A Dark Secret – Chapter 10
थाना छब्बीस नंबर जाने का वक़्त निकल चुका था। रात को थाने में कोई सुनने वाला नहीं मिलता। सिर्फ़ फाइलें मिलती हैं, और फाइलें अपने आप नहीं बोलतीं।
इसलिए मैंने अपना रास्ता बदला। मैं कंधा बस्ती की तरफ़ चल दिया।
चलते-चलते मैंने अपने आप से एक सवाल पूछा, जो आम तौर पर मैं नहीं पूछता था।
अगर कालू ने यह टुकड़ा मेरी जेब में डाला है, तो उसे उम्मीद है कि मैं इसे ढूँढूँगा। और अगर मैं इसे ढूँढूँगा, तो मैं उस गाड़ी तक पहुँचूँगा जिसकी यह केबल है। और अगर मैं उस गाड़ी तक पहुँचूँगा, तो शायद मैं उस आदमी तक पहुँचूँगा जिसने असली केबल काटी थी।
यानी कालू मुझे खुद तक पहुँचाने की कोशिश कर रहा था।
ऐसा क्यों करेगा कोई?
सिर्फ़ दो वजह हो सकती थीं। पहली — वो फँसाना चाहता था। दूसरी — वो खुद फँसा हुआ था और मुझे इस्तेमाल करना चाहता था।
दोनों में से कोई भी वजह अच्छी नहीं थी।
मैं सड़क पार कर रहा था कि अचानक मेरी नज़र सामने एक ट्रक पर पड़ी।
वहीं खड़ा था। बड़ा, पुराना, पीले रंग का ट्रक। उसके पीछे काला धुआँ उड़ रहा था। और सामने, बोनट पर, एक आदमी झुका हुआ था। काली कमीज़। काले बाल। गले में काला धागा।
कालू।
वो बोनट पर झुका हुआ था, और उसका हाथ अंदर इंजन में था। मैं दूर से देख रहा था। मैं रुक गया।
और फिर मैंने वही आवाज़ सुनी। ठक। ठक। ठक।
प्लायर।
वो अंदर कुछ काट रहा था।
मैंने अपने कदम पीछे खींचे। एक दुकान के छज्जे के नीचे खड़ा हो गया। वहाँ से मुझे सब दिख रहा था, और मुझे कोई नहीं देख सकता था।
कालू ने इंजन से हाथ निकाला। हाथ में एक तार था। उसने उसे अपनी जेब में डाला। फिर उसने बोनट बंद किया। फिर वो ट्रक से उतरा और चारों तरफ़ देखा।
मैं साँस रोककर खड़ा रहा।
उसने अपनी जेब से मोबाइल निकाला। फ़ोन मिलाया।
"हाँ, साहब। हो गया।" उसकी आवाज़ आ रही थी। "अब वो गाड़ी कहीं नहीं जाएगी।"
फिर वो रुका। सुन रहा था।
"नहीं, साहब। कोई नहीं देख रहा। बस वही लड़का था सुबह। पर उसने कुछ नहीं देखा। वो तो बस तमाशा देखने आया था।" वो हँसा। "हाँ साहब। उसे भी ठीक कर दूँगा। ज़रा वक़्त दीजिए।"
उसने फ़ोन काटा। फिर उसने अपनी जेब से वो प्लायर निकाला। उसे खोला। बंद किया। खोला। बंद किया। ठक। ठक। ठक।
वो मुस्कुराया। बिना किसी की तरफ़ देखे। जैसे वो मुस्कान सिर्फ़ अपने लिए हो।
फिर वो चल दिया। ट्रक छोड़कर। गली में घुल गया।
मैं वहीं खड़ा रहा। मेरे भीतर कुछ ठंडा हो रहा था।
उसने कहा — "वो गाड़ी कहीं नहीं जाएगी।"
कौन सी गाड़ी?
मैंने ट्रक की तरफ़ देखा। पीला रंग। पुराना मॉडल। पीछे लिखा था — "रघुवीर"। यानी "रघुवीर ट्रांसपोर्ट"।
मैं एक पल के लिए जम गया।
रघुवीर।
यह पापा का नाम था। रघुवीर यादव।
पर यह ट्रक पापा का नहीं था। पापा का ट्रक तो दस साल पहले सिमरिया में ही रह गया था, जब वो मरे थे। चाचा ने उसे बेच दिया था। मुझे याद है — मैं सोलह साल का था, और चाचा ने कहा था, "बेटा, कर्ज़ चुकाने के लिए बेचना पड़ा।"
तो यह ट्रक किसका था?
मैंने ट्रक के आगे देखा। नंबर प्लेट पर लिखा था — मध्य प्रदेश। और उसके ऊपर एक छोटी सी लकड़ी की तख्ती टँगी थी, जिस पर हाथ से लिखा था — "ठाकुर ट्रांसपोर्ट"।
ठाकुर ट्रांसपोर्ट। यानी देवा भाई।
तो यह देवा का ट्रक था। और इस पर पापा का नाम लिखा था।
क्यों?
मेरा सिर घूमने लगा। मैंने अपनी आँखें बंद कीं। फिर खोलीं।
मेरे सामने ट्रक खड़ा था। पीला। धूल से ढका। इंजन बंद। और कालू ने अभी-अभी उसके अंदर से एक तार निकाला था।
यह ट्रक कल तक चलता रहा होगा। शायद आज सुबह भी। क्योंकि इसकी पीछे की लाइट अभी भी गर्म थी — मुझे दूर से हल्की लाल चमक दिख रही थी। और मुझे पता था कि लाइट सिर्फ़ दो घंटे तक गर्म रहती है।
तो यह ट्रक दो घंटे पहले तक चल रहा था।
इसका मतलब। यह ट्रक अभी-अभी आया है। शायद पिछले एक घंटे में।
और कालू ने इसका कोई तार काट दिया।
क्यों?
एक ही जवाब था — ताकि यह ट्रक कहीं न जा सके।
क्या यह ट्रक वही था जिस पर मोती की केबल काटी गई थी? नहीं, मोती तो पलट चुका था। वो अभी ट्रेलर पर जा रहा था।
फिर यह कौन सा ट्रक था?
मेरे दिमाग़ ने एक चीज़ पकड़ी। छोटे वाले केबल के टुकड़े पर जो हल्की लकीर थी — वो लकीर शायद गाड़ी के अंदर लगाने की कोशिश का निशान थी। और यह ट्रक अभी-अभी आया था।
कहीं यह छोटा टुकड़ा इसी ट्रक का तो नहीं था?
मैंने एक कदम आगे बढ़ाया। फिर रुक गया।
क्योंकि सामने एक सिपाही आ रहा था। वही सिपाही, जो रजिस्टर लेकर भीड़ में घूम रहा था। वो इस ट्रक की तरफ़ ही आ रहा था।
मैं पीछे हट गया। छज्जे के नीचे। साँस रोककर।
सिपाही ट्रक के पास आया। उसने ट्रक की तरफ़ देखा। फिर उसने अपनी जेब से फ़ोन निकाला। फ़ोन मिलाया।
"साहब, वो ट्रक मिल गया।" उसने रुककर सुना। "हाँ, वही। ठाकुर साहब वाला। पर साहब, इंजन में कोई तार कटा है। मुझे लगता है कोई छेड़छाड़ की है।"
फिर वो फिर रुका। उसका चेहरा बदला।
"नहीं साहब। मैंने किसी को देखा नहीं।"
उसने फ़ोन काटा। फिर उसने ट्रक की तरफ़ एक और नज़र डाली और जल्दी-जल्दी वहाँ से चला गया।
मैंने उसे जाते देखा।
वो सिपाही नहीं था। वो किसी का आदमी था। जिसने ट्रक को ढूँढा, देखा, और अब अपने आका को खबर दे रहा था।
और उसका आका शायद वही था जो कालू को फ़ोन कर रहा था।
मैंने एक लंबी साँस ली। मेरे दिमाग़ में एक बात साफ़ हो रही थी।
यह ट्रक आज सुबह आया है। इसमें से तार कालू ने काटा। इसे ढूँढने के लिए सिपाही भेजा गया। और मेरी जेब में जो छोटा टुकड़ा है, वो शायद इसी ट्रक का है।
क्योंकि जब कालू ने मुझे यह टुकड़ा दिया, तो वो चाहता था कि मैं इसे पहचानूँ। और पहचानकर इस ट्रक तक पहुँचूँ।
पर वो चाहता क्यों था?
शायद इसलिए कि जब मैं इस ट्रक तक पहुँचूँ, तो मैं उसमें कुछ देखूँ जो मुझे नहीं देखना चाहिए था। या शायद इसलिए कि जब मैं इसे देखूँ, तो कोई और मुझे देख ले।
यानी मैं चूहा हूँ और यह ट्रक चीज़ का टुकड़ा है।
मुझे यह सोचकर हँसी आई। एक छोटी सी, बिना आवाज़ की हँसी।
फिर मैंने अपना सिर ऊपर किया। आसमान में धूल थी। सूरज ढल रहा था। और सड़क पर ट्रकों की कतार लगी थी।
मैंने अपने आप से कहा, ठीक है। अगर खेल शुरू हो गया है, तो मैं खेलूँगा। पर अपने तरीके से।
मैं वहाँ से निकला। सीधा ट्रक की तरफ़ नहीं गया। बल्कि उसके पीछे से घूमकर, एक गली में गया, जो ट्रक के पीछे वाले हिस्से तक जाती थी। वहाँ से मैं ट्रक के पीछे पहुँच सकता था, बिना सामने वाले रास्ते पर आए।
गली में अंधेरा था। नाली बह रही थी। एक कुत्ता भौंका और भाग गया।
मैं ट्रक के पीछे पहुँचा। वहाँ खड़ा होकर मैंने ट्रक की पिछली लाइट देखी। गर्म थी। बहुत गर्म।
मैंने अपना हाथ लाइट के पास लाया। गर्मी साफ़ महसूस हुई।
तो यह ट्रक अभी-अभी आया है।
मैंने ट्रक के नीचे झाँका। तेल टपक रहा था। पिछले पहिये के पास एक छोटी सी केबल लटक रही थी — कटी हुई। और उसका सिरा साफ़ था। बिलकुल वैसा ही जैसा मेरी जेब में था।
मेरे हाथ काँपने लगे।
मैंने रुमाल निकाला। छोटा टुकड़ा उठाया। उसे कटी केबल के पास ले गया। उन्हें मिलाया।
बिलकुल फ़िट।
यह छोटा टुकड़ा इसी ट्रक का था।
मैंने उसे वापस रुमाल में लपेटा। मेरा दिल ज़ोर से धड़क रहा था।
तो कालू ने मुझे इस ट्रक का टुकड़ा दिया। और यह ट्रक देवा भाई का था। और इस पर पापा का नाम लिखा था।
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