A Dark Secret – Chapter 6
चाची ने मेरा हाथ पकड़ लिया। उसकी पकड़ में वो ज़ोर था जो डर से आता है, और उसकी आँखों में वो बात थी जो वो कह नहीं सकती थी।
"अर्जुन," वो फुसफुसाई। "मत जा।"
"चाची, चाचा वहाँ हैं।"
"वो नहीं हैं।" उसकी आवाज़ टूटी। "रामलाल वहाँ नहीं है।"
कालू ने खाँसा। एक छोटी खाँसी, जिसमें धैर्य ख़त्म होने की आवाज़ थी।
मैंने चाची के हाथ धीरे से खोले। मुस्कुराकर बोला, "चाची, मैं अभी आया हूँ। मुझे तो सड़क भी नहीं पता। कहीं खो जाऊँगा।" फिर कालू की तरफ़ मुड़कर, "आप चलिए आगे। मैं पीछे-पीछे।"
कालू ने मुझे एक पल देखा। फिर कंधा उचकाया और मुड़ गया। मैं उसके पीछे-पीछे चला। गली के मोड़ पर पहुँचकर मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा, पर सुना ज़रूर — चाची की साँस, जैसे कोई डूबता हुआ आदमी पानी से ऊपर आए।
कालू गली के आख़िर में एक बोलेरो के पास रुका। उसने पिछला दरवाज़ा खोला।
"बैठ।"
मैंने अंदर झाँका। बोलेरो के अंदर सिगरेट की बू थी और पिछली सीट पर एक पुराना काग़ज़ पड़ा था, जिस पर कुछ लिखा था। मैंने नहीं पढ़ा। बस आँख से स्कैन किया। समझ गया कि वो कोई रसीद है, किसी टोल की।
"कहाँ चलना है?" मैंने पूछा।
"बाईस नंबर टोल के पास। भाई साहब का ठिकाना है वहीं — गोदाम के पीछे।"
"अच्छा।" मैं बैठ गया। दरवाज़ा बंद हुआ। कालू आगे बैठा और बोलेरो चली।
गाड़ी चलते-चलते मैंने वो रसीद उठाई। चुपके से। उसमें लिखा था — रात ग्यारह बजे, मोती, बाईस नंबर टोल। ड्राइवर का नाम बलदेव सिंह। और नीचे एक और लाइन थी, जो किसी ने कलम से काट दी थी, पर मैंने पढ़ लिया — वाहन संख्या, और एक हस्ताक्षर जो सिर्फ़ आधा दिख रहा था।
मैंने रसीद वापस रख दी। उसी जगह। जैसी थी।
कालू ने पीछे देखा, आईने से। "तू अपने चाचा जैसा नहीं है।"
"कैसा है चाचा?"
"वो बहुत बोलता है। तू कम बोलता है।"
"थका हूँ।" मैंने कहा। "बस से उतरा हूँ।"
"हाँ, दिख रहा है।" वो हँसा। हँसी में वो चीज़ थी जो आदमी अपने से कमज़ोर पर हँसते वक़्त निकालता है।
बोलेरो टोल के पास पहुँची तो मैंने बाहर देखा। टोल का बोर्ड, बैरियर, और उसके पीछे एक गोदाम। गोदाम के पीछे टीन की एक छत। कालू ने गाड़ी रोकी और उतर गया।
"उतर।"
मैं उतरा। धूल मेरे जूतों पर बैठ गई। कालू आगे चला। गोदाम के पीछे एक छोटा सा कमरा था, जिसका दरवाज़ा खुला था। अंदर से चाय की बू आ रही थी और कोई गुनगुना रहा था।
मैं अंदर गया।
एक बूढ़ा आदमी मेज़ के पीछे बैठा था, सफ़ेद कुर्ता, मोटा चश्मा, हाथ में चाय का गिलास। उसके सामने एक फाइल खुली थी और पास में एक मोबाइल पड़ा था, जिसकी स्क्रीन जल रही थी।
उसने मुझे देखा और मुस्कुराया। "आ जा, बेटा। बैठ।"
मैं बैठा।
"चाय पीएगा?"
"नहीं, भाई साहब।" मैंने कहा। "बस चाचा को लेने आया हूँ।"
वो हँसा। "चाचा तो गया।"
"कहाँ?"
"काम पर।" उसने चाय का घूँट लिया। "तेरे चाचा ने एक छोटी सी गलती कर दी, बेटा। बड़ी छोटी सी। और अब उसे ठीक करने गया है।"
"कैसी गलती?"
वो मेज़ पर झुका। "तू नया है। इस शहर में नया। तुझे क्या बताऊँ?" उसने गिलास रखा। "सुन। तेरे चाचा ने कुछ दिन पहले मुझसे पैसा लिया था। कर्ज़ था। अब कर्ज़ चुकाने का वक़्त आया, तो वो घबरा गया। और घबराहट में आदमी गलत काम कर जाता है।"
"क्या किया उन्होंने?"
"ये मैं नहीं बताऊँगा।" उसकी आवाज़ में एक चीज़ बदली। वो हल्की कंपन मेरे कानों में चुभ गई, बहुत हल्की, जैसे किसी गिलास पर नाखून की हल्की सी चोट। "क्योंकि ये बात जानने के बाद तुझे नींद नहीं आएगी।"
"मुझे नींद की आदत नहीं है, भाई साहब।"
वो एक पल रुका। फिर उसने काग़ज़ उठाया और मेरी तरफ़ बढ़ाया। "ये देख। ये तेरे चाचा का हस्ताक्षर है। इसका मतलब, तेरे चाचा ने अपनी गलती कबूल कर ली है। काग़ज़ पर सब लिखा है, बेटा। अब तू ये बात किसी को बताएगा, तो यही काग़ज़ सबको दिखेगा।"
मैंने काग़ज़ नहीं उठाया। मैंने सिर्फ़ उसके हाथ को देखा। उसकी उँगलियाँ काग़ज़ के किनारे पर तीन बार हिलीं। मैंने पूछा, "भाई साहब, आपका नाम क्या है?"
वो मुस्कुराया। "पहले जानने की ज़रूरत नहीं, बेटा।"
"मुझे तो जानना है। दिल्ली में जब लोग बड़ी बातें करते हैं, तो मैं उनका नाम पूछ लेता हूँ। सुना है, दिल्ली में नाम से ही रास्ता मिल जाता है।"
वो हँसा। गहरी हँसी। "तेरे चाचा जैसा नहीं है तू।"
"वो तो कालू भाई ने भी कहा।"
कालू दरवाज़े पर खड़ा था। मैंने उसकी आवाज़ सुनी — वो हिला। डर से हिला। रुई की तरह।
"मेरा नाम देवेंद्र ठाकुर है," बूढ़े आदमी ने कहा। "पर यहाँ लोग देवा भाई कहते हैं। तू भी कह देना।" उसने काग़ज़ मेज़ पर रख दिया। "और अब, बेटा, तेरी रात को भला का खाना खाकर सोना है। चाचा का काम ख़त्म होते ही वो घर पहुँच जाएगा। तू क्यों बेवजह परेशान हो रहा है?"
मैं उठा। मेरी जेब में रुमाल और तार था। उसकी मेज़ पर काग़ज़ और चाय था। बीच में सिर्फ़ हवा थी और वो हवा मेरे कानों में एक आवाज़ लेकर आई — कभी-कभी आवाज़ काग़ज़ से ज़्यादा सच बोलती है।
"देवा भाई," मैंने कहा, "आपने मुझे कुछ नहीं बताया।"
"क्योंकि जो चाचा की गलती है, वो चाचा ही बताएगा।"
"पर आपने ये फाइल जिसके नीचे नोट दबा है, वो नहीं दिखाया।"
वो एक पल के लिए रुका। और फिर हँसा। पर इस बार हँसी में एक छोटी सी दरार थी।
"तेरा कान तेज़ है, बेटा," उसने कहा। "ये तेरे पक्का काम आएगा।" उसने हाथ बढ़ाया। "अब जा। और हाँ, एक बात याद रख — यहाँ जो भी होता है, ठीक ही होता है। तुझे अभी समझ नहीं आएगा। बाद में आएगा।"
मैं बाहर निकला। धूप अब ढल गई थी और गोदाम के पीछे परछाइयाँ लंबी हो गई थीं।
कालू मेरे पीछे-पीछे आया, बोलेरो तक। रास्ते में कुछ नहीं बोला। जब मैं गाड़ी में बैठा तो उसने खिड़की के पास झुककर कहा, "तेरे चाचा ने बड़ी भूल की है। उन्हें भूल जाना।"
"कौन सी भूल?"
वो एक पल रुका। उसकी उँगली प्लायर पर गई, जो उसकी जेब से बाहर झाँक रहा था। फिर उसने कुछ नहीं कहा। दरवाज़ा बंद किया। और चला गया।
मैं बोलेरो से उतरकर टोल तक पैदल चला। टोल पर भीड़ लगी थी — ट्रक, ट्रक, ट्रक। बैरियर पर एक क्लर्क बैठा था, जो हर ट्रक की रसीद पर नज़र डाल रहा था। पास में एक छोटा चाय का खोखा था, जहाँ एक आदमी ने मुझे देखा।
वही नीली शर्ट वाला चायवाला। जो सुबह हादसे की भीड़ में था।
"अरे, तू?" उसने कहा। "तू अभी तक यहीं है?"
"क्या हुआ? क्यों नहीं रहूँ?"
"हादसा देख लिया, अब घर जा। यहाँ रात को कोई नहीं रुकता।" उसने चाय का गिलास मेरी तरफ़ बढ़ाया। "ले। मुफ़्त में। चाचा तेरे, हम सब जानते हैं।"
मैंने गिलास नहीं लिया। "क्यों? चाचा का क्या?"
"चाचा तेरे नहीं, भाई।" उसने आवाज़ नीची की। "हम सब यहाँ जानते हैं। रामलाल भाई, दस बरस से इस धंधे में हैं। अच्छा आदमी। पर आदमी जब अच्छा होता है, तो उससे अच्छा काम भी लिया जाता है।"
"क्या मतलब?"
"मतलब, तेरे चाचा ने कुछ ऐसा देख लिया, जो देखना नहीं चाहिए था।"
मेरा हाथ जेब में गया। तार वहीं था। तेल में डूबा रुमाल वहीं था। "क्या देखा?"
वो एक पल रुका। अपने गिलास की तरफ़ देखा। फिर बोला, "बेटा, तू चाय पी ले। और घर जा। हम यहाँ बहुत बोलते हैं, और यहाँ बोलना बहुत मंहगा है।"
"मैं तो सिर्फ़ कान लगाकर सुनता हूँ," मैंने कहा। "बोलता नहीं।"
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