A Dark Secret – Chapter 85
वो चली गईं।
और मैं वहीं बैठा रहा, कटोरा हाथ में, और मेरे कान में अब भी वो ठक-ठक बज रही थी — पर अब वो कालू की जेब से नहीं आ रही थी। अब वो मेरे अंदर से आ रही थी। जैसे किसी ने मेरे अंदर एक प्लायर रख दिया हो, और वो हर कदम पर बजता रहे।
मैंने जेब से अपनी सिली हुई कॉपी निकाली और उस पर लिखा।
कालू — जेब में लाल प्लायर। ठक-ठक। ढाबे पर चालीस लोगों के सामने। भाई साहब — कल दस बजे।
फिर मैंने नीचे एक लाइन और जोड़ी, और वो लाइन लिखते वक़्त मेरा हाथ काँपा —
कबीर का सवाल अधूरा। पूछा — हमारे पापा का नाम जोशी है। पर जवाब उसने नहीं दिया, मैंने दिया था। और उसके बाद वो कुछ बताने आया था, पर कालू के आने से रुक गया।
और उसके नीचे —
अगर वो बात उसकी है, तो वो बात किसकी है?
रात ग्यारह बजे जुगनू नीम के नीचे आया और मेरे पास बैठ गया, और उसने वो बात कही जो उसने दिन में कहनी चाही थी और नहीं कह पाया था।
"भाई।" उसने कहा। "आज दोपहर को कालू भाई आए थे।"
"कहाँ?"
"यहीं। ढाबे के पीछे।" उसने कहा। "और उनके साथ कोई नहीं था। वो अकेले खड़े थे और… और वो प्लायर जेब से निकालकर हवा में घुमा रहे थे। ऐसे।"
जुगनू ने अपनी कलाई घुमाई।
"और वो क्या बोले?"
"कुछ नहीं।" जुगनू ने कहा। "पर जब वो जा रहे थे, तो उन्होंने मुझे देखा और कहा — ओए, तू किसी को कुछ बताएगा तो तेरी माँ का कबाड़ा उठ जाएगा।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"तू डरा?"
"नहीं।" जुगनू ने कहा, और उसकी आवाज़ पतली थी पर सीधी। "मैंने सोचा, अगर मैं डर गया तो वो फिर आएँगे।"
फिर वो थोड़ा सटकर बैठ गया और उसने धीरे से कहा, "भाई, एक और बात। वो जब प्लायर घुमा रहे थे, तो उसका एक हिस्सा खुल गया था। और अंदर से कुछ गिरा।"
"क्या गिरा?"
"मुझे नहीं पता।" उसने कहा। "छोटा था। मैंने उठा लिया है।"
उसने अपनी जेब से हाथ निकाला और मेरी हथेली पर कुछ रख दिया।
वो पीतल का एक छोटा टुकड़ा था, जैसे किसी नट का आधा हिस्सा, जो बीच से टूटा था। और उस पर कुछ खुदा हुआ था — बहुत घिसा हुआ, पर फिर भी पढ़ा जा सकता था।
एक अक्षर।
र।
मैंने अपनी दूसरी जेब से वो दो नट निकाले और उन्हें उस टुकड़े के पास रखा। तीनों एक ही धातु के थे। तीनों पर एक ही तरह की घिसाई थी। और तीनों एक ही हाथ की बनाई लग रहे थे।
मैंने उन्हें वापस अपनी जेब में रखा, और मैंने जुगनू की तरफ़ देखा और मुस्कुराया।
"तू किसी को कुछ नहीं बताएगा।" मैंने कहा।
"मैंने बताया ना, मैं डरा नहीं।"
"मुझे पता है।" मैंने कहा। "पर अभी वो हमारे काम का नहीं है। अभी हमें कल की सुबह दस बजे का इंतज़ार करना है।"
जुगनू ने सिर हिलाया। फिर वो उठा और चला गया, और मैंने उसे जाते हुए देखा — नंगे पाँव, पतला, ढोल पर बैठने वाला लड़का, जिसकी जेब में शहर के सारे नंबर हैं और जिसकी माँ कबाड़ा छानती है।
और मैंने रुक्मा दीदी की उस बात को याद किया, जो उन्होंने आज शाम कही थी — "जो आदमी बारह साल पहले बचाया गया था, वो आज बुलाने आया था।"
मैंने चटाई पर लेटते हुए आसमान देखा।
कल दस बजे मुझे उस कमरे में जाना है, जहाँ से एक बार मेरे पापा गए थे और लौटकर कभी नहीं आए। और मुझे उस आदमी के सामने बैठना है जो मेरे पापा को भी "बेटा" कहता था।
मैंने आँखें बंद कीं।
और सुनना शुरू किया — टोल नाके की दूर की आवाज़, किसी ट्रक का धीमा होना, गियर का बदलना, और फिर वो आवाज़ जो किसी और को सुनाई नहीं देती — एक आदमी की जेब में बजता हुआ प्लायर, ठक, ठक, ठक।
कल मैं उस आवाज़ के सामने बैठूँगा।
और इस बार मैं उससे पूछूँगा कि ये प्लायर तूने किसकी जेब से उठाया था।
॥
रात ग्यारह बजकर चालीस मिनट पर नैना की गाड़ी ढाबे के सामने रुकी, और मैंने उसे देखने से पहले सुन लिया।
उसका बायाँ पहिया हवा कम होने की वजह से अलग बोल रहा था — धड़, धड़, धड़ — बाकी तीन के साथ ताल नहीं मिला रहा था। और गाड़ी के ऊपर धातु के फ़्रेम जैसी एक हल्की गूँज थी, जैसे छत पर कोई खाली टिफ़िन रखा हो और हवा उसे हिला रही हो।
मैं चटाई पर उठ बैठा। जुगनू जा चुका था। ढाबे की आख़िरी लाइट जल रही थी और रुक्मा दीदी तवे पर आख़िरी रोटी डाल रही थीं।
नैना गाड़ी से उतरी, बैग कंधे पर टिकाया और सीधे मेरे पास आई।
"टीटू की शिफ्ट सवा बारह बजे खत्म होती है।" उसने कहा। "वो पीछे के फाटक से निकलता है। रोज़ उसी रास्ते से जाता है।"
"तूने ये सब कैसे निकाला?"
"मैं तीन महीने से इस टोल के पीछे घूम रही हूँ।" उसने चश्मा ऊपर धकेला। "मुझे चाय वाले की दुकान से लेकर फाटक के गार्ड तक, सब के नाम पता हैं। तेरे पास सिर्फ़ कान हैं। मेरे पास वक़्त है।"
मैं हँस पड़ा।
"अच्छा।" मैंने कहा। "तो चल।"
"एक बात।" उसने कहा। "मैं साथ चलूँगी।"
"नहीं।"
"मैं दूर खड़ी रहूँगी।"
"नहीं।"
"अर्जुन।"
"नैना।" मैंने कहा, और मेरी आवाज़ धीमी थी। "तू उस फाटक के पास खड़ी होगी, और गार्ड तेरा चेहरा देख लेगा। और तेरा चेहरा एक बार देख लेने के बाद वो कभी नहीं भूलता। तेरे पापा की फाइल ग़ायब है। तू अगली चीज़ नहीं होगी जो ग़ायब हो।"
वो चुप हो गई।
फिर उसने धीरे से कहा, "तो मैं क्या करूँ? हाथ पर हाथ रखकर बैठूँ?"
"तू वही कर जो तू करती है।" मैंने कहा। "काग़ज़ रख। तारीख़ रख। और आज रात से एक काम शुरू कर — हर उस आदमी का नाम लिख जो इस टोल से जुड़ा है। जो अंदर जाता है, जो बाहर आता है, जो मोहर लगाता है। जिस दिन हमें अदालत में जाना होगा, उस दिन तेरे चौदह काग़ज़ पचास होने चाहिए।"
उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में गुस्सा था, पर उस गुस्से के नीचे कुछ और भी था — जैसे किसी ने उसकी बात मान ली हो, और वो इसके लिए तैयार नहीं थी।
"ठीक है।" उसने कहा। "पर मैं गाड़ी में बैठकर सुनूँगी। मेरी गाड़ी का शीशा खुला रहेगा। अगर तू एक घंटे में नहीं लौटा, तो मैं अंदर आ जाऊँगी, चाहे जो हो।"
"एक घंटा बहुत है।" मैंने कहा। "मुझे पंद्रह मिनट दे।"
रुक्मा दीदी ने तवे से रोटी उठाई, थाली में रखी और मेरी तरफ़ बढ़ाई।
"खा ले।" उन्होंने कहा। "भूखे आदमी के कान भी भूखे होते हैं।"
मैंने रोटी खाई। दो कौर में। फिर मैंने पानी पिया और खड़ा हो गया।
रुक्मा दीदी ने मेरा हाथ पकड़ा। उनकी उँगलियाँ गरम थीं, तवे की गरमी से।
"सुन।" उन्होंने कहा। "कल जब तू उस कमरे में बैठे, तो वो तुझे चाय देगा।"
"तो?"
"तो मत पीना।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"दीदी, चाय में क्या…"
"चाय में कुछ नहीं होता।" उन्होंने कहा। "चाय में उसका हिसाब होता है। वो चाय पिलाते-पिलाते तेरे मुँह से बात निकलवाता है। पहले वो कहेगा — बेटा, तेरे पापा मेरे भाई जैसे थे। फिर वो कहेगा — बेटा, तू मेरा बेटा है। और जब तक तेरी चाय खत्म हो, तू उसको अपनी जेब दिखा चुका होगा।"
मैंने सिर हिलाया।
"और एक बात।" उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ पहले से धीमी थी। "मेरे वाले ने भी उसके सामने चाय पी थी। उसी कमरे में। उसी सोफ़े पर। और लौटकर वो मुझसे बोला था — रुक्मा, भाई साहब बहुत अच्छे आदमी हैं।"
उन्होंने मेरा हाथ छोड़ा।
"तीसरे दिन उसकी गाड़ी का पहिया कटा मिला।"
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