A Dark Secret – Chapter 79
“खाना खाया?” पहला सवाल।
“खाया।”
“क्या खाया?”
“रोटी।”
“सिर्फ़ रोटी?”
“दाल भी।”
“दाल में तेल था?”
“अम्मा।”
“पाँच सौ लौटा देना जब पैसा आए।” उन्होंने कहा। “उधार रखना अच्छा नहीं होता। और उन लोगों से मत उलझना जो बहुत मीठा बोलते हैं। मीठी बोली सबसे महँगी चीज़ होती है, बेटा। चीनी सस्ती है, बोली महँगी।”
“अम्मा।”
“हाँ?”
“पापा के काग़ज़ जब जलाए गए थे,” मैंने कहा, “उस दिन आपने क्या जलाया था?”
फ़ोन पर चुप्पी आई। लंबी नहीं। बस इतनी कि एक साँस बीच में आ गई।
“जो जलाने को दिया गया था।” उन्होंने कहा।
“किसने दिया था?”
“बेटा, मेरी रसोई में आग है।” उन्होंने कहा। “बाद में बात करेंगे।”
फ़ोन कट गया।
मैंने मोबाइल जेब में रखा और आसमान की तरफ़ देखा। सताईस सितंबर की शाम ढल रही थी और हवा में वो गंध आ रही थी जो बारिश से पहले आती है, हालाँकि बादल कहीं नहीं थे।
शाम सात बजे रातरानी ढाबा खचाखच भर गया।
ऐसा नहीं था कि रोज़ ऐसा होता था। रोज़ चार-पाँच ट्रक रुकते थे। आज ग्यारह खड़े थे। किशन का लाल-भूरा ट्रक सबसे आगे था, उसके पीछे बोरों का पहाड़ और ऊपर एक टूटी हुई तिरपाल जो हवा में फड़फड़ा रही थी। उसके बगल में भूपेंद्र की जीप, जिसकी फैन बेल्ट मैंने सुबह बदली थी। उसके पीछे भूपेंद्र ही खड़ा था, तांबे की अंगूठी से बीड़ी की राख खुरचते हुए, और हर किसी को बता रहा था कि आज उसकी जीप पहाड़ की तरह चली।
नीम के नीचे लाठी वाला बूढ़ा बैठा था। उसकी हरी गाड़ी बाहर खड़ी थी, एक पहिया अब भी कीचड़ की तरफ़ झुका हुआ। उसने मुझे देखा, और मुझे लगा कि उसने मेरे पास आने से पहले ही कुछ सोच लिया है।
नैना कोने की बेंच पर बैठी थी, कैमरा गोद में, कॉपी खुली। उसने अपने काग़ज़ों को इस तरह रखा था जैसे कोई ताश के पत्ते जमा रहा हो।
और कबीर की जगह खाली थी।
वो शाम को आने को कहकर खुद नहीं आया।
मैंने उसका सवाल अपने अंदर लटका हुआ महसूस किया — “तुम्हारे पापा का नाम जोशी है?” — जैसे किसी ने छत से एक तार लटका दिया हो और उस पर कुछ टाँगना बाक़ी हो।
कड़ाही चढ़ी थी। रुक्मा दीदी के हाथ में करछी थी और उनकी आवाज़ ढाबे के शोर को इस तरह काट रही थी जैसे चाकू मक्खन को।
“किशन, तेरी रोटी जल गई तो मैं नहीं जलाऊँगी। खुद जला।”
“दीदी, मेरी रोटी कभी नहीं जलती।”
“तेरी रोटी हर बार जलती है। तू बस खाता है, देखता नहीं।”
हँसी उठी। यही ढाबे की आवाज़ थी। पहले चुटकी, फिर हँसी, फिर चाय का कटोरा खटकना।
मैं बेंच पर बैठा था और अपनी कॉपी खोलकर आज का हिसाब लिख रहा था।
पीतल का पत्ता, साठ रुपये। नया टायर, चार सौ अस्सी। मज़दूरी, तीन सौ। दीदी को चालीस। जुगनू को बीस। बचे, तीन सौ।
तीन साफ़ कटे तार। पीला लिफ़ाफ़ा। दूसरा पीतल का नट। चार सौ उन्नीस। जोशी। जला पन्ना।
मैंने सब लिखा, क्योंकि जो लिखा नहीं जाता, वो एक दिन दूसरे के मुँह से निकलता है और फिर उसे सच कहा जाता है।
तभी मैंने सुना।
खट। खट। खट।
बहुत हल्का। इतना हल्का कि ढाबे में कोई नहीं सुन सकता था। कड़ाही चटक रही थी, रोटियाँ सिक रही थीं, किशन हँस रहा था, और उस शोर के नीचे एक धातु धातु से टकरा रही थी — ठक-ठक, ठक-ठक — जैसे कोई पुरानी चीज़ अपनी आदत से बज रही हो।
मैंने सिर उठाया।
तीन आदमी आ रहे थे।
आगे कालू था। काली माला, भौंह पर कटा निशान, कंधे झुकाए हुए, चाल में वो झूला जो आदमी को बड़ा दिखाती है। उसके पीछे दो आदमी थे।
एक मोटा, चौड़ा, गर्दन पर सफ़ेद शर्ट का कालर। दूसरा पतला, जिसके हाथ में एक छोटा लोहा था जिसे वो उँगलियों में लगातार घुमा रहा था। वो लोहा घूमता था और उसकी आवाज़ नहीं आती थी, क्योंकि वो हवा में घूम रहा था, चीज़ से नहीं टकरा रहा था।
पर मैंने उसका हाथ पहचाना।
ये वही हाथ था। वही आदमी जो फाइल वाले के साथ आया था, उस दिन, जब किसी ने पीली गाड़ी और रघुवीर के बारे में पूछा था।
ढाबे का शोर एक पल के लिए धीमा पड़ा। ड्राइवर ऐसे लोग हैं जो हँसते हुए भी दरवाज़े की तरफ़ देख रहे होते हैं। जब तीन आदमी आते हैं जिनके कपड़े ढाबे के नहीं हैं, तो कटोरा रखा जाता है।
कालू मेरी बेंच के सामने आकर रुका।
“चाचा जी का भतीजा।” उसने कहा। जैसे उपाधि दे रहा हो।
“कालू भाई।” मैंने कहा। “बैठिए। चाय ठंडी हो रही है।”
“मैं चाय के लिए नहीं आया।”
“और मैं उठने के लिए नहीं बैठा हूँ।” मैंने कहा। “तो दोनों अपनी जगह ठीक हैं।”
पीछे किसी ने हँसी दबाई। किशन था।
कालू ने एक पल के लिए आँखें बंद कीं। फिर उसने धीरे से, मेरे कान के पास, इतना धीरे कि सिर्फ़ मैं सुन सकूँ, कहा, “तीन तार के टुकड़े। कहाँ हैं?”
“बल्लू भाई की जेब में।” मैंने वैसे ही धीरे कहा।
“वो मेरा आदमी है।”
“तो उससे माँग लो।”
“वो तेरी बात सुनता है।”
“वो अपने बेटे की बात भी नहीं सुनता।” मैंने कहा। “वो सिर्फ़ अपनी गाड़ी की बात सुनता है। उससे कहिए कि मोती ने बुलाया है, वो खुद तार लेकर आ जाएगा।”
कालू का चेहरा नहीं बदला। यही उसके काम की चीज़ थी। वो चेहरा बदलकर नहीं डराता था। वो चेहरा एक जैसा रखकर डराता था, ताकि सामने वाला खुद से डरने लगे।
“सुन।” उसने कहा। “तेरी गाड़ी बाहर खड़ी है। पीली। उस पर एक नाम लिखा है जो इस शहर में कोई नहीं लिखता। तू उसे मिटा दे। कल सुबह तक। नहीं तो कल शाम तक वो गाड़ी कबाड़े में तोल दी जाएगी, और तू उसके साथ।”
उसने मेरी कॉपी की तरफ़ देखा।
“और ये काग़ज़ वाला काम बंद कर। काग़ज़ से पेट नहीं भरता।”
मैं कुछ कहने वाला था।
तभी फिर आई। खट। खट। खट।
बहुत पास से। मेरे कान के बिल्कुल पास से। कालू झुका हुआ था, उसकी जेब मेरे कंधे के सामने थी, और उसकी जेब के अंदर, कपड़े के नीचे, धातु धातु से टकरा रही थी।
ठक-ठक। ठक-ठक।
वो आवाज़ जिसे कोई नहीं सुनता। वो आवाज़ जो आदमी के साथ चलती है, जैसे कोई अपनी ही घड़ी बजा रहा हो।
मैंने अपना सिर थोड़ा सा झुकाया और मुस्कुरा दिया। मुझे नहीं पता कि वो मुस्कान कहाँ से आई। शायद डर से। शायद उस काम से जिसमें मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी बिताई थी — उस काम से जहाँ आप किसी भी गाड़ी के पास खड़े होकर आँख बंद कर लेते हैं और गाड़ी आपको बता देती है कि उसके अंदर कहाँ दर्द है।
मैंने सिर उठाया।
और मैंने ढाबे की तरफ़ ज़ोर से कहा, इतना ज़ोर से कि कड़ाही की आवाज़ भी पीछे छूट जाए।
“कालू भाई, आपकी जेब में प्लायर बज रहा है।”
कड़ाही रुकी।
रोटी सिकनी से उतारने वाला हाथ हवा में ही रुक गया।
किशन का कटोरा मुँह से पहले ही नीचे आ गया।
“क्या बोला?” कालू ने कहा।
“आपकी जेब में प्लायर बज रहा है।” मैंने कहा। “लाल प्लायर। धँसा हुआ। उसकी आवाज़ हर बार एक जैसी नहीं होती, क्योंकि उसके अंदर का पत्ता मुड़ा हुआ है। इसलिए वो ठक-ठक करता है, टन-टन नहीं।”
कालू की जेब की तरफ़ मेरी उँगली उठी।
“और यही आवाज़ उस रात आई थी।” मैंने कहा।
“किस रात?”
“जिस रात मोती की ब्रेक केबल कटी थी।” मैंने कहा।
ढाबे में वो चुप्पी आई जो बहुत महँगी होती है। मैंने ऐसी चुप्पी पहले कभी नहीं सुनी थी। ग्यारह ट्रकों के बीच खड़े लगभग चालीस आदमी, और चालीस आदमियों के हाथ में रोटी, और कोई नहीं चबा रहा था।
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