A Dark Secret – Chapter 7
"तो सुन ले।" उसने आवाज़ और नीची की। "उस रात टोल पर बल्लू भाई की ट्रक आई। ग्यारह बजे। मैं यहीं था। मैंने देखा, टोल पर रसीद कटी। और उसके बाद बल्लू भाई ने ट्रक वहीं, गोदाम के पीछे खड़ी की थी। कुछ पंद्रह मिनट।"
"पंद्रह मिनट?"
"हाँ। और उसी दौरान कालू भाई वहाँ था।"
मेरे कान में एक आवाज़ बजी। जैसे किसी पुराने ताले की चाबी घूम गई हो।
"कालू भाई उसके पास क्यों आए थे?"
"मुझे नहीं पता।" उसने कहा। "मैं सिर्फ़ देखता हूँ। सुनता नहीं। तू सुनता है, तो तू जाने।" उसने गिलास मेरी तरफ़ बढ़ाया। "अब ले ले। वरना ठंडी हो जाएगी।"
मैं चाय नहीं पिया। मैं टोल से उल्टा मुड़ा और सड़क के किनारे चलने लगा। पीछे गोदाम की छत दिख रही थी, जहाँ देवा बैठा था। उसकी खिड़की से रोशनी आ रही थी, जो धीरे-धीरे बुझ रही थी।
जैसे ही मैं सड़क के टोल से निकला, किसी ने मुझे पुकारा। "अर्जुन।"
मैं मुड़ा। एक आदमी सड़क के किनारे खड़ा था। पतला, हल्की दाढ़ी, साफ़ कपड़े, हाथ में एक छोटा बैग।
"मैं कबीर हूँ," उसने कहा। "गाड़ी महल की दुकान है मेरी। सुना है तूने पलटी हुई ट्रक के नीचे से कुछ निकाला।"
मेरा हाथ फिर जेब पर गया। "किसने बताया?"
"चायवाले ने।" वो मुस्कुराया। "यहाँ चायवाला सब जानता है। पर किसी को कुछ नहीं बताता। तुझे बताया, इसका मतलब तू ख़ास है।"
"तो?"
"तो मैं सिर्फ़ ये कहने आया हूँ — जो तूने निकाला है, वो अपने पास रख। और किसी को मत दिखा। ख़ासकर उन लोगों को, जो अपने आप को प्रशासन कहते हैं।"
"क्यों?"
"क्योंकि जो काग़ज़ कलम से लिखा जाता है, वो सच नहीं होता।" उसने अपना बैग उठाया। "और जो आवाज़ से बताया जाता है, वो कभी-कभी सच होता है।"
वो मुड़ा और चला गया। मैंने उसे जाते देखा। उसके जाने के बाद मैं कुछ देर वहीं खड़ा रहा, सड़क के किनारे, जहाँ धूल हवा में तैर रही थी।
अब मुझे थाना छब्बीस नंबर जाना था।
पर पहले मैं उस हादसे की जगह पर लौटा। क्रेन अब आ चुकी थी। ट्रक को ऊपर उठाकर रस्सियों से बाँधा जा रहा था। भीड़ छँट गई थी। सिर्फ़ दो आदमी रस्सी खींच रहे थे और एक सिपाही सिगरेट पी रहा था।
और वहाँ, ट्रक के पीछे, एक जीप खड़ी थी। उसी जीप से इंस्पेक्टर शेखर तिवारी उतरे।
उनकी मूँछ चमक रही थी, जैसे अभी-अभी तेल लगाया हो। हाथ में वही फाइल थी, जिसके नीचे एक मुड़ा हुआ नोट दबा था। उन्होंने मुझे देखा और मुस्कुराए, फिर सीधे उस सिपाही के पास गए।
"रिपोर्ट तैयार है?"
"जी साहब।"
उन्होंने फाइल खोली, बिना ट्रक की तरफ़ देखे। कलम निकाली। तारीख़ डाली। नाम डाला। कुछ और लिखा। फिर फाइल बंद की और सिपाही को थमा दी।
"काग़ज़ पर सब लिखा है बेटा," उन्होंने मेरी तरफ़ मुड़कर कहा। "यहाँ देखने की क्या ज़रूरत।"
मैंने कहा, "साहब, ट्रक के नीचे कुछ और भी है।"
"क्या?"
"केबल। ब्रेक की।"
उन्होंने सिपाही की तरफ़ देखा। सिपाही ने कंधा उचकाया।
"केबल टूटी है," तिवारी ने कहा, जैसे कोई पाठ पढ़ रहा हो। "पुरानी गाड़ी है। ऐसा होता है।"
"साहब, ये टूटी नहीं, कटी है।"
वो रुके। एक पल के लिए। और उस पल में मैंने उनकी आवाज़ सुनी — उसके अंदर की आवाज़। वो काँपी। हल्की। बहुत हल्की। वैसे ही जैसे देवा की काँपी थी जब उसने कहा था कि ये मैं नहीं बताऊँगा।
मैंने कुछ नहीं कहा। बस जेब में हाथ डालकर खड़ा रहा।
तिवारी ने अपनी फाइल फिर खोली। "तू कौन है?"
"अर्जुन। रामलाल का भतीजा।"
"रामलाल?" वो एक पल सोचकर बोले। "अच्छा। वही रामलाल, जिसका नाम टोल के काग़ज़ों में आता है।"
"साहब, चाचा कल रात से लापता हैं।"
तिवारी की मूँछ हिली। "लापता? तू अभी आया है, और तुझे पता है कि वो लापता हैं?"
"चाची ने बताया।"
"तो चाची को बोल, थाने आकर रिपोर्ट लिखवाए।"
"साहब, रिपोर्ट कब लिखी जाएगी?"
वो एक पल मुझे देखते रहे। फिर उन्होंने वो मुड़ा हुआ नोट फाइल के नीचे से निकाला और उसे अपनी जेब में रख लिया।
"अभी तो हादसे की रिपोर्ट लिख रहा हूँ," उन्होंने कहा। "तेरे चाचा की रिपोर्ट बाद में।"
मैंने कहा, "साहब, एक बात पूछूँ?"
"पूछ।"
"बल्लू भाई से आपने क्या कहा?"
उनका चेहरा नहीं बदला। पर उनकी आवाज़ में वो कंपन फिर आई। "कुछ नहीं। बस ये कहा कि बीमा का काम करवा दिया है। तीन महीने में पैसा आ जाएगा।"
मैंने कहा, "अच्छा।" और मुस्कुराकर बोला, "साहब, काग़ज़ तो सच बोलता है, है ना?"
वो एक पल रुके। फिर उन्होंने कंधा उचकाया और कहा, "काग़ज़ पर सब लिखा है बेटा।" और जीप की तरफ़ चल दिए।
मैंने पीछे मुड़कर देखा। बल्लू ट्रक के पास खड़ा था। उसका चेहरा उतरा हुआ था। तिवारी उसके पास गए, उसका कंधा थपथपाया और कुछ कहा, बहुत धीरे। बल्लू ने सिर हिलाया। फिर तिवारी चले गए। बल्लू वहीं खड़ा रहा। उसका हाथ जेब पर गया। और उसने जेब में कुछ महसूस किया।
मैंने देखा — एक लिफाफा। मोटा। किसी ने उसकी जेब में डाल दिया था।
किसने? मैंने इधर-उधर देखा। सिपाही एक तरफ़ सिगरेट पी रहा था। क्रेन वाले रस्सी खींच रहे थे। कोई और नहीं दिख रहा था। बस क्रेन के नीचे ट्रक था, और ट्रक के नीचे सड़क, और सड़क पर तेल की काली लकीर।
मैंने क्रेन के नीचे झाँका। केबल अब भी वहीं लटक रही थी, ट्रक के पिछले पहिये के पास। मैंने अपनी जेब से रुमाल निकाला और उस पर हाथ रखा। वो तार जो मैंने सुबह निकाला था, उस कटे तार का दूसरा सिरा था। और उस कटे सिरे पर ताज़ा तेल की चमक थी।
मैंने अपने आप से कहा, "भाई, तू तो आज ही आया, और तेरे हिस्से का ड्रामा भी शुरू हो गया।"
फिर मैं उठा, कपड़ों पर हाथ फेरा और क्रेन के नीचे से बाहर आया। बल्लू अब भी वहीं खड़ा था। लिफाफा उसकी जेब में था। उसकी आँखें मुझसे मिलीं और वो हट गया।
मैं उसके पास गया। "बल्लू भाई, तुम्हारी जेब में क्या है?"
"कुछ नहीं।"
"बल्लू भाई।"
"कुछ नहीं है, अर्जुन।" उसकी आवाज़ काँपी। "और तू मेरी जान का दुश्मन नहीं है, तो जान छोड़।"
मैं एक पल रुका। फिर मैंने धीरे से कहा, "मैं तुम्हारी जान का दुश्मन नहीं हूँ, बल्लू भाई। मैं सिर्फ़ उस आदमी को ढूँढ रहा हूँ जिसने तुम्हारी गाड़ी को धक्का दिया। और जब मिल जाएगा, तो मैं उससे वही करूँगा जो उसने तुम्हारे साथ किया।" मैंने अपनी जेब से रुमाल निकाला। तार दिखाया। "पर तुम्हें ये जानना पड़ेगा कि तुम किस तरफ़ खड़े हो। क्योंकि जो लिफाफा तुम्हारी जेब में है, वो तुम्हारी चुप्पी का दाम है। और जिस दिन तुम्हारी चुप्पी ख़त्म होगी, उस दिन वो लिफाफा भी ख़त्म हो जाएगा।"
बल्लू ने रुमाल देखा। उसका चेहरा बदला। उसने कुछ कहना चाहा, पर होंठ सिर्फ़ हिले।
"कल सुबह," मैंने कहा। "कंधा बस्ती। चाची का घर। हरा दरवाज़ा।"
"मैं नहीं आ सकता।"
"तो मत आ।" मैंने रुमाल वापस जेब में रखा। "पर जब तक तू नहीं आएगा, तब तक तेरी गाड़ी का सच सिर्फ़ मेरे पास रहेगा। और मैं उसे किसी को नहीं दूँगा। क्योंकि सच किसी को नहीं दिया जाता, बल्लू भाई। सच निकाला जाता है।"
मैं मुड़ा। पीछे से बल्लू की आवाज़ आई, "अर्जुन।"
मैं रुका।
"तू… तूने कैसे पहचाना?"
मैंने पीछे देखा। "क्या?"
"केबल। तूने कैसे पहचाना कि कटी है?"
मैंने अपनी कलाई देखी। पापा की घड़ी। पाँच मिनट आगे। फिर मैंने कहा, "मैंने गाड़ी से सुना।"
वो हँसा। एक छोटी सी हँसी। "गाड़ी से?"
"हाँ। गाड़ी बोली थी।"
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