A Dark Secret – Chapter 76
हवा चली। नीम के पत्ते खड़खड़ाए और एक पत्ता उड़कर मेरे कंधे पर आ गिरा।
मैंने उसे उतारा और आसमान की तरफ़ देखा।
कल सुबह नौ बजे टोल पर सफ़ेद गाड़ियाँ आएँगी। काँच के दफ़्तर वाला आदमी आएगा। काग़ज़ पहले से छपे होंगे। और मोहर सिर्फ़ उस पर लगेगी, जो नाम जानता है।
मैंने अपनी घड़ी फिर देखी। पाँच मिनट आगे। हमेशा की तरह।
"चल।" मैंने कहा। "सो जाते हैं। कल एक नाम ढूँढना है, और एक नाम छिपाना है।"
॥
पौने पाँच बजे रुक्मा दीदी ने मेरे पैर पर हल्का हाथ मारा।
"उठ। टोल पर गाड़ियों की लाइन लग गई है। तेरे कान के लिए खाना ठंडा हो रहा है।"
मैं उठा। नीम के नीचे चटाई पर जुगनू करवट ले रहा था, टूटी पतंग उसकी छाती पर रखी थी। मैंने पतंग को उसकी बगल में सरका दिया और ढाबे के पीछे नल पर मुँह धोया। पानी ठंडा था, ऐसा ठंडा कि आँखें एक पल के लिए खुल गईं।
नैना पहले से जगी हुई थी। बेंच पर बैठी अपने चश्मे का काँच अपनी दुपट्टे के कोने से पोंछ रही थी। कैमरा उसकी गोद में था, और बैग के फटे हिस्से से चार्जर की तार तीन जगह से लिपटी हुई लटक रही थी।
"तुम सोई भी नहीं?" मैंने पूछा।
"सोई।" उसने कहा। "दो घंटे। अब आँख खुल गई तो दिमाग नहीं बंद हो रहा।"
रुक्मा दीदी ने दो कटोरे चाय के रखे और मेरे सामने एक छोटी सी थाली में दो रोटियाँ और बची हुई सब्ज़ी डाल दी।
"आज सुबह नौ बजे वो सफ़ेद गाड़ियाँ आएँगी।" उसने कहा, आँख मेरी तरफ़ थी पर हाथ चूल्हे पर। "मैं कह रही हूँ, अर्जुन। उस टोल के पास जाना, वहाँ खड़े होना, और उनकी गिनती करना — ये तीन अलग-अलग बातें हैं। तू गिनती करने वालों में से नहीं लगता। तू बीच में खड़ा हो जाने वालों में से लगता है।"
"दीदी।" मैंने कहा। "मैं सिर्फ़ गाड़ी देखने जा रहा हूँ।"
"गाड़ी देखने वाले के हाथ में रसीद होती है।" उसने कहा। "तेरे हाथ में क्या है?"
"कॉपी है।"
"कॉपी में क्या है?"
"अभी तक सिर्फ़ सवाल हैं।"
रुक्मा दीदी ने करछी चूल्हे पर रख दी और मेरी तरफ़ मुड़ी।
"सवाल जवाब से बड़े होते हैं, बेटा।" उसने कहा। "जवाब किसी एक आदमी को मारता है। सवाल पूरे शहर को जगा देता है। संभालकर रखना।"
मैंने जेब से पैसे निकाले। तीन सौ चालीस रुपये थे। मैंने चालीस रुक्मा दीदी की तरफ़ बढ़ाए।
"चाय और बेंच का।"
"तीस काफ़ी हैं।"
"चालीस रखो।" मैंने कहा। "दस अगले सवाल के एडवांस में।"
वो हँसी। बड़ी हँसी, जो ढाबे के शोर को दबा देती है। फिर उसने चालीस रुपये अपनी कमर पर बँधे गुच्छे के साथ रखे और कहा, "सवाल का एडवांस ढाबे में सबसे पहले मैंने दिया था। तू उसे लौटाने की फिर कभी मत कोशिश करना।"
साढ़े पाँच बजे हम निकले। जुगनू को छोड़कर, क्योंकि उसने कहा था सात बजे उठेगा और सात बजे उठेगा। बच्चे अपनी नींद के बारे में ईमानदार होते हैं, बड़े लोग नहीं।
सड़क पर सुबह की धूल अभी बैठी नहीं थी। कबाड़ बाज़ार की तरफ़ जाने वाली गली में एक भी ट्रक नहीं आया था, बस दो टेंपो और एक बैलगाड़ी थी, जिस पर लोहे के पुराने पाइप पड़े थे और बैल चलते-चलते सिर झटक रहा था। उसके गले की घंटी की आवाज़ में एक छोटी सी कमी थी। घंटी के अंदर का लोहे का टुकड़ा घिस गया था, इसलिए आवाज़ पूरी नहीं खुल रही थी। मैंने सोचा, किसी को बताऊँगा। फिर सोचा, बताने से क्या होगा, बैल तो फिर भी वही चलेगा।
गाड़ी महल पहुँचते-पहुँचते आसमान में सफ़ेद रोशनी फैलने लगी थी। यहाँ की हवा में हमेशा एक ही गंध होती है — जला हुआ रबर, पुराना तेल और गीली मिट्टी। कबाड़ के पहाड़ सुबह में और बड़े दिखते हैं, जैसे रात भर उन्होंने भी साँस ली हो।
पीतल बेचने वाला बूढ़ा अपनी सिगड़ी के पास बैठा था। सुबह की ठंड में भी उसके दो ही दाँत बाहर झाँक रहे थे और अंगुलियाँ आग पर फैली थीं।
"पत्ता लेने आए हो?" उसने मुझे देखकर कहा।
"हाँ।"
"आज कोई तुम्हारी पीली गाड़ी को तीन बार देखने नहीं आया।" उसने कहा और आग की तरफ़ देखने लगा। "कल तीन बार आया था। आज नहीं आया। इसका मतलब ये नहीं कि वो भूल गया। इसका मतलब ये है कि उसने जो देखना था, देख लिया।"
मेरे पीछे नैना रुक गई।
"कौन आया था?" उसने पूछा।
बूढ़े ने उसकी तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़, फिर अपनी सिगड़ी की तरफ़।
"जिसे पूछना होता है, वो पूछता है।" उसने कहा। "जिसे ढूँढना होता है, वो चुप बैठता है और देखता है।"
हम आगे बढ़े। कबीर की दुकान की टिन का शटर आधा खुला था। आधे हिस्से से अंदर पीली रोशनी आ रही थी। बाहर टायरों का ढेर था, जिसके बीच से हवा की एक पतली सी सीटी आ रही थी — कोई टायर किसी सुई पर टिका था, समय के साथ धीरे-धीरे हवा छोड़ रहा था।
मैंने झुककर अंदर झाँका। कबीर अपने छोटे से काउंटर पर बैठा था, नीली शर्ट, बाल कंघी किए हुए, सामने एक कटोरी में चाय और हाथ में कैलकुलेटर। दीवार पर वो पुरानी घड़ी टँगी थी, जो दस बजकर सत्ताईस मिनट पर रुकी हुई थी। मैंने पहली बार उस घड़ी को देखा था, तब मुझे लगा ये कबीर का राज़ है। अब लगता है ये पूरे शहर का राज़ है — हर चीज़ यहाँ सत्ताईस पर रुकी हुई है।
"अर्जुन।" कबीर ने सिर उठाकर कहा। "तू सुबह-सुबह? तेरी गाड़ी फिर खाँस रही है?"
"नहीं।"
"तो क्या? पंचर?"
"कुछ काग़ज़ दिखाने हैं।"
कबीर ने मेरे पीछे खड़ी नैना को देखा। उसका चेहरा एक पल के लिए बदला — जैसे किसी ने उसकी चाय में उँगली डाल दी हो।
"ये कौन है?"
"नैना।" मैंने कहा। "रिपोर्टर है।"
"रिपोर्टर।" कबीर ने कहा और हँसने लगा। "अर्जुन, मेरी दुकान म्यूज़ियम नहीं है। पुराने काग़ज़ों की गैलरी नहीं है। यहाँ दिन में सत्तर आदमी आते हैं, साठ टायर और पंद्रह पंचर ले जाते हैं, और पाँच पूछकर चले जाते हैं कि पुराना पाइप मिलेगा क्या। मेरे पास इन सबके लिए एक ही जवाब है — आँकड़े देखो, आँकड़े झूठ नहीं बोलते।"
"फिर आँकड़े देख लो।" मैंने कहा।
मैंने अपनी कॉपी के अंदर से काग़ज़ निकाले और काउंटर पर एक-एक करके रखने लगा।
रवि की खाली रसीद, जिस पर रकम की जगह सिर्फ़ एक लकीर थी।
उस रसीद का फटा हुआ कोना, जिस पर नीले गोल निशान का आधा हिस्सा बचा था।
किशन की दो महीने पुरानी पंप परची, जिस पर वही निशान मिटता हुआ पड़ा था।
मोहन जोशी की हादसा दावा रसीद, नौ साल पुरानी, पीली, किनारे से मुड़ी हुई।
मेरे पापा के नाम का टिकट।
पीला लिफ़ाफ़ा और उसमें से निकली टेढ़े अक्षरों वाली पर्ची, जिस पर लिखा था कि अगली बार पहिया नहीं, हाथ कटेगा।
और सबसे आख़िर में, आधा मिटा हुआ नाम वाली वो पुरानी पर्ची, जो मुझे पुल के नीचे राख वाली मिट्टी की कटोरी के नीचे से मिली थी।
कबीर का हँसना बंद हो गया।
वो काग़ज़ों पर झुका। उसने पहले रवि की रसीद उठाई, उसे रोशनी की तरफ़ की, फिर उलटा किया, फिर सीधा किया। फिर उसने वो फटा कोना उठाया और उसे रसीद के कोने पर रख दिया। दोनों एक-दूसरे में ऐसे बैठे जैसे कभी अलग थे ही नहीं।
कबीर ने एक लंबी साँस ली।
फिर उसने जेब से कैलकुलेटर निकाला। वो पहले से मेज़ पर था, पर उसने फिर निकाला, जैसे अपने हाथों को कुछ करने में लगाना चाहता हो। उसने उँगलियाँ तेज़ चलाईं। मशीन में टन-टन की आवाज़ आई।
"ये देख।" उसने कहा। "यहाँ पर सत्ताईस सितंबर। यहाँ भी सत्ताईस सितंबर। इस पंप परची पर तारीख़ नहीं है, पर गाड़ी का नंबर वही है जो उस सफ़ेद गाड़ी का है जिसका तू ज़िक्र कर रहा था। और ये टिकट — इसमें साल ही नहीं लिखा। जैसे तारीख़ हर साल आती रहती है।"
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