A Dark Secret – Chapter 80
मैंने आगे कहा, धीरे से, बिना चढ़े हुए, “मैं झूठ नहीं बोल रहा। मैं सिर्फ़ बता रहा हूँ कि मुझे क्या सुनाई दिया।”
किशन ने सबसे पहले हँसा। उसकी हँसी फूटी, अचानक, जैसे छाती से कुछ निकल गया हो। फिर भूपेंद्र हँसा। फिर पीछे रोटी वाला लड़का। फिर वो बूढ़ा जो नीम के नीचे बैठा था, उसने अपनी लाठी ज़मीन पर पटकी और हँसते हुए कुछ कहा जो किसी को समझ नहीं आया।
हँसी ढाबे से बाहर निकलकर सड़क तक गई। किसी ने ट्रक का हॉर्न दो बार बजाया, जैसे हँसी में शामिल हो रहा हो।
और कालू वहीं खड़ा रहा।
उसके चेहरे पर कुछ नहीं आया। पर उसका गाल हिला। उसकी गर्दन की नस ऊपर उभरी, और उसने अपना हाथ जेब पर रख दिया — आदत से, जैसे कोई अपनी जेब को छिपाने की कोशिश करता है, और उसी हरकत से सबको बता देता है कि जेब में क्या है।
हँसी का स्वाद मेरे मुँह में कड़वा था।
मैं नहीं हँसा।
मैं उसके चेहरे को देख रहा था, और मुझे लगा कि हँसते हुए लोग उस आदमी से ज़्यादा ख़तरनाक हैं जो गुस्से में है। क्योंकि गुस्से वाला आदमी आपको मारता है। हँसी वाला आदमी आपको याद रखता है।
उसने जेब से प्लायर निकाला। लाल, धँसा हुआ, पुराना, जिसका रंग किनारों से उतर गया था। उसने उसे मेरी तरफ़ बढ़ाया, जैसे कह रहा हो, ले, छीन ले।
“ले।” उसने कहा।
“नहीं।” मैंने कहा।
“ले ले।”
“वो आपका है।” मैंने कहा। “मुझे आपकी चीज़ नहीं चाहिए। मुझे सिर्फ़ ये जानना था कि उस रात वहाँ कौन था। अब पता है।”
कालू ने प्लायर मुट्ठी में भींचा। और तभी उसके पीछे वो पतला आदमी आगे बढ़ा।
“कालू सर।” उसने कहा।
उसकी आवाज़ बहुत खुरदरी थी, जैसे किसी ने उसके गले में रेत भर दी हो। पर उसमें एक बात थी जो मुझे पहले से पता थी — वो आदमी “सर” नहीं कहता। वो “कालू सर” कहकर उसे याद दिला रहा था कि वो ऊपर वाले का आदमी है, और कालू नीचे वाला।
मैंने उसकी आवाज़ को अंदर संभालकर रख लिया। कभी काम आएगी।
वो पतला आदमी मेज़ के किनारे तक आया। मोटे वाले ने अपनी कलाई घुमाई, जैसे अभी कुछ तोड़ने वाला हो।
रुक्मा दीदी नहीं दौड़ीं।
वो चूल्हे से उठीं, करछी हाथ में ली, और धीरे-धीरे आईं — जैसे कोई बाज़ार से सब्ज़ी लेकर लौट रहा हो। ढाबे के बीच आकर वो रुकीं और करछी उठाकर मेज़ पर रख दी।
करछी की आवाज़ आई। टन।
“बंद।” रुक्मा ने कहा।
किसी ने कुछ नहीं कहा।
“मेरे ढाबे पर मारपीट नहीं होती।” उन्होंने कहा। “यहाँ रोटी बनती है और हिसाब लिखा जाता है। मारने-पीटने के लिए सड़क है, जो बाहर है, जिस पर तुम तीनों की गाड़ियाँ खड़ी हैं।”
उन्होंने पतले आदमी की तरफ़ देखा।
“और तू अपना लोहा जेब में रख। मेरी कड़ाही में गिरा तो तेरे हाथ से ज़्यादा उसका दाम होगा।”
पतले आदमी ने लोहा जेब में रख लिया।
कालू ने एक बार ढाबे को देखा। चालीस आदमी। ग्यारह ट्रक। और उसका प्लायर, जो अब उसकी मुट्ठी में चुप था।
“अर्जुन।” उसने मेरा नाम लिया। पहली बार। “तू कान वाला आदमी है।”
“हाँ।” मैंने कहा।
“कान वाले आदमी की उम्र लंबी नहीं होती।” उसने कहा। “क्योंकि वो बहुत सुनता है।”
“और आपकी उम्र?” मैंने कहा।
उसने जवाब नहीं दिया। उसने पलटना शुरू किया। मोटा और पतला दोनों पीछे हट गए। ढाबे की हँसी पूरी तरह मर चुकी थी और लोग फिर खाने में लग गए थे, पर उनके कान अब भी उसी तरफ़ थे।
कालू तीन कदम गया। फिर रुका।
वो मुड़ा नहीं। बस वहीं खड़े-खड़े, पीठ देकर, बोला। उसकी आवाज़ अब उतनी धीमी नहीं थी। वो जानबूझकर ऊकबीर फ़र्श पर बैठा रहा। बैटरी काउंटर के नीचे लुढ़की पड़ी थी और वो उसे देखता रहा, जैसे वो बैटरी नहीं, कोई और चीज़ हो जो गिर गई हो और अब कभी वापस नहीं मिलेगी।
नैना ने कैमरा नीचे किया।
"कबीर भाई।"
वो नहीं बोला।
"पानी पीजिए।"
"मैंने तुमसे पूछा था।" उसने कहा। आवाज़ सूखी थी, जैसे रेत पर पैर रगड़कर निकली हो। "मैंने पूछा था कि तुम्हारे पापा का नाम जोशी है?"
"और मैंने जवाब दे दिया।" नैना ने कहा। "मोहन जोशी।"
"हाँ।" कबीर ने धीरे से कहा। "मोहन जोशी।"
उसने नाम को ऐसे दोहराया जैसे कोई बहुत पुरानी किताब का पन्ना पलट रहा हो, जिस पर बरसों की धूल जमी हो और जिसे खोलने से डर लगता हो।
मैंने प्लास्टिक की थैली अपनी तरफ़ खींच ली। जले पन्ने पर वो चार अक्षर साफ़ थे — जो, शी — और उनके नीचे चार सौ उन्नीस की रकम। मुझे लगा कि ये पन्ना मैंने पहले कहीं देखा है। पर ऐसा नहीं था। ये सिर्फ़ उस गंध की बात थी जो अब भी मेरी नाक में थी।
"कबीर।" मैंने कहा। "जो आदमी दो साल पहले तुम्हारे पास हस्ताक्षर कराने आया था, उसकी आवाज़ कैसी थी?"
कबीर ने सिर उठाया।
"क्यों?"
"बता दो।"
वो एक पल सोचता रहा। फिर बोला, "धीमी। बहुत धीमी। ऐसी कि सुनने के लिए तुम्हें पास जाना पड़े। मैंने उससे दो बार पूछा था, क्या कहा? वो हँसा था। हँसी भी धीमी।"
"क्या कहा था उसने?"
"उसने कहा था — भाई साहब का शुक्रिया।" कबीर ने कहा। "बस यही। 'भाई साहब का शुक्रिया, कबीर भाई।' और फिर वो गया।"
मैं चुप हो गया।
भाई साहब।
जुगनू ने कहा था कि उसने सफ़ेद कुर्ते वाले को "ठाकुर साहब" कहते सुना था। रुक्मा दीदी ने कहा था कि मीठी बोली वाला आदमी आया था। और अब कबीर कह रहा था कि कोई आदमी "भाई साहब का शुक्रिया" कहकर गया था।
तीन जगह। तीन आवाज़ें। और तीनों एक ही नाम की तरफ़ इशारा कर रही थीं, बिना नाम लिए।
"कबीर।" नैना ने कहा। "आप मुझसे कुछ छिपा रहे हैं।"
कबीर ने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखें अब सूखी नहीं थीं। नम थीं, पर आँसू नहीं थे। बस उस तरह नम, जैसे रात भर जागने के बाद होती हैं।
"मैं दो साल से छिपा रहा हूँ।" उसने कहा। "तुम सोचती हो कि तुम पहली हो जो मुझसे सवाल पूछ रही हो? दो साल पहले मैंने ये पन्ना पुलिस को देना चाहा था। थाने तक गया। मेरी बात सुनी गई, काग़ज़ लिया गया, और दो दिन बाद मुझे फोन आया — कबीर भाई, आपकी दुकान के काग़ज़ों में कुछ गड़बड़ है, एक बार आ जाइए। मैं नहीं गया। तीसरे दिन मेरी दुकान के बाहर दो आदमी खड़े मिले। कुछ नहीं बोले। बस खड़े रहे। शाम तक। दूसरे दिन फिर खड़े मिले। तीसरे दिन नहीं आए। उस दिन के बाद मैंने कोई काग़ज़ किसी को नहीं दिया।"
नैना ने अपना चश्मा ऊपर धकेला।
"और मुझे क्यों दिया?" उसने पूछा।
"क्योंकि तुम्हारे पापा का नाम उस पन्ने पर है।" कबीर ने कहा। "और क्योंकि…" वो रुक गया।
"क्योंकि?"
"क्योंकि अब मेरे पास बचाने के लिए कुछ नहीं है।" कबीर ने कहा। "दुकान है। ईंटें हैं। पंचर का सामान है। इन्हें कोई नहीं ले जाएगा। पर मैं जब इस पन्ने को देखता हूँ, तो मुझे लगता है कि मैं दो साल से एक मुर्दे के साथ सो रहा हूँ।"
कमरे में चुप्पी फैल गई।
बाहर कबाड़ बाज़ार की आवाज़ें आ रही थीं। कहीं हथौड़ा पड़ रहा था, कहीं कोई गाड़ी का पुर्ज़ा खींच रहा था, कहीं कोई अपनी बीवी को बुला रहा था। पर अंदर ये कमरा जैसे किसी और शहर में था। जिस शहर में सिर्फ़ काग़ज़ होते हैं और काग़ज़ों में सिर्फ़ डर।
मैंने थैली कबीर की तरफ़ बढ़ाई।
"ये तुम रखो।"
उसने मेरी तरफ़ देखा।
"मेरे पास रहेगी तो सिर्फ़ मेरे पास रहेगी।" मैंने कहा। "तुम्हारे पास रहेगी तो दुकान के काग़ज़ों में खो जाएगी। जो भी इसे ढूँढने आएगा, उसे लगेगा कि ये किसी पुराने हिसाब का हिस्सा है। और मैं वादा करता हूँ कि जब वक़्त आएगा, मैं इसे वापस माँगूँगा।"
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