A Dark Secret – Chapter 71
नैना मेरे सामने बैठी रही। उसने कुछ नहीं पूछा। बस देखती रही।
ढाबे के दरवाज़े पर रुक्मा दीदी खड़ी थीं, हाथ में सूप। पीछे बेंच के नीचे से जुगनू का आधा सिर दिख रहा था, जैसे कोई चूहा छिपकर देख रहा हो।
मैंने छठी कील ठोंकी। फिर हथौड़ा नीचे रख दिया।
"तुमने पढ़ लिया?" नैना ने पूछा।
"ये तुम्हें कहाँ से मिला?"
"पहले मेरा सवाल।"
"मेरे पापा की लिखाई है।" मैंने कहा। मेरी आवाज़ सुनकर मुझे खुद ही अजीब लगी। बहुत धीमी थी। "ये मेरे लिए लिखा है।"
नैना ने सिर हिलाया। "तो जवाब भी तुम्हारे पास है।"
मैंने टिकट को मेज़ पर रख दिया। फिर उसे उठाया। फिर दोबारा रखा। मेरे हाथ काँप रहे थे और मुझे ये पसंद नहीं आया। मैंने हाथ मेज़ के नीचे कर लिए।
"तुमने ये कहाँ से लिया?" मैंने दोबारा पूछा। इस बार आवाज़ थोड़ी ऊपर थी।
"मेरे पापा के पुराने बक्से से।" नैना ने कहा। "जूट की रस्सी से बँधा हुआ एक बंडल था। उसमें काग़ज़ थे। रसीदें, पर्चियाँ, कुछ फोटो। और ये टिकट।"
"तुम्हारे पापा कौन थे?"
"मोहन जोशी।" उसने कहा। "छोटा ट्रांसपोर्ट चलाते थे। दो गाड़ियाँ थीं। एक ट्रक, एक टेंपो।"
मैंने उसकी आवाज़ सुनी। जब वो "मोहन जोशी" बोली, तो आवाज़ साफ़ थी। कोई कंपन नहीं। जब वो "दो गाड़ियाँ" बोली, तब भी साफ़। पर जब उसने अगली बात कही, तो आवाज़ के आख़िर में एक हल्की सी काँपी हुई लकीर आई।
"उनकी मौत की फाइल ग़ायब हो गई।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"ग़ायब हो गई या ग़ायब कर दी गई?"
वो एक पल रुकी। उसने अपना चश्मा ऊपर धकेला। "मुझे नहीं पता।" उसने कहा।
इस बार कंपन साफ़ था।
मैंने कुर्सी पीछे खिसकाई और उसके सामने सीधा बैठ गया।
"तुम झूठ बोल रही हो।"
नैना की भौंहें ऊपर उठीं। "क्या?"
"तुम झूठ बोल रही हो।" मैंने दोबारा कहा। "पूरा झूठ नहीं। आधा। तुम्हें पता है कि फाइल ग़ायब कैसे हुई, पर तुम बोल रही हो कि नहीं पता।"
नैना मेरी तरफ़ देखती रही। उसने कुछ नहीं कहा।
"देखो।" मैंने कहा। "मैं यहाँ नया हूँ, पर बेवकूफ़ नहीं हूँ। मेरे पास आकर बहुत लोग कहानी रख चुके हैं। कोई मुझे बेटा कहकर गया। कोई पचास हज़ार की गड्डी रखकर गया। कोई डराने आया, कोई चेताने आया। हर आदमी के हाथ में कोई कहानी है। और हर कहानी के आगे कोई मतलब है।"
"तुम्हें लगता है मेरा कोई मतलब है?"
"तुम रिपोर्टर हो।" मैंने कहा। "तुम्हारा मतलब ख़बर है। मैं तुम्हारी ख़बर नहीं बनूँगा।"
"मैंने ख़बर नहीं माँगी।"
"तुमने कैमरा निकाला है।"
नैना ने अपने बैग की तरफ़ देखा। कैमरा उसकी गोद में था, पर बंद था।
"मैंने अभी नहीं चलाया।"
"पर चलाओगी।"
वो चुप रही।
मैंने टिकट उठाया और उसे अपनी जेब में रख लिया। फिर मैंने कहा, "मेरे पापा का टिकट तुम्हारे पापा के बक्से में कैसे आया?"
"मुझे नहीं पता।"
"और ये कि उन्होंने मेरे लिए लिखा — जब ये आवाज़ पहचानने लगे — तुम्हारे पापा के बक्से में कैसे पहुँचा?"
"मुझे नहीं पता।" उसने फिर कहा। इस बार उसकी आवाज़ धीमी थी और सच्ची थी। "मैं तब छोटी थी। मैंने ये बंडल पिछले महीने खोला। मैं उसमें से एक-एक काग़ज़ निकालकर पढ़ रही हूँ। जब मुझे ये टिकट मिला, तो मैं डर गई।"
"क्यों?"
"क्योंकि टिकट पर तारीख़ सत्ताईस सितंबर की है।" उसने कहा। "और मेरे पापा भी सत्ताईस सितंबर को मरे थे।"
ढाबे में एक पल के लिए चूल्हे की आवाज़ भी रुक गई लगी। रुक्मा दीदी दरवाज़े से अंदर आईं और उन्होंने अपना सूप बेंच पर रख दिया।
"क्या बोली?" रुक्मा दीदी ने पूछा।
"सत्ताईस सितंबर।" नैना ने कहा।
रुक्मा दीदी ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनके होंठ सिकुड़ गए, जैसे किसी ने उनके सामने बासी खाना रख दिया हो।
"तुम्हारे पापा का नाम क्या था?" रुक्मा दीदी ने पूछा।
"मोहन जोशी।"
रुक्मा दीदी ने आँखें बंद कीं। "मोहन भाई।" उन्होंने धीरे से कहा। "हाँ। वो भी आते थे। छोटी गाड़ी लेकर। चाय पीते थे और बिना बोले चले जाते थे।"
मैंने रुक्मा दीदी की तरफ़ देखा। "तुमने मुझे कभी नहीं बताया।"
"मैं क्या बताती?" उन्होंने कहा। "इस ढाबे पर सत्ताईस को मरे हुए लोगों की गिनती करूँ? मेरा आदमी, तेरा आदमी, उसका आदमी, टीटू का बाप…" उन्होंने बेंच पर हाथ मारा। "सब एक ही तारीख़। तू बता, मैं किस-किसका नाम लूँ?"
नैना ने अपना चश्मा उतार लिया। मैंने पहली बार उसका चेहरा बिना चश्मे के देखा। आँखों के नीचे काली लकीरें थीं। बहुत दिनों की नींद कम थी।
"मैं तीन महीने से इस शहर में हूँ।" उसने कहा। "मेरे पास तेरह काग़ज़ हैं। कोई गवाह नहीं। कोई नाम नहीं। हर काग़ज़ पर वही तारीख़ है। एक भी आदमी तैयार नहीं कि सामने आकर बोले।"
"तो तुम मेरे पास क्यों आई?"
"क्योंकि कल रात एक बूढ़े आदमी ने मुझसे कहा कि जो सुनता है, वो रातरानी ढाबे पर मिलेगा।"
मैं रुक गया।
"कैसा बूढ़ा?"
"लाठी वाला। सफ़ेद दाढ़ी। साँस में सीटी जैसी आवाज़।" उसने कहा। "उसने मुझसे कहा कि मैं तुम्हें कुछ नहीं बताऊँगा, पर तुम एक लड़के से मिलो। वो गाड़ियों की आवाज़ से झूठ पकड़ता है।"
मैंने अपना सिर झुका लिया।
बूढ़ा मुझे कल भी मिला था। उसने मुझे दो सूखी रोटियाँ दी थीं और तीसरी चीज़ का नाम लेने की हिम्मत नहीं की थी। और अब पता चल रहा था कि वो मेरे पीछे-पीछे नैना को भी भेज रहा था।
"तुम्हें कैसे पता कि मैं यहाँ हूँ?" मैंने पूछा।
"उसने बताया नहीं। मैं सुबह से ढाबे पर आई हूँ और तुम बेंच ठीक कर रहे थे।"
मैंने अपनी कलाई पर पापा की घड़ी देखी। आठ बजकर पैंतालीस मिनट। घड़ी पाँच मिनट आगे थी, तो असल में आठ बजकर चालीस।
"तुम चाहती क्या हो?" मैंने पूछा।
"मैं चाहती हूँ कि तुम मेरी आँखों में देखकर बताओ कि मैं झूठ बोल रही हूँ या नहीं।" उसने कहा। "तुम्हारा हुनर सच है तो ये भी बता सकते हो।"
"तुम्हारी आवाज़ में काँपी थी।" मैंने कहा। "जब तुमने फाइल के बारे में कहा।"
"हाँ।" उसने कहा। "क्योंकि मुझे पता है कि फाइल कहाँ गई, और मुझे ये बताने से डर लगता है कि उसे किसने उठाया।"
मैं कुछ नहीं बोला।
नैना ने अपना बैग खींचा। उसने ज़िप खोली। अंदर से एक भारी काला कैमरा निकाला और उसे मेज़ पर रख दिया। फिर उसने उसकी ढक्कन वाली बैटरी खोली, कुछ तार खींचे और कैमरा मेरी तरफ़ घुमा दिया।
"मैं तुम्हारी बात मान लूँ?" मैंने कहा।
"नहीं।" उसने कहा। "तुम मेरी बात मत मानो। तुम अपने कान मानो।"
"क्या मतलब?"
नैना ने ढाबे के बाहर की तरफ़ सिर हिलाया। "बाहर आठ-नौ गाड़ियाँ खड़ी हैं। ड्राइवर चाय पी रहे हैं, ताश खेल रहे हैं, कोई सो रहा है। तुम बाहर जाओ। आँख बंद करो। और बताओ कि कौन सी गाड़ी खराब है।"
"मैं तमाशा नहीं हूँ।" मैंने कहा।
"मैंने तमाशा नहीं कहा।" उसने कहा। "मैंने सबूत कहा। अगर तुम्हारा हुनर सच है, तो ये पहला सबूत है। मैं इसे अपने कैमरे में रखूँगी और किसी को नहीं दिखाऊँगी। जिस दिन तुम कहो, उस दिन दिखाऊँगी।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"और अगर मैं ग़लत निकला?"
"तो मैं तुम्हारा नाम नहीं लिखूँगी।" उसने कहा। "बस तुम्हें एक झूठा आदमी समझकर अपनी ख़बर में आगे बढ़ जाऊँगी।"
रुक्मा दीदी ने बीच में हाथ डाला। "करके दिखा दे।" वो बोलीं। "क्या जाता है? चाय ठंडी नहीं हो रही।"
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