A Dark Secret75 / 536

A Dark Secret – Chapter 75

7 min read November 6, 2026

वो उठीं। जाते-जाते रुक गईं और मेरी तरफ़ देखा।

"अर्जुन।"

"हाँ, दीदी।"

"ये नाम अभी किसी को मत बताना।" उन्होंने कहा। "कोई नाम जब काग़ज़ पर आ जाए, तो उसका आदमी उस काग़ज़ को जलाने निकल पड़ता है।"

वो अंदर चली गईं।

मैंने कटोरा खाली किया।

नैना ने अपनी बही को गोद में रख लिया और उसके किनारे को सहलाने लगी, जैसे कोई बच्चा अपनी चादर का कोना सहलाता है।

"एक आदमी है।" उसने अचानक कहा। "पन्नालाल। मेरे पापा के यहाँ मुनीम था। बही वो लिखता था। हिसाब वो जोड़ता था। पापा के जाने के बाद वो कहीं चला गया। मैंने उसे ढूँढा पर नहीं मिला।"

"कितना पुराना?"

"सत्तर के ऊपर।" उसने कहा। "और मुझे लगता है वो अभी भी इसी शहर में है। कबाड़ बाज़ार के पीछे, किसी पुरानी कोठरी में। मुझे एक बार किसी ने बताया था कि वो वहाँ रहता है, पर मैं जाकर नहीं देख पाई। डरी? नहीं। सच कहूँ तो डरी नहीं, सिर्फ़ अकेले जाने से बचती रही।"

"तो साथ चलेंगे।"

उसने मेरी तरफ़ देखा।

"तू चलेगा?"

"मेरे पास चलने के अलावा और क्या है।" मैंने कहा। "और एक बात है।"

"क्या?"

"अगर ये बही पन्नालाल ने लिखी है, तो ये कोना भी उसने ही लिखा होगा। और अगर उसने ये नाम लिखा है, तो वो जानता है कि इस नाम को मिटाने की कोशिश किसने की।"

नैना ने अपना बैग उठाया। उसने बही बैग में रखी और फिर एकाएक रुक गई।

"अर्जुन।"

"हाँ।"

"वो कोना जहाँ नाम लिखा था।" उसने कहा। "उसके ऊपर एक और जगह थी। खाली।"

"कैसी खाली?"

"जैसे पहले वहाँ भी कुछ लिखा हो और बहुत पुरानी स्याही में मिटा दिया गया हो।" उसने कहा। "बहुत पुरानी। इतनी पुरानी कि काग़ज़ ही वहाँ पतला हो गया है। देवेंद्र ठाकुर का नाम उस खाली जगह के नीचे लिखा है।"

मैंने लालटेन को बहुत नीचे किया। रोशनी तेज़ हुई और मैंने अपना सिर काग़ज़ के बहुत पास ले जाकर देखा।

नैना ठीक कह रही थी।

देवेंद्र ठाकुर के नाम के ऊपर एक लकीर भी नहीं थी। बस एक खाली जगह थी, जहाँ काग़ज़ का रेशा टूटा हुआ था, जैसे किसी ने बहुत पुरानी स्याही को किसी चीज़ से रगड़कर मिटाया हो।

जैसे कोई नाम पहले ही मिटा दिया गया हो।

कोई ऐसा नाम जिससे भी बड़ा नाम।

मेरी उँगली उस खाली जगह पर रुक गई।

"नैना।" मैंने कहा। "ये जगह खाली नहीं है। ये जगह मिटाई गई है।"

"मुझे भी वही लगा।" उसने कहा। "पर मैं डर रही थी कि कहीं मैं ही भ्रम में न हूँ।"

"तू भ्रम में नहीं है।"

मैंने रुमाल फिर से उठाया और उस खाली जगह पर बहुत हल्का सा फेरा।

कुछ नहीं उभरा। सिर्फ़ एक हल्की सी लकीर दिखी, जो किसी अक्षर के ऊपर का हिस्सा हो सकती थी, या हो सकती थी किसी काग़ज़ की सिलाई।

मैंने रुमाल नीचे रख दिया।

और मैंने अपनी घड़ी देखी। वो हमेशा की तरह पाँच मिनट आगे चल रही थी। रात के ग्यारह बजकर बयालीस मिनट।

"कल सुबह नौ बजे।" मैंने कहा।

"क्या?"

"काँच के दफ़्तर वाला आदमी आएगा।" मैंने कहा। "टीटू ने कहा था। काग़ज़ पहले से छपे हुए हैं, सूखे पड़े हैं। बस मोहर लगनी है।"

नैना ने अपना कैमरा बैग से निकाला। उसने उसे अपनी गोद में रखा और उसकी पट्टी सहलाई।

"तो कल हम दो काम करेंगे।" उसने कहा। "सुबह नौ बजे टोल। और फिर पन्नालाल।"

"और एक काम।" मैंने कहा।

"कौन सा?"

"मुझे ये देखना है कि सफ़ेद कुर्ते वाला आदमी जब अगली बार मुझे बेटा कहेगा, तो उसकी आवाज़ में वो हल्की कंपन है या नहीं।"

नैना ने मेरी तरफ़ देखा।

"तू आवाज़ से झूठ पकड़ता है।"

"कभी-कभी।" मैंने कहा। "और यही सबसे बड़ी दिक्कत है। कभी-कभी। क्योंकि अच्छे लोग भी डर से काँपते हैं। और बुरे लोग बहुत मीठा बोलते हैं। इसलिए मुझे पता ही नहीं चलेगा कि कौन डर से काँप रहा है और कौन झूठ से।"

मैंने काग़ज़ समेटे। सबसे ऊपर पापा का टिकट रखा। उसके नीचे रवि की रसीद। फिर फटा कोना। फिर किशन की परची। और सबके ऊपर नैना की बही, जिसके कोने पर एक नाम उभर आया था और उस नाम के ऊपर एक जगह खाली थी।

जब मैं उठा तो मेरे घुटने चटाई से चिपक रहे थे, जैसे रात ने मुझे वहीं पकड़ लिया हो।

तभी बेंच की तरफ़ से आवाज़ आई।

"अर्जुन भैया।"

जुगनू था। वो बेंच पर पेट के बल सो रहा था, और अब उसने अपना सिर उठा लिया था। उसके बाल उलझे हुए थे और आँखें आधी बंद थीं।

"तू जाग रहा है?" मैंने पूछा।

"तुम दोनों की फुसफुसाहट से नींद खुल गई।" उसने कहा। "और मैंने एक बात सुनी।"

"क्या सुनी?"

"तुमने कहा — देवेंद्र ठाकुर।" उसने कहा। "मुझे ये नाम पता है।"

मैं जम गया।

"कहाँ से पता है?"

जुगनू उठ बैठा। उसने अपने घुटने पर हाथ रखा और बिना रुके बोलना शुरू किया, जैसे कोई समाचार पढ़ रहा हो।

"टोल के पीछे जो बड़ा फाटक है न, उस पर एक छोटा बोर्ड लगा है। सफ़ेद पत्थर का। उस पर काली स्याही से लिखा है। मैंने उसे पढ़ा नहीं, पर एक दिन एक आदमी वहाँ खड़ा था, सफ़ेद कुर्ते में। वो फ़ोन पर बोल रहा था। उसने कहा — ठाकुर साहब से कह दो। मैंने सुना। फिर बाद में गार्ड ने उसे देखकर सलाम किया और कहा — ठाकुर साहब, अंदर।"

मैंने एक कदम आगे रखा।

"और कब?"

"पाँच दिन पहले।" जुगनू ने कहा। "जिस दिन मैंने तुम्हें सफ़ेद गाड़ी वाले की बात बताई थी, उससे दो दिन पहले।"

मैंने नैना की तरफ़ देखा। वो खड़ी थी, कैमरा हाथ में।

"जुगनू।" मैंने कहा। "वो सफ़ेद पत्थर का बोर्ड। उस पर नाम के नीचे कुछ और लिखा था?"

जुगनू ने अपनी आँखें मिचकाईं। फिर उसने कहा, "नीचे दो शब्द थे जो पूरे मिट गए थे। बस एक लकीर बची थी।"

मैंने लालटेन उठाई।

"सो जा।" मैंने कहा। "कल सुबह जल्दी उठना है।"

"कितनी जल्दी?"

"सात बजे।"

"सात बजे मैं उठ जाता हूँ।" उसने कहा और फिर करवट बदल ली। तीन सेकंड में उसकी साँसें बदल गईं। बच्चे ऐसे ही होते हैं। जिस चीज़ को वो अभी नहीं समझते, उसे सोकर टाल देते हैं।

मैं ढाबे के बाहर आया।

टोल नाके की लाइटें अब भी जल रही थीं। कोई गाड़ी हॉर्न बजाकर निकली। मैंने आँखें बंद कीं और उस हॉर्न के पीछे छिपी दूसरी आवाज़ सुनी — धातु की घिसाई, हवा का रिसाव, और वो तीसरी आवाज़ जो बाकी सबको सिर्फ़ शोर लगती है।

कुछ नहीं मिला। रात बहुत शांत थी और शांति में मेरे कान काम नहीं करते।

नैना मेरे पीछे आई और हम दोनों सड़क के किनारे खड़े हो गए।

"अर्जुन।" उसने कहा।

"हाँ।"

"अगर वो आदमी सच में देवेंद्र ठाकुर है।" उसने धीरे से कहा। "और अगर उसका नाम मेरे पापा की बही में है, तो ये सिर्फ़ एक नाम नहीं है। ये एक दरवाज़ा है।"

"मुझे पता है।"

"और उस दरवाज़े के ऊपर।" उसने कहा। "एक खाली जगह है।"

मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। दो पीतल के नट वहीं थे — एक जिसके अंदर फ़ौलाद निकला था और उस पर मेरे पापा का नाम खुदा था, और दूसरा वही जो पीले लिफ़ाफ़े में आया था।

मैंने उन दोनों को मुट्ठी में भींचा। धातु ठंडी थी।

"नैना।" मैंने कहा। "देवा के नाम के ऊपर जो खाली जगह है, वो मेरे लिए सबसे बड़ी ख़बर है।"

"क्यों?"

"क्योंकि मैंने अब तक सोचा था कि देवा सबसे बड़ा है।" मैंने कहा। "पर अगर किसी ने देवा के नाम से भी पहले का नाम मिटा दिया है, तो इस शहर में देवा से भी बड़ा कोई है। और वो कोई ऐसा है जिसका नाम काग़ज़ पर आते ही मिट जाता है।"

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