किसी ट्रक की आवाज़, जो सड़क पर दौड़ रही थी, बाईस नंबर टोल से दूर, शहर के बाहर की तरफ़।
मैंने सिर उठाया। धूप ढल चुकी थी और सामने अंधेरा आ रहा था। मेरे पैरों के नीचे धूल थी, जेब में तार और रुमाल, और कलाई पर पापा की घड़ी जो पाँच मिनट आगे थी।
उस शाम मैंने एक बात तय की। अगर यह शहर काग़ज़ों से चलता है, तो मैं इस शहर को आवाज़ों से पढ़ूँगा। काग़ज़ बहुत लोगों के हाथ से होकर आता है, पर आवाज़ सिर्फ़ उसी के मुँह से निकलती है जो सच जानता है — या जो झूठ बोलने से डरता है।
मैंने अपनी जेब में तार वापस रखा और सड़क के उस पार चल दिया, जहाँ से थाना छब्बीस नंबर जाने का रास्ता था।
पीछे क्रेन ने ट्रक को ऊपर उठाया और उसकी छाया सड़क पर लंबी हो गई। मैं उस छाया से बाहर निकला और सड़क पर चलने लगा।
अभी मुझे थाने जाना था। और मुझे लग रहा था कि वहाँ मुझे वो मिलेगा जो मैं ढूँढ रहा हूँ — या वो जो मुझे ढूँढ रहा है।
॥
सड़क के उस पार पहुँचा, तो देखा कि थाना छब्बीस नंबर का रास्ता मुझे गोल घुमा रहा था। क्योंकि जो भीड़ सुबह ट्रक के आसपास थी, वो अब उसी सड़क से आगे खिसककर नए जगह पर जमा हो रही थी। क्रेन ने ट्रक को ऊपर उठाकर एक बड़े ट्रेलर पर रखना शुरू किया था। लोहे की ज़ंजीर चरमरा रही थी और हर चरमराहट पर भीड़ का एक झुंड आगे बढ़ जाता।
मैंने अपने कदम धीमे कर दिए। सामने धूल उड़ रही थी, और उस धूल के पीछे खड़ी थी एक लंबी सफ़ेद गाड़ी, जिसकी छत पर लाल बत्ती घूम रही थी।
पुलिस।
मुझे रुकना पड़ा। दो सिपाही रस्सी खींचकर भीड़ को पीछे धकेल रहे थे, और एक सिपाही हाथ में रजिस्टर लिए हर आदमी का नाम पूछ रहा था। भीड़ में कोई हँस रहा था, कोई फ़ोन पर रिकॉर्डिंग कर रहा था, कोई चाय की केतली उठाए खड़ा था।
मैंने अपने आप को भीड़ के पीछे रखा और आँखें झुकाकर ज़मीन देखने लगा।
क्योंकि मुझे पता था कि वो जगह अभी भी वहीं है। जहाँ सुबह ट्रक का पिछला हिस्सा था, वहाँ अब सिर्फ़ तेल की काली लकीर बची थी — लंबी, टेढ़ी, जैसे किसी ने उँगली से कीचड़ पर लकीर खींची हो। और उसी लकीर के किनारे, आधा कीचड़ में धँसा हुआ, पड़ा था केबल का एक और टुकड़ा।
साफ़ कटा। चमकदार। तेल में डूबा।
मेरी जेब में पहले से एक टुकड़ा था। पर वो टुकड़ा ट्रक के नीचे लटक रहा था। ये टुकड़ा कहीं और से आया था — शायद इसी ट्रक का दूसरा सिरा, जो सुबह क्रेन के झटके से टूटकर यहाँ गिरा था। या फिर शायद… किसी ने ये टुकड़ा वहाँ से हटाकर यहाँ फेंका था, ताकि कोई इसे न देख सके।
पर मैंने देख लिया। बस देखा ही। उठाया नहीं।
क्योंकि उस टुकड़े के ठीक पीछे खड़ा था एक सिपाही। हाथ में लाठी, कमर पर बेल्ट, आँखें चारों तरफ़ घुमाती हुई — ऐसी आँखें जो अभी किसी को पकड़ने की तलाश में थीं।
मैं रुक गया। जेब में हाथ डालकर खड़ा रह गया, जैसे कोई आम आदमी सिर्फ़ तमाशा देखने आया हो।
मेरी उँगलियों ने जेब में तार महसूस किया। वही टुकड़ा, जो मैंने सुबह रुमाल में लपेटा था। रुमाल अब भी तेल से भीगा था, और मेरी जेब की परत उससे चिपक रही थी।
मैंने अपनी बाईं कलाई देखी।
पापा की घड़ी। सफ़ेद चमड़े का पट्टा, जिसकी सिलाई दो जगह फटी थी और तीन जगह काले धागे से मैंने खुद सिली थी। घड़ी अभी भी पाँच मिनट आगे चल रही थी। जब पापा ज़िंदा थे, तब भी यही पाँच मिनट आगे चलती थी। वो कहते थे, "बेटा, दुनिया से पाँच मिनट आगे चलना सीख। जो पीछे चलता है, उसकी केबल कभी भी कट सकती है।"
आज पापा की वो बात किसी चाकू की तरह मेरे अंदर घुसी।
मैंने घड़ी देखी। शाम के चार बजकर दस मिनट। यानी असल में चार बजकर पाँच मिनट।
सिपाही ने क्रेन की तरफ़ देखा। ज़ंजीर फिर चरमराई। भीड़ एक और कदम आगे बढ़ी। मैंने मौक़ा देखा। सिपाही का सिर घूमा तो मैं आधा झुक गया।
और ठीक उसी वक़्त, मेरे कान में एक आवाज़ आई।
हल्की सी। किसी धातु की। जैसे कोई प्लायर जेब में खुला पड़ा हो और चलते वक़्त आपस में टकरा रहा हो। ठक। ठक। ठक।
मैं उस आवाज़ को जानता था।
क्योंकि यही आवाज़ मैंने सुबह सुनी थी। ट्रक के नीचे। जब मैं केबल का पहला टुकड़ा उठा रहा था, तब भी वहीं कहीं, पीछे, यही हल्की बजने की आवाज़ आई थी। मैंने उस वक़्त उसे हवा का शोर समझकर छोड़ दिया था।
अब वो आवाज़ फिर आई। और इस बार मैंने पलटकर देखा।
भीड़ के पीछे, एक खंभे के सहारे, खड़ा था एक आदमी। चौड़ा शरीर। सफ़ेद बनियान, ऊपर खुली कमीज़, गले में काला धागा जिसमें एक छोटी सी काली माला लटक रही थी। भौंह पर एक पुराना कटा निशान — बाल नहीं उगा वहाँ, सिर्फ़ चमड़ी की सफ़ेद लकीर।
कालू।
वो मुझे देख रहा था। और मुस्कुरा रहा था।
ऐसी मुस्कान नहीं जो किसी को खुश करे। ऐसी मुस्कान जो कहती हो — देख रहा हूँ, बेटा, तू क्या करता है। जैसे शतरंज में कोई अपनी चाल चल चुका हो और अब बस तेरी चाल का इंतज़ार कर रहा हो।
और उसकी जेब से वो आवाज़ आ रही थी। ठक। ठक। ठक।
मेरे पेट में एक ठंडी सी लहर गई। ऊपर से नीचे तक। जैसे कोई बर्फ़ का टुकड़ा रीढ़ पर रख दे।
मैंने नज़रें हटाईं और फिर ज़मीन की तरफ़ देखा। केबल का टुकड़ा अब भी वहीं पड़ा था।
मैं फिर झुका।
और ठीक उसी पल, क्रेन की ज़ंजीर एक बार और चरमराई — इस बार ज़्यादा तेज़। कोई चीखा, "पीछे हटो! पीछे हटो!" और भीड़ एक साथ आगे बढ़ गई। मैं भी धकेल दिया गया। मेरा कंधा किसी के बैग से टकराया। एक औरत का थैला मेरे हाथ से छूटा। और जब मैंने उसे उठाकर वापस दिया और फिर झुककर नीचे देखा —
वहाँ सिर्फ़ कीचड़ था।
केबल का टुकड़ा ग़ायब था।
मैंने आँखें मलीं। ज़मीन पर घुटने टेककर देखा। हाथ से कीचड़ हटाया। पर नहीं। गायब। जैसे कभी था ही नहीं।
मैंने पीछे देखा।
कालू खंभे के सहारे से हट चुका था और अब वो दूर जाकर एक ट्रक के पीछे खड़ा था। हाथ जेब में। सिर झुका। और जैसे ही मैंने उसे देखा, उसने अपना हाथ जेब से निकाला और — मैं साफ़ देख रहा था — अपनी उँगलियों से कुछ साफ़ किया। जैसे किसी चीज़ की धूल झाड़ रहा हो। फिर वो ट्रक के पीछे से ग़ायब हो गया।
मेरी साँस रुक गई।
मैं वहीं खड़ा रहा। घुटनों के बल। कीचड़ में। आधा झुका हुआ। मेरे सामने ट्रेलर पर चढ़ा हुआ ट्रक, उसके पहिये हवा में, पेट के नीचे तेल टपकता हुआ।
और मेरे भीतर एक ही आवाज़ गूँज रही थी — वो आवाज़।
ठक। ठक। ठक।
काले धागे वाला आदमी। प्लायर। और वो मुस्कान जो सब जानती है।
मुझे समझ आ गया कि सुबह ट्रक के नीचे मैंने जो आवाज़ सुनी थी, वो हवा नहीं थी। वो वही प्लायर था। कालू का प्लायर। यानी कालू उस वक़्त वहाँ था। ट्रक के नीचे। मेरे पीछे। जब मैं केबल का पहला टुकड़ा उठा रहा था।
वो मुझे देख रहा था। और मुझे पता नहीं चला।
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