A Dark Secret – Chapter 78
“कबीर भाई।” मैंने कहा।
“जले पन्ने पर जोशी लिखा है।” उसने कहा, जैसे खुद से बात कर रहा हो। “और मैंने तीन दिन पहले अपने कान से चार सौ उन्नीस सुना था। फ़ोन पर। किसी ने किसी से कहा था, चार सौ उन्नीस वाला डिब्बा निकल गया, उसका काग़ज़ नहीं मिला। मैंने सुना और भूल गया, क्योंकि मेरा काम सुनना नहीं है। मेरा काम पंचर है।”
उसने अपनी हथेली देखी, जैसे उसमें कुछ लिखा हो।
“तुम्हारे पापा का नाम जोशी है।” उसने नैना से कहा। “और तुम्हारे पापा की गाड़ी सत्ताईस सितंबर को जली थी।”
नैना ने कुछ नहीं कहा। उसने बस सिर हिलाया।
“किस रंग की थी?” कबीर ने पूछा।
“पीली।” नैना ने कहा। “पीली थी। और उस पर कोई नाम नहीं लिखा था। सिर्फ़ पीछे एक नीला गोल निशान था।”
कबीर ने आँखें बंद कर लीं।
फिर वो उठा। धीरे-धीरे, दोनों हाथों से काउंटर पकड़कर। उसने प्लास्टिक की थैली उठाई, जिसमें जला पन्ना था, और मेरी तरफ़ बढ़ा दी।
“ये तेरे पास रहेगा।” उसने कहा।
“क्यों?”
“क्योंकि मेरे पास रहेगा तो मैं इसे जला दूँगा।” उसने कहा। “आज नहीं। पर एक दिन ज़रूर। मैं ऐसा आदमी हूँ। मैं जानता हूँ कि मैं कैसा आदमी हूँ।”
नैना ने उसकी तरफ़ देखा। “आप डरते हैं?”
“मेरी एक अम्मा है।” कबीर ने कहा। “वो बीमार है। उसकी दवा हर महीने आती है। किसी की जेब से आती है। मुझे पता है किसकी जेब से आती है, और मुझे ये भी पता है कि उस जेब के आगे मैं कुछ नहीं हूँ। मेरी दुकान, मेरा रजिस्टर, मेरा कैलकुलेटर — सब उसी जेब की दया पर चल रहा है।”
उसने अपनी दुकान की तरफ़ हाथ किया, जैसे किसी और की दुकान दिखा रहा हो।
“अब जाओ।” उसने कहा। “शाम को आना।”
“शाम को क्या होगा?” मैंने पूछा।
“शाम को मैं तुमसे झूठ नहीं बोलूँगा।” कबीर ने कहा। “और अभी मैं झूठ ही बोल रहा हूँ, क्योंकि अभी सच बोलने की हिम्मत नहीं है। जाओ।”
हम बाहर निकले। गली में धूप तेज़ हो चुकी थी और कबाड़ के पहाड़ों से लोहे की गंध आ रही थी।
नैना कुछ कदम चुप चली। फिर बोली, “उसने झूठ नहीं बोला।”
“कब?”
“जब उसने कहा कि वो डरता है।” उसने कहा। “बाक़ी सब वो झूठ बोल रहा था।”
“तुम्हें कैसे पता?”
“मुझे पता है।” उसने कहा। “मैं तीन महीने से ऐसे लोगों के सामने बैठ रही हूँ। जो डरता है, वो काग़ज़ को हाथ नहीं लगाता। जो नहीं डरता, वो काग़ज़ की नक़ल बना लेता है।”
हम पीतल बेचने वाले बूढ़े की सिगड़ी के पास से गुज़रे। बूढ़े ने हमें देखा और अपने दो दाँतों वाली मुस्कान में कुछ कहा जो हवा में उड़ गया। मैंने हाथ उठा दिया, बस इतना।
गली के मोड़ पर बैलगाड़ी फिर आई। घंटी फिर आधी बजी।
मैं रुक गया।
“क्या हुआ?” नैना ने पूछा।
“कुछ नहीं।” मैंने कहा। “बस ये घंटी टूटी हुई है।”
“हर चीज़ टूटी हुई है यहाँ।”
“हाँ।” मैंने कहा। “पर हर टूटी चीज़ अपनी आवाज़ से बताती है कि वो कहाँ टूटी है। ये घंटी नहीं बज रही। ये घंटी बता रही है कि उसके अंदर का लोहा घिस गया।”
नैना ने मेरी तरफ़ देखा, और मुझे लगा कि वो अब कुछ कहने वाली है जो बहुत दिनों से उसके अंदर रखा है।
“अर्जुन।” उसने कहा। “मैं थाने गई थी।”
“किस थाने?”
“छब्बीस नंबर।”
मेरे पैर अपने आप धीमे हो गए।
“मैंने पापा की फाइल माँगी।” उसने कहा। “पहले उन्होंने कहा, रिकॉर्ड में देखना पड़ेगा। दूसरी बार गई तो कहा, वो साल का रजिस्टर ही नहीं मिल रहा। तीसरी बार मैंने एक अधेड़ आदमी को देखा, चमकती मूँछ, हाथ में फाइल, और फाइल के नीचे एक मुड़ा हुआ पीला काग़ज़ दबा था।”
“तिवारी।” मैंने कहा।
“तुम्हें पता है?”
“मैं भी गया था।” मैंने कहा। “उसने मुझसे कहा था, काग़ज़ पर सब लिखा है बेटा। जब मैंने कहा कि काग़ज़ पर ग़लत लिखा है, तो उसने कहा, तो काग़ज़ बदलवा लो।”
हम कुछ देर चुप चले। सड़क पर ट्रकों का शोर बढ़ गया था। दोपहर हो रही थी और टोल की तरफ़ से लगातार हॉर्न आ रहे थे, जैसे कोई बड़ा जानवर साँस ले रहा हो।
“फाइल ग़ायब नहीं होती।” मैंने कहा।
“क्या?”
“फाइल ग़ायब नहीं होती।” मैंने दोहराया। “फाइल उठाई जाती है। जो चीज़ गिरती है, वो खो जाती है। जो चीज़ उठाई जाती है, वो किसी की जेब में जाती है। और हमें उस जेब का नाम ढूँढना है, फाइल नहीं।”
नैना के चश्मे से पसीना आ गया था। उसने उसे ऊपर धकेला।
“तुम्हारे पापा की गाड़ी में उस रात क्या था?” मैंने पूछा।
“बही में लिखा है, दवा की खेप।” उसने कहा।
“दवा।” मैंने कहा। “और मेरे पापा की पीली गाड़ी पर ठाकुर ट्रांसपोर्ट लिखा है। देवा का ठाकुर। और उसी दिन, उसी तारीख़ को, तुम्हारे पापा की पीली गाड़ी जलती है। और दो साल पहले कबीर भाई के पास एक आदमी आता है, बीमा के काग़ज़ पर हस्ताक्षर कराने, और दो हफ़्ते बाद वही गाड़ी जलती मिलती है।”
“मतलब?”
“मतलब ये कि हम दो लोग नहीं हैं।” मैंने कहा। “हम इस शहर के बहुत सारे लोगों के बच्चे हैं, जिनके पास एक ही जगह से आई हुई एक ही कहानी है। और वो कहानी हर बार अलग आदमी पर लिखी गई है।”
नैना ने अपना बैग कंधे पर ठीक किया। उसकी उलझी हुई चार्जर की तार फिर लटक गई।
“अर्जुन।” उसने कहा। “अगर ये सब सच है, तो हम किसके पास जाएँगे?”
“किसी के पास नहीं।” मैंने कहा।
“फिर?”
“पहले काग़ज़ इकट्ठे करेंगे।” मैंने कहा। “फिर ऐसा काग़ज़ बनाएँगे जिसे उठाया न जा सके।”
ढाबे पर पहुँचते-पहुँचते दो बज चुके थे।
रुक्मा दीदी चूल्हे के पास बैठी थीं और सात बेंचों की तरफ़ देखकर उनके चेहरे पर वो भाव था जो माँ के चेहरे पर तब आता है जब बेटा पहली बार खुद से बटन लगा ले।
“सातों?” उन्होंने पूछा।
“सातों।” मैंने कहा। “एक की टाँग अब भी थोड़ी घसीटती है।”
“रहने दे।” उन्होंने कहा। “वो बेंच मेरी है। उस पर मैं बैठती हूँ, इसलिए उसे घसीटना हक़ है।”
जुगनू नीम के नीचे से उठ आया था। उसके बाल एक तरफ़ दबे हुए थे और आँखें अभी पूरी नहीं खुली थीं।
“दीदी, चाय।” उसने कहा।
“पहले मुँह धो।” रुक्मा ने कहा।
“चाय पहले।”
“मुँह पहले।”
जुगनू नाली की तरफ़ गया और मैंने अपनी जेब गिनी। तीन सौ रुपये बचे थे। मैंने उसमें से बीस निकाले और जुगनू के लिए नीम के नीचे रख दिए, जहाँ उसकी टूटी पतंग पड़ी थी।
“ये क्या?” रुक्मा ने पूछा।
“उसका हिस्सा।” मैंने कहा। “कल उसने सफ़ेद गाड़ी की जगह से रसीद का कोना उठाया था, दीदी। अगर वो न उठाता, तो आज मैं कबीर भाई की दुकान पर बैठा हुआ नहीं होता।”
रुक्मा ने मेरी तरफ़ देखा। “कबीर की दुकान पर क्या हुआ?”
मैंने बताया। जला पन्ना। जोशी नाम। कैलकुलेटर गिरना। कबीर का फ़र्श पर बैठ जाना।
रुक्मा ने सब सुना। फिर उन्होंने करछी चूल्हे से उठाई, उसे पोंछा, और दीवार पर टाँग दी।
“कबीर।” उन्होंने कहा, जैसे कोई पुराना हिसाब जोड़ रही हों। “वो लड़का बारह साल से इस बाज़ार में है। मैंने उसे कभी किसी के सामने झुकते नहीं देखा। वो अपनी दुकान के बाहर किसी को पानी तक नहीं माँगता।”
“आज वो फ़र्श पर बैठ गया।” मैंने कहा।
“तो आज कुछ बड़ा हुआ है।” रुक्मा ने कहा। “और बेटा, जब इस शहर में कुछ बड़ा होता है, तो शाम तक कोई न कोई दरवाज़ा खटखटाने आता है। तैयार रह।”
उनकी बात सच निकली। बस उन्हें ये नहीं पता था कि दरवाज़ा खटखटाने नहीं, सीधे ट्रक से उतरकर आएगा।
अम्मा का फ़ोन चार बजे आया।
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