A Dark Secret – Chapter 84
मेरी आवाज़ अब बहुत धीमी हो गई थी, इतनी धीमी कि उसे सुनने के लिए कालू को आगे झुकना पड़ा, और यही मुझे चाहिए था। क्योंकि धीमी आवाज़ में आदमी को खुद पास आना पड़ता है। और जो आदमी पास आता है, वो अपनी भीड़ खो देता है।
"ढाबे पर माँ-बहन नहीं चलती।" मैंने कहा। "यहाँ रोटी खाने आते हैं। बोलना है तो बाहर चल।"
कालू ने मेरी तरफ़ झपटने के लिए शरीर घुमाया।
और उसी वक़्त रुक्मा दीदी आ गईं।
वो बीच में नहीं आईं। वो कड़ाही के पास से उठी थीं और उनके हाथ में वो लंबा लोहे का चमच था जिससे वो दाल हिलाती हैं — बड़ा, भारी, और नीचे तक गरम। उन्होंने उसे ऐसे पकड़ा जैसे कोई तलवार पकड़ता है, और ढाबे के बीच में आकर खड़ी हो गईं।
और जब वो बोलीं, तो ढाबे का शोर बच्चों जैसा लगा।
"कालू।"
वो रुका।
"मेरे ढाबे पर कोई नहीं मारता।" रुक्मा दीदी ने कहा। "न तू, न तेरे आदमी, न कोई बाहर का। जिसको मारना है, वो सड़क पर जाकर मारे। यहाँ लोग बैठकर रोटी खाते हैं, और मेरे यहाँ रोटी खाने वाले के ऊपर हाथ उठाने का मतलब है कि तेरे हाथ में आग लगेगी। समझा?"
कालू के पीछे खड़े जो लंबे आदमी थे, उन्होंने एक-दूसरे की तरफ़ देखा। बेल्ट घुमाने वाले ने बेल्ट रोक ली।
कालू ने रुक्मा दीदी को देखा। "दीदी, तू बीच में मत आ। ये मेरा…"
"तेरा कुछ नहीं है।" रुक्मा दीदी ने कहा। "ये लड़का मेरे ढाबे की सात बेंच ठीक कर रहा है। जब तक वो मेरी बेंच ठीक कर रहा है, वो मेरा आदमी है। और मेरे आदमी को मेरे ढाबे में कोई छू नहीं सकता। अब बोल — खाना खाएगा या निकल?"
कालू कुछ सेकंड खड़ा रहा।
मैं उसके चेहरे को देख रहा था, पर मैं उसकी आवाज़ सुन रहा था। और उसकी आवाज़ में जो था, वो गुस्सा नहीं था। गुस्सा ऊपर की चीज़ है। उसके नीचे जो था वो डर था — एक ऐसा डर जो उसे अब तक ढो रहा था और जिसका नाम उसे खुद नहीं पता था।
क्योंकि कालू को कोई भेजता है। और जिसे कोई भेजता है, वो आख़िर में सिर्फ़ अपने भेजने वाले से डरता है।
"मैं खाने नहीं आया।" उसने कहा।
"तो?"
"मैं बुलाने आया था।" उसने कहा। "अब चला जाता हूँ।"
उसने पलटना शुरू किया।
फिर रुका।
और उसने वो बात कही, जिसके लिए वो आया था, और जिसके लिए उसने इतना तमाशा किया था। क्योंकि अगर वो सिर्फ़ ये बात कहने आता, तो कोई नहीं सुनता। पर अब पूरा ढाबा सुन रहा था। अब सबको पता चल जाएगा कि अर्जुन को बुलाया गया है। और डर की सबसे बड़ी ताक़त यही है कि सबको पता हो कि तुम बुलाए गए हो।
वो दरवाज़े पर रुका, आधा पलटा, और मुझे देखकर बोला —
"भाई साहब कल दस बजे बुला रहे हैं।"
और फिर वो चला गया। उसके दोनों आदमी पीछे-पीछे चले गए।
दरवाज़े के बाहर अंधेरा था और गाड़ियों की लाइटें, और मुझे कुछ देर तक ऐसा लगा कि उनके जाने के बाद भी वो आवाज़ वहीं खड़ी है।
ढाबा फिर से बोलने लगा। पर पहले जैसा नहीं। पहले जो शोर था, वो भूख का था। अब जो शोर था, वो उसके बाद वाला शोर है — जब लोग आपस में धीरे-धीरे बातें करते हैं और बीच-बीच में आपकी तरफ़ देखते हैं।
मैं बेंच पर बैठ गया।
कबीर अभी भी मेरे सामने बैठा था।
उसकी चाय ठंडी हो चुकी थी और उसने उसे छुआ भी नहीं था। उसने अपने दोनों हाथ घुटनों पर रखे थे और मुझे देख रहा था।
"तूने सुना?" मैंने कहा। "उसकी जेब में…"
"मैंने सुना।" कबीर ने कहा। "पर तुझे ये कैसे पता कि वही आवाज़ मोती की केबल काटते वक़्त आई थी?"
"पता नहीं।" मैंने सच बोला। "मुझे पता है कि वो आवाज़ मैंने उस सुबह सुनी थी, जब कोई नीम के पीछे खड़ा था। और मुझे पता है कि ये प्लायर वाली आवाज़ है। दोनों को जोड़कर मैंने बोल दिया।"
"मतलब तूने अंदाज़ा लगाया।"
"हाँ।"
"और वो सही निकला?"
"ये तो वो खुद बता गया।" मैंने कहा। "जब उसने जेब पर हाथ रखा। अगर उसकी जेब में प्लायर नहीं होता, तो वो हाथ नहीं रखता। वो हँस देता। वो मुझे पागल कह देता। उसने हाथ रखा — मतलब वहाँ कुछ है।"
कबीर ने अपना सिर हिलाया, धीरे-धीरे, जैसे कोई हिसाब जोड़ रहा हो।
"तुझे पता है तूने अभी क्या किया?" उसने कहा।
"क्या?"
"तूने एक आदमी को चालीस लोगों के सामने नंगा कर दिया।" कबीर ने कहा। "और ऐसा आदमी इसका बदला लेता है। पैसे से नहीं। इससे। कि तेरा नाम कहीं से मिट जाए।"
"तो ले।" मैंने कहा।
"अर्जुन।"
"कबीर भाई," मैंने कहा, "आज सुबह मैंने एक काँच के दफ़्तर के फाटक पर खड़े आदमी से अपना नाम नहीं पूछा। वो बारह साल से वहाँ खड़ा है और कोई उसका नाम नहीं जानता। मैंने सोचा, अगर मेरा नाम भी कहीं मिट जाए, तो कम से कम मैंने अपना नाम बोलने की कोशिश तो की।"
वो चुप रहा।
फिर उसने कहा — और उसकी आवाज़ बदल गई थी, वो अब कबीर की आवाज़ नहीं थी, वो उस आदमी की आवाज़ थी जो चार घंटे से सवाल पकड़े बैठा था —
"तूने मेरा सवाल नहीं सुना। मैंने पूछा था — तुम्हारे पापा का नाम जोशी है?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"वो मेरा सवाल नहीं था।" कबीर ने कहा।
"तो किसका था?"
वो उठा। उसने अपनी जेब से रुमाल निकाला और मुँह पोंछा, हालाँकि उसने कुछ खाया नहीं था।
"मैं तुझे कुछ बताने आया था।" उसने कहा। "पर उस आदमी के जाने के बाद अब मैं नहीं बताऊँगा।"
"क्यों?"
"क्योंकि अब मुझे लग रहा है कि ये बात तेरे काम की नहीं है।" उसने कहा। "ये बात उसकी है।"
"किसकी?"
कबीर ने जवाब नहीं दिया। वो बस आगे बढ़ा और मेरे कंधे पर हाथ रखा। उसका हाथ ठंडा था।
"एक बात याद रख।" उसने कहा। "जो आदमी तुझे दस बजे बुला रहा है, वो तुझे मारने नहीं बुला रहा। मारने के लिए कोई बुलाता नहीं, आदमी आ जाता है। बुलाने का मतलब है कि वो तुझसे कुछ चाहता है। और जब वो कुछ चाहता है, तो वो कुछ देगा भी।"
"तो?"
"तो जो दे, उसे गिनकर लेना।" कबीर ने कहा। "और जो माँगे, उसे दो — पर पूरा मत देना। जो आदमी पूरा देता है, वो अगली बार खाली हाथ आता है।"
वो चला गया।
मैं वहीं बैठा रहा।
रुक्मा दीदी आईं और मेरे सामने एक कटोरा रख दिया। उसमें चाय थी, और चाय में इलायची थी, और मुझे पता था कि वो इलायची आज किसी और के लिए पिसी गई थी।
"पी।" उन्होंने कहा।
मैंने पी।
"अब सुन।" वो मेरे सामने बेंच पर बैठ गईं, और उनकी आवाज़ अब वो ऊँची आवाज़ नहीं थी। "कालू को मैं बारह साल से जानती हूँ। वो इस ढाबे पर आता था जब उसकी उम्र तेरी उम्र जितनी थी। उस वक़्त वो किसी का ड्राइवर था, और उसकी गाड़ी पुरानी थी, और वो यहाँ आकर उधार रोटी खाता था।"
"फिर?"
"फिर एक रात वो नहीं आया।" उन्होंने कहा। "तीन महीने बाद आया, नई गाड़ी के साथ, और गले में काली माला। उसने मेरा उधार चुकाया, और मैंने उससे पूछा कि पैसा कहाँ से आया। उसने कहा — दीदी, किसी ने मुझे बचा लिया।"
"बचाया या ख़रीदा?"
रुक्मा दीदी ने मेरी तरफ़ देखा।
"इसी सवाल की वजह से मैं तुझे पसंद करती हूँ।" उन्होंने कहा। "और इसी सवाल की वजह से मुझे तेरा डर लगता है।"
वो उठ गईं, और जाते-जाते रुकीं, और बिना पलटे बोलीं —
"कल दस बजे जाएगा?"
"जाऊँगा।"
"अकेला?"
मैंने सोचा। मैंने सोचा नैना के बारे में, कबीर के बारे में, जुगनू के बारे में, और उन तीन सौ रुपयों के बारे में जो मेरी जेब में थे और जिनमें से कुछ भी मैं इस काम पर खर्च नहीं कर सकता था।
"नहीं।" मैंने कहा।
"अच्छा।" रुक्मा दीदी ने कहा। "क्योंकि मैं उस कमरे में तेरे साथ कोई नहीं भेजूँगी। पर बाहर जो खड़ा होगा, उसका नाम मैं जानती हूँ।"
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