A Dark Secret – Chapter 70
नैना ने मेरी तरफ़ देखा।
"तुमने ये नाम कहाँ सुना?"
मैं कुछ नहीं बोला।
"अर्जुन।" उसने कहा। "तुमने अभी कुछ कहा। मिटाया हुआ नाम। तुमने ये कहाँ सुना?"
मैंने अपने घुटने पर हाथ रखा। मेरे हाथ में लकड़ी का बुरादा था और मैंने उसे झाड़ दिया।
"मैं कुछ नहीं कहूँगा।" मैंने कहा।
"क्यों नहीं?"
"क्योंकि तुम्हारे पास काग़ज़ हैं और मेरे पास सिर्फ़ आवाज़ें हैं।" मैंने कहा। "अगर मैं तुम्हें आवाज़ दे दूँ और तुम उसे काग़ज़ बना दो, तो वो आदमी उस काग़ज़ को पढ़ेगा और फिर वही होगा जो ग्यारह साल में होता आया है।"
"क्या होता आया है?"
"आदमी मरता है।" मैंने कहा। "और सिर्फ़ तारीख़ बचती है।"
नैना ने अपना कैमरा गोद में रखा।
वो कुछ देर चुप बैठी। फिर उसने अपनी जेब से एक और काग़ज़ निकाला। यह भी पुराना था, पर यह फोटो नहीं थी — यह एक रसीद थी। छोटी, पीली, मुड़ी हुई।
"ये क्या है?" मैंने पूछा।
"ये मेरे पास है।" उसने कहा। "मैं इसे तुम्हें अभी नहीं दूँगी। पर मैं तुम्हें इसका एक हिस्सा बताती हूँ।"
"क्या?"
"ये बाईस नंबर टोल की रसीद है।" उसने कहा। "सत्ताईस सितंबर की। पर साल नहीं लिखा। बस तारीख़ है।"
"साल क्यों नहीं?"
"क्योंकि जिसने इसे छापा था, उसे साल लिखने की ज़रूरत नहीं थी।" उसने कहा। "उसके लिए सत्ताईस सितंबर किसी साल की तारीख़ नहीं थी। उसके लिए वो एक दिन था। एक ऐसा दिन जो हर साल आता था।"
मेरे कान में एक आवाज़ आई। दूर, टोल की तरफ़ से — एक गाड़ी।
मैंने सिर घुमाया। कोई नहीं था।
"अर्जुन।" नैना ने कहा। "मैं तुमसे एक आख़िरी बात कहूँगी, और फिर तुम जो चाहो सोचना।"
"कहो।"
"मैं यहाँ इसलिए नहीं आई कि मुझे ख़बर चाहिए।" उसने कहा। "मैं यहाँ इसलिए आई हूँ कि मैं उस आदमी को ढूँढ रही हूँ जिसने मेरे पापा की गाड़ी की तारीख़ बदल दी थी।"
ढाबे के अंदर चूल्हे पर कोई बर्तन गिरा। रुक्मा दीदी ने उसे उठाया, पर वो बाहर नहीं आईं।
"तुम्हारे पापा?" मैंने कहा।
"वो भी ट्रांसपोर्ट के धंधे में थे।" उसने कहा। "छोटा धंधा। दो गाड़ियाँ। और एक दिन एक गाड़ी रास्ते में जल गई। आग लगी थी, अर्जुन। ड्राइवर बच गया, पर पापा उसी गाड़ी में थे।"
"और उसका हादसा किस तारीख़ का लिखा गया?"
वो एक पल मेरी तरफ़ देखती रही।
"तुम पहले सवाल पर आ गए।" उसने कहा।
"किस तारीख़ का?"
"सत्ताईस।" उसने कहा। "हर साल सत्ताईस को किसी न किसी की गाड़ी जलती है, पलटती है, या कटती है। और हर बार वही तारीख़। और हर बार वही दफ़्तर। और हर बार वही मोहर।"
मैंने अपना हाथ बेंच पर रखा। मुझे लगा ज़मीन हिल रही है, पर वो नहीं हिल रही थी। मेरे अंदर कुछ हिल रहा था।
"तुम मुझसे क्या चाहती हो?" मैंने पूछा।
"मैं चाहती हूँ कि तुम मुझे वो सब सुनाओ जो तुमने सुना है।" उसने कहा। "चार लोग सुनते हैं। दो बोलते हैं। एक गाड़ी बोलती है। और एक तुम हो जो गाड़ी को समझता है।"
"और तुम मुझे क्या दोगी?"
"काग़ज़।" उसने कहा। "मेरे पास तेरह काग़ज़ हैं। तुम्हारे पास कुछ भी नहीं के बराबर है। मिलाकर चौदह हो जाएँगे।"
मैं मुस्कुराया। पहली बार उस सुबह।
"चौदह से क्या होगा?"
"चौदह से यह होगा कि अगली बार जब कोई गाड़ी पलटेगी, तो उसकी रिपोर्ट में पहले से छपी तारीख़ नहीं जाएगी।" उसने कहा। "वो हाथ से लिखी जाएगी। और उसके नीचे एक नाम होगा — उस आदमी का जिसने लिखी।"
मैंने चाय का अपना कटोरा उठाया। वो ठंडी हो चुकी थी। मैंने फिर भी पूरी पी ली।
फिर मैंने कटोरा नीचे रखा और उसकी तरफ़ देखा।
"नैना।" मैंने कहा। "एक बात पहले साफ़ कर लें।"
"कर लो।"
"मैं तुम्हारी ख़बर नहीं बनूँगा।" मैंने कहा। "मैं तुम्हारा गवाह नहीं बनूँगा। और मैं तुम्हें अपना काम नहीं दूँगा। पर अगर तुम मेरे साथ चलोगी, तो मैं तुम्हें वो सब दिखाऊँगा जो मैंने देखा है। और तुम्हें सच बोलूँगा — भले वो तुम्हारे काम के लिए अच्छा न हो।"
तभी ढाबे के बाहर किसी ने चप्पल की आवाज़ की। मैंने सिर उठाया।
जुगनू आ रहा था — नंगे पाँव, घुटने पर पुराना निशान, हाथ में एक टूटी हुई पतंग।
वो रुका। नैना को देखा। फिर मुझे देखा। फिर नैना को दोबारा देखा।
"ये कौन है?" उसने पूछा।
"रिपोर्टर।" मैंने कहा।
जुगनू ने अपनी पतंग को सीने से लगाया।
"रिपोर्टर?" उसने कहा। "रिपोर्टर क्या करता है?"
"लिखता है।"
"क्या लिखता है?"
"जो हम बोलते हैं।"
जुगनू ने सोचा। फिर उसने कहा, "तो मैं कुछ नहीं बोलूँगा।"
नैना हँसी। सच में हँसी। और उसकी हँसी ढाबे में गूँजी, और रुक्मा दीदी दरवाज़े पर आईं और बोलीं, "ये ठीक कह रहा है। बोलते ही आदमी मुसीबत में पड़ता है।"
पर मैं जानता था कि जुगनू कुछ बोलेगा। वो बच्चा बोलने के लिए बना है। बस उसे सही आदमी चाहिए।
मैंने अपना हाथ उसके सिर पर रखा।
"अंदर जा।" मैंने कहा। "दीदी से कह, तेरे लिए एक रोटी रख दे।"
वो गया। जाते-जाते एक बार पीछे मुड़कर नैना के कैमरे को देखा, फिर भाग गया।
मैंने नैना की तरफ़ देखा।
"तो?" मैंने कहा। "हम कहाँ से शुरू करते हैं?"
नैना ने अपना चश्मा ऊपर धकेला। फिर उसने अपनी जेब में हाथ डाला।
"मैं एक चीज़ दिखाने आई हूँ।" उसने कहा। "पर इससे पहले कि मैं दिखाऊँ, मैं तुमसे एक वादा चाहती हूँ।"
"क्या वादा?"
"जो मैं तुम्हें दिखाने वाली हूँ, उसे देखकर तुम भागोगे नहीं।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। मेरी कलाई पर पापा की घड़ी थी, जो हमेशा पाँच मिनट आगे चलती थी। मैंने उसकी तरफ़ देखा — आठ बजकर चालीस मिनट।
"मैं भागता नहीं।" मैंने कहा। "मैं ट्रक के नीचे जाता हूँ देखने के लिए।"
नैना ने अपनी जेब से वो काग़ज़ निकाला।
पर यह फोटो नहीं थी।
यह एक पुराना टिकट था। फटा हुआ, पीला। उस पर एक नाम छपा था, और उस नाम के नीचे एक तारीख़।
मैंने उसे देखा। मैंने उसे गौर से देखा। मेरे हाथ ठंडे हो गए।
"ये…" मैंने कहा।
"हाँ।" नैना ने कहा।
"ये टिकट मेरे पापा के नाम का है।"
"हाँ।"
"कहाँ से आया?"
नैना ने टिकट को मेरे हाथ में रख दिया। मैंने उसे पलटा। पीछे कुछ लिखा था — जाना-पहचाना हाथ, कोई पुरानी स्याही।
और मैंने जब वो लिखा पढ़ा, तो मेरे घुटने एक बार फिर हल्के हो गए। मैंने मेज़ का किनारा पकड़ा।
नैना ने मेरी तरफ़ देखा। और इस बार उसकी आवाज़ में वो पुराना तेवर नहीं था — उसने धीरे से, बहुत धीरे से कहा:
"मैं तुम्हारे पापा रघुवीर को ढूँढते हुए यहाँ आई हूँ।"
॥
मैंने टिकट को उलटा किया।
पीछे की स्याही हल्की हरी थी, जैसे बहुत पुरानी स्याही धूप में पककर हरी पड़ गई हो। अक्षर टेढ़े थे। बाएँ हाथ से लिखे गए थे, क्योंकि पापा दाएँ हाथ से गाड़ी चलाते थे और बाएँ से लिखते थे। उनकी "र" हमेशा थोड़ी ऊपर उठती थी, जैसे कोई रस्सी पकड़कर खींच रहा हो।
लिखा था — अर्जुन को देना, जब ये आवाज़ पहचानने लगे।
मेरे हाथ से हथौड़ा फिसल गया। कील टेढ़ी होकर बेंच में धँसी। मैंने उसे दोबारा मारा। फिर तीसरी बार।
ठक। ठक। ठक।
मैं उस वक़्त कुछ नहीं बोला। जब कोई चीज़ सीने में चुभती है, तो पहला काम यही होता है — हाथ को काम दे देना। मैंने चौथी कील उठाई। पाँचवीं। बेंच का पाया हिल रहा था, मैंने उसे घुटने से दबाया और कील ठोंक दी। लकड़ी चरमराई। मेरी हथेली में चूरा चुभा।
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