A Dark Secret – Chapter 83
"मैं उस वक़्त सोलह साल का था।" मैंने कहा। "मैंने उन्हें जलते देखा और कुछ नहीं किया। पापा की घड़ी मेरे हाथ में थी, मैं उसे पकड़े खड़ा रहा। आज तक सोचता हूँ कि उस रात मुझे उनमें से एक पन्ना निकाल लेना चाहिए था।"
"कितने पन्ने थे?"
"बहुत नहीं।" मैंने कहा। "एक रजिस्टर था। मोटा नहीं, पर भरा हुआ। माँ ने वो नहीं जलाया। वो अलग रख दिया और उसके बाद कभी नहीं दिखाया।"
नैना ने कुछ नहीं कहा। वो बस चलती रही और अपने फटे बैग का पट्टा ठीक करती रही।
उस दिन बाकी दिन बेकार गया। वोटर — गाड़ी वालों की भीड़ ऐसी थी कि कबाड़ बाज़ार में पन्नालाल की कोठरी तक पहुँचना मुश्किल हो गया। जब पहुँचे तो कोठरी पर ताला लगा था और ताले पर धूल की एक मोटी परत थी, जैसे वो तीन महीने से नहीं खुला। पड़ोस में एक चाय की दुकान थी, उस पर बैठे आदमी ने कहा — "पन्नालाल?"
"हाँ।"
"वो तो ख़ैर में नहीं है।" उसने कहा और उठकर अंदर चला गया।
हम वापस आ गए। लौटते वक़्त मुझे रुक्मा दीदी का फ़ोन आया — "आज शाम ढाबा भरा रहेगा। चालीस गाड़ियाँ आ रही हैं, एक ही ठेकेदार की। सात बेंच ठीक हो गए तो जल्दी आ जा। और एक बात सुन ले — आज कोई नया आदमी आए तो मेरे पास बता देना।"
"नया क्यों?"
"बस बता देना।" उसने कहा और फोन काट दिया।
शाम को सात बजे रातरानी ढाबा ऐसा भरा था कि अगर कोई कहता कि कल यहाँ चालीस गाड़ियाँ आएँगी, तो मैं हँस देता। पर चालीस गाड़ियाँ आई थीं। उनके ड्राइवर बेंचों पर बैठे थे, कुछ ज़मीन पर चटाई पर, कुछ बाहर अड्डे पर खड़े, हाथ में चाय का कटोरा और पैरों में थकान।
चूल्हे की आग इतनी तेज़ जल रही थी कि दस हाथ दूर तक लपटों की लालक आँखों में बैठ जाती। रुक्मा दीदी तीन कड़ाहियों के बीच घूम रही थीं — एक में सब्ज़ी, एक में दाल, एक में चाय। कमर पर चाबियों का गुच्छा झूल रहा था और वो जो भी बोलतीं, आवाज़ ढाबे के शोर को काटकर बाहर निकलती।
जुगनू नीम के नीचे उलटे ढोल पर बैठा था और तीन-तीन हाथ वाले हिसाब से गाड़ियों के नंबर गिन रहा था, जैसे कोई बच्चा नहीं, कोई मुनीम हो। उसने मुझे देखते ही कहा, "आज सब टायर नए हैं भाई, कोई फटा नहीं, मैंने सब देखे।"
"अच्छा कर दिया।"
"अच्छा होता," उसने कहा, "तो आज कोई झगड़ा नहीं होता।"
"झगड़ा क्यों होगा?"
वो कुछ कहने ही वाला था कि उसकी नज़र दरवाज़े पर पड़ी और उसने मुँह बंद कर लिया।
कबीर दरवाज़े पर खड़ा था।
वो गाड़ी महल से सीधा आया था — कपड़े वही साफ़, पर आज उसकी कमीज़ की कॉलर बंद थी, जैसे वो अपने ही गले को ठंड से बचा रहा हो। हाथ में कुछ नहीं था। न कैलकुलेटर, न पेन। मैंने पहली बार उसे खाली हाथ देखा।
वो आकर मेरे सामने बैठ गया, और मुझे लगा कि वो सीधा सवाल फेंकेगा। पर उसने पहले चारों तरफ़ देखा — दरवाज़े की तरफ़, फिर खिड़की की तरफ़, फिर उन ड्राइवरों की तरफ़ जो पास बैठे थे, और उनका ध्यान भी चाय में था।
फिर उसने धीरे से कहा, "तुम्हारे पापा का नाम जोशी है?"
और उसी वक़्त आवाज़ आई।
नहीं, आवाज़ नहीं। शोर।
दरवाज़े पर तीन आदमी आए। दो पीछे रुक गए और एक आगे आया। बाकी ढाबा एक पल के लिए छोटा लगा।
कालू।
उसकी काली माला गले में उतनी ही थी, भौंह पर कटा निशान उतना ही, और चाल वही — जैसे वो चल नहीं रहा, ज़मीन का हिसाब ले रहा है। उसके पीछे वाले दोनों लंबे थे, एक के हाथ में मोटी कमर की बेल्ट थी जो वो उँगली पर घुमा रहा था।
कबीर का सवाल हवा में लटक गया।
उसके मुँह से निकला था, पर पूरा नहीं निकला, और अब वो वापस अंदर भी नहीं जा सकता था। वो वहीं अटका रह गया, मेरे और उसके बीच, उस ठंडी चाय की तरह जो हम दोनों के सामने पड़ी थी।
कालू मेरे सामने आकर रुका। उसने मुझे देखा, फिर रुक्मा दीदी को, फिर मेरे कंधे पर रखे औज़ार के बैग को।
"अर्जुन यादव।" उसने कहा। "नाम ठीक लिखा है ना? कहीं ग़लत हो तो बता दूँ, क्योंकि आगे काग़ज़ों पर यही नाम आएगा।"
ढाबे में चाय के कटोरों की आवाज़ भी रुक गई।
मैंने कुछ नहीं कहा। मैंने सुना।
क्योंकि मैं एक चीज़ सुन रहा था जो और किसी को नहीं सुनाई दे रही थी।
एक हल्की खट-खट।
बहुत हल्की। कपड़े के नीचे से आती हुई, जैसे कोई चीज़ अपने ही वज़न से जगह बदल रही हो। ठक। फिर ठक। फिर रुक। फिर दो बार।
वो उसके बाएँ कूल्हे की जेब से आ रही थी।
मैंने चार साल पहले एक गैराज में एक बूढ़े मिस्त्री को देखा था जो तार काटते वक़्त जीभ दाँतों में दबा लेता था और उसकी जेब में प्लायर हर कदम पर ठक-ठक करता था। मैं उस वक़्त बारह साल का था और मुझे वो आवाज़ इतनी पसंद आई थी कि मैंने दिन भर उसके पीछे-पीछे चलकर वो आवाज़ सुनी थी। मैंने उसे अपने कान में बसा लिया था।
और यही आवाज़ मैंने उस सुबह सुनी थी। उस सुबह, जब मैं ढाबे के पीछे नीम के नीचे सो रहा था और दीवार के मोड़ पर कोई खड़ा था। मैं दीवार से चिपका था और मुझे सिर्फ़ यही सुनाई दिया था — ठक-ठक — और फिर वो आदमी चला गया था।
मेरे मुँह पर मुस्कान आ गई।
मुझे पता है ये मुस्कान ख़तरनाक है। रुक्मा दीदी ने मुझे एक बार कहा था — "जब तू मुस्कुराता है गुस्से में, तो मुझे लगता है बेटा, तेरे पापा तेरे अंदर से झाँक रहे हैं।" पर मैं रोक नहीं सका।
मैं उठ खड़ा हुआ।
"कालू भाई।" मैंने कहा।
"हाँ।"
"आपकी जेब में कुछ बज रहा है।"
वो रुका।
उसके चेहरे पर कुछ नहीं बदला। पर अगर आदमी के चेहरे पर कुछ न बदले, तो भी आवाज़ बदलती है। और उसकी आवाज़ में जो आया, वो शब्द नहीं था। वो एक छोटी सी साँस थी जो उसने बीच में खींच ली।
"क्या?" उसने कहा।
"प्लायर।" मैंने कहा। "जेब में। बायीं तरफ़। ठक-ठक कर रहा है। ऐसे बजता है जब उसका जोड़ ढीला हो जाता है और वो जेब में खुल जाता है। आपने कभी ठीक नहीं करवाया, है ना?"
ढाबे में जो शोर था, वो पहले दो पल और रहा, फिर पूरा रुका।
और मैंने आवाज़ ऊँची कर दी, इतनी ऊँची कि बाहर अड्डे तक जाए।
"अरे कालू भाई कुछ बोलो ना! जेब में प्लायर बज रहा है — ठक, ठक! मुझे तो ये आवाज़ पहचानी लग रही है। यही आवाज़ उस सुबह आई थी जब मोती की ब्रेक केबल कटी थी!"
और फिर जो हुआ, वो मैंने सोचा नहीं था।
पहले एक ड्राइवर हँसा। बस एक। बैठा हुआ, हाथ में रोटी, मुँह भरा हुआ — और वो हँस पड़ा, और उसकी हँसी में चाय फ़र्श पर गिरी।
फिर दूसरा। फिर तीसरा। फिर बेंच के पीछे खड़े चारों。 दस सेकंड में ढाबा ऐसे हँसा जैसे किसी ने मज़ाक़िया फ़िल्म का सीन दिखा दिया हो।
कोई ताली बजा रहा था। कोई कह रहा था, "फिर से बोल, फिर से बोल।" एक बूढ़ा ड्राइवर जो अभी तक चुप बैठा था, उसने अपना कटोरा मेज़ पर पटक कर कहा, "चल ओ कालू, जेब निकाल!"
कालू का चेहरा वो नहीं बदला जो लोग फ़िल्मों में दिखाते हैं। वो धीरे-धीरे बदला। पहले कानों का हिस्सा लाल हुआ, फिर गर्दन, फिर माथा। और भौंह पर वो कटा निशान, जो हमेशा सफ़ेद रहता था, अब उभर आया, जैसे पुराना घाव फिर खुल गया हो।
उसने हाथ जेब पर रखा। यह उसकी सबसे बड़ी ग़लती थी। अगर वो हाथ न लगाता, तो शायद कोई कुछ न कहता। पर उसने हाथ लगाया, और पूरा ढाबा देख रहा था, और सबको पता चल गया कि मैं सच बोल रहा हूँ।
"तेरी माँ का…" उसने कहना शुरू किया।
"नहीं।" मैंने कहा।
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