A Dark Secret – Chapter 74
मैंने रुमाल को बही के उस कोने पर रखा और बहुत हल्का सा दबाया।
धूल रुमाल पर चिपक गई। मैंने रुमाल को हटाया, झाड़ा, फिर से रखा।
तीन बार।
चौथी बार जब मैंने रुमाल हटाया तो स्याही की ऊपरी परत हल्की हो चुकी थी और उसके नीचे कुछ दिख रहा था।
अक्षर थे। छोटे, तिरछे, हड़बड़ी में लिखे हुए। जैसे किसी ने पीछे मुड़कर देखते हुए लिखा हो।
मैंने लालटेन को थोड़ा नीचे किया। रोशनी तेज़ हुई।
नैना मेरे कंधे के ऊपर से झाँकने लगी। उसकी साँस मेरे कान के पास चल रही थी और मैं उसे सुन सकता था — वो अपनी साँस रोक रही थी।
अक्षर धीरे-धीरे साफ़ हो रहे थे।
पहला अक्षर — द।
दूसरा — े।
तीसरा — व।
मेरा हाथ रुक गया।
"नैना।" मैंने कहा। "पीछे हट जा। तेरी साँस काग़ज़ पर लग रही है।"
वो पीछे हट गई।
मैंने रुमाल फिर रखा। फिर हटाया।
नाम पूरा उभर आया।
देवेंद्र ठाकुर।
मैंने रुमाल को अपनी जाँघ पर रख दिया और सीधा बैठ गया।
लालटेन की रोशनी में उस नाम को देखते हुए मुझे लगा जैसे नीम का पेड़ मेरे ऊपर झुक आया हो। मेरे कान में एक आवाज़ गूँज रही थी, जो इस वक़्त यहाँ नहीं थी — वो आवाज़ जो मीठी थी, जो हर वाक्य में "बेटा" घुसा देती थी, जो कहती थी — तू मेरे बेटे जैसा है, बेटा।
"अर्जुन।" नैना ने कहा। "अर्जुन, तू ठीक है?"
"हाँ।" मैंने कहा। मेरी आवाज़ सुनकर मुझे खुद अजीब लगी। बहुत धीमी थी। जब मुझे गुस्सा आता है, मेरी आवाज़ उल्टी धीमी हो जाती है। यह बात मैं जानता हूँ और इसीलिए डरता हूँ।
"ये नाम जानता है तू?" नैना ने पूछा।
"ये नाम।" मैंने कहा। "ये नाम वो है जो मुझे बेटा कहता है।"
नैना की आँखें फैल गईं।
"वो सफ़ेद कुर्ते वाला?"
"हाँ।"
"देवेंद्र ठाकुर।" उसने धीरे से दोहराया, जैसे नाम को मुँह में तौल रही हो। "देवा भाई।"
"तू जानती है इसे?"
"मैंने ये नाम सुना है।" उसने कहा। "पर पूरा नहीं। लोग बस देवा भाई कहते हैं। जैसे उसका कोई पूरा नाम ही न हो। जैसे नाम लिखने की ज़रूरत ही न पड़े।"
मैंने अपने दोनों हाथ चटाई पर रख दिए।
धीरे-धीरे मुझे वो सारी बातें याद आने लगीं। वो कमरा, टोल के पीछे। वो चाय। वो इलायची की महक। वो सोने की अंगूठी। वो चश्मा जो जेब में रहता था और कभी आँखों पर नहीं चढ़ता था। और वो आवाज़, जो किसी को गाली नहीं देती थी, किसी पर हाथ नहीं उठाती थी, और फिर भी उस कमरे से निकलते हुए मेरी टाँगें ऐसे चल रही थीं जैसे किसी और की हों।
"उसने मुझे बेटा कहा था।" मैंने कहा। "दो बार। एक बार टोल के पीछे वाले कमरे में। और एक बार ढाबे के बाहर, सफ़ेद गाड़ी में। दोनों बार मैंने सोचा कि ये आदमी मीठा बोल रहा है। लोग मीठा बोलते हैं, नैना। मेरी अम्मा कहती हैं कि मीठी बोली वालों से उलझना मत।"
"अम्मा ठीक कहती हैं।"
"अम्मा ने ये नहीं कहा था कि मीठी बोली वाला आदमी मेरे पापा की बही में लिखा मिलेगा।"
नैना ने बही को अपनी तरफ़ खींचा। उसने उस कोने को फिर देखा। फिर उसने अपनी उँगली उस नाम के ऊपर फेरी, बिना छुए, बस हवा में।
"मेरे पापा इस आदमी के साथ काम करते थे।" उसने कहा। "मेरे पापा। जो दो गाड़ियों वाले छोटे आदमी थे। जो हर खेप का हिसाब अपनी बही में लिखते थे। जिनकी मौत के बाद फाइल ग़ायब हो गई।"
उसकी आवाज़ टूटी। उसने एक पल रुककर साँस ली और फिर आगे बोली।
"मैंने तुझे एक बात नहीं बताई थी।" उसने कहा। "पापा की आख़िरी खेप पर भी चार सौ उन्नीस लिखा था।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"तूने कहा था खेप का हिसाब अधूरा है।"
"हिसाब अधूरा है।" उसने कहा। "पर नंबर पूरा है। मैंने उस नंबर को बहुत बार देखा और मुझे लगा कि ये कोई गाड़ी का हिस्सा है। कोई पुर्ज़े का नंबर। कोई बिल्टी नंबर। पर अब जब तेरी कॉपी में भी वही नंबर है, और तेरे डिब्बे पर भी वही नंबर है, तो मुझे लगता है कि ये नंबर किसी चीज़ का नहीं, किसी खेप का नाम है।"
"खेप का नाम?"
"कुछ लोग खेप को नंबर से बुलाते हैं।" उसने कहा। "ताकि काग़ज़ पर माल का नाम न लिखना पड़े।"
मैंने कॉपी उठाई और उस पन्ने को खोला जहाँ मैंने देवा के कमरे की बात लिखी थी।
"टोल के काग़ज़।" मैंने कहा। "उनमें भी यही आँकड़ा बार-बार आ रहा है। मैंने सोचा था कि मैं भ्रम में हूँ। पर नहीं। जब बनवारी ने मुझे वो गड्डी दी, उसके नीचे जो रसीद थी, उस पर भी यही सत्ताईस सितंबर थी। और बनवारी ने कहा था कि टोल पर हर काग़ज़ बंद लिफ़ाफ़े में आता है। मतलब किसी को पढ़ने की ज़रूरत नहीं। बस मोहर लगाओ और आगे बढ़ाओ।"
"और नंबर?" नैना ने पूछा।
"नंबर शायद उनके लिए है जो जानते हैं कि उस नंबर के पीछे क्या है।"
नीम के नीचे चुप्पी छा गई।
तभी ढाबे का पिछला दरवाज़ा खुला और रुक्मा दीदी बाहर आईं। उनके हाथ में एक कटोरा था, जिसमें गुड़ की चाय थी। उन्होंने वो कटोरा मेरे सामने रख दिया।
"तेरी आवाज़ नहीं आ रही थी।" उन्होंने कहा। "मुझे लगा कि सो गया।"
"दीदी।" मैंने कहा। "एक नाम है। देवेंद्र ठाकुर।"
रुक्मा दीदी वहीं खड़ी रह गईं।
उनका हाथ कटोरे पर था और उनकी उँगलियाँ कटोरे के किनारे पर रुक गईं।
"कहाँ से आया ये नाम?" उन्होंने पूछा। उनकी आवाज़ से हँसी ग़ायब थी। पूरी तरह।
"इस बही में।" नैना ने कहा। "मेरे पापा की बही में।"
रुक्मा दीदी ने बही को देखा। फिर उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं, जैसे कोई पुरानी तस्वीर आँखों के सामने आ गई हो और वो उसे देखना नहीं चाहती हों।
"मैंने तुमसे कहा था न।" उन्होंने धीरे से कहा। "कि मीठी बोली वाले आदमी ने मुझे लिफ़ाफ़ा दिया था। मैंने उसका नाम कभी नहीं जाना। न पूछा। उस ज़माने में पूछते नहीं थे। जो आदमी सफ़ेद गाड़ी से आता था, सफ़ेद कुर्ता पहनता था और हर किसी को बेटा कहता था, उसका नाम कोई नहीं पूछता था।"
"और अब?"
"अब।" उन्होंने कहा। "अब पता चल रहा है कि नाम था, पर लोगों के मुँह से मिटा दिया गया था।"
उन्होंने कटोरा मेरी तरफ़ और सरका दिया।
"पी ले।" उन्होंने कहा। "ठंडी हो रही है।"
मैंने चाय पी। गुड़ की मिठास जीभ पर फैली और मैंने सोचा कि इस शहर में मिठास दो तरह की है — एक जो जीभ पर रहती है, और एक जो गले में अटक जाती है।
रुक्मा दीदी वहीं चटाई के किनारे बैठ गईं। उन्होंने अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया और बोलीं, "अब जो कहना है, साफ़ कहो। मुझे घूम-फिरकर बात करने की आदत नहीं है।"
नैना ने कहा, "दीदी, मेरे पापा इसी आदमी के साथ काम करते थे। और मुझे लगता है कि जिस रात पापा की गाड़ी जली, उस रात वो इसी आदमी के लिए कुछ ले जा रहे थे।"
रुक्मा दीदी ने उनकी तरफ़ देखा। बहुत देर तक देखा।
"कुछ ले जा रहे थे या कुछ ले आ रहे थे?" उन्होंने पूछा।
नैना ठिठक गई।
"मतलब?"
"मतलब ये कि तेरे पापा की गाड़ी जब जली, वो खाली थी या भरी?" रुक्मा दीदी ने कहा। "अगर भरी थी तो माल कहाँ गया? अगर खाली थी तो वो उस रास्ते पर क्यों थे?"
नैना कुछ देर चुप रही। फिर उसने अपना सिर नीचे कर लिया।
"मुझे नहीं पता।" उसने कहा। "फाइल में यही लिखा होगा, और फाइल ग़ायब है।"
"तो फाइल ढूँढ।" रुक्मा दीदी ने कहा। "और जो फाइल में लिखा है, वो सच नहीं होता। फाइल में वो लिखा होता है जो लिखने वाले को ठीक लगता है। सच वहीं होता है जहाँ कोई गवाह बैठा हो।"
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