A Dark Secret – Chapter 69
"मैं तुम्हें एक फोटो दिखाने वाली हूँ। और मैं चाहती हूँ कि तुम उसे देखकर जो पहला शब्द बोलो, वो बोलो। सोचना मत।"
"क्यों?"
"क्योंकि लोग सोचकर जवाब देते हैं और सोचा हुआ जवाब कभी सच नहीं होता।"
मैंने अपने हाथ बेंच पर रखे। मेरे कान में ढाबे के अंदर से तवे की आवाज़ आ रही थी, बाहर से किसी गाड़ी की आवाज़, और बहुत दूर से टोल पर कोई हॉर्न बजा रहा था।
"दिखाओ।"
नैना ने काग़ज़ खोला।
वो फोटो थी। पुरानी, धुँधली, किनारों से मुड़ी हुई। किसी ने उसे किसी जेब में बहुत साल रखा था, इसलिए उस पर सफ़ेद लकीरें पड़ गई थीं।
उसमें दो आदमी खड़े थे।
एक ट्रक के आगे।
ट्रक पीला था। मैं उसे किसी भी हालत में पहचान लेता — वो पीला, जिसके बोनट पर कोई नाम लिखा था जो अब मिट चुका था, जिसके पहिये पर धूल की एक ही जगह सालों से बैठी थी।
और उसके आगे, बाईं तरफ़ खड़ा आदमी —
मैंने अपनी साँस रोकी। मेरे हाथ बेंच पर कस गए।
वो पतला था। कंधे चौड़े, बाल घुँघराले। उसने कोई पुरानी शर्ट पहनी थी जिसकी बाँहें मोड़ी हुई थीं, और उसके हाथ में एक कपड़ा था — तेल में डूबा हुआ रुमाल।
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। मेरी उँगलियों ने वही रुमाल छुआ।
वो आदमी मुस्कुरा रहा था। छोटी सी मुस्कान, एक तरफ़, जैसे किसी ने उसे फोटो खिंचवाने के लिए मजबूर किया हो और वो मान गया हो।
"ये…" मेरी आवाज़ फटी। मैंने गला साफ़ किया। "ये मेरे पापा हैं।"
नैना ने कुछ नहीं कहा।
"ये कहाँ की फोटो है?" मैंने पूछा।
"ये तुम्हारे पापा हैं?" उसने पूछा।
"हाँ। ये मेरे पापा हैं। मैं इन्हें पहचानता हूँ।"
"कहाँ से?"
"कहाँ से?" मैंने उसकी तरफ़ देखा। "वो मेरे पापा हैं।"
"मुझे पता है।" उसने कहा। "पर मैं पूछ रही हूँ कि तुमने उन्हें आख़िरी बार कब देखा?"
मेरा माथा ठंडा हो गया। मुझे वो सवाल अजीब लगा। कोई भी आदमी किसी से नहीं पूछता कि तुमने अपने पापा को आख़िरी बार कब देखा, अगर वो पहले से न जानता हो कि जवाब क्या होगा।
"सत्ताईस सितंबर की सुबह।" मैंने कहा। "वो घर से निकले थे। मैं सोलह साल का था। मैं स्कूल जा रहा था। उन्होंने मुझे रास्ते में छोड़ा। मैंने उन्हें सिर्फ़ पीछे से देखा — गाड़ी का पीछा। वो जैसे-जैसे दूर गए, आवाज़ धीमी होती गई।"
"और उसके बाद?"
"उसके बाद वो नहीं लौटे।"
नैना ने फोटो को उलट दिया।
उसकी पीठ पर कुछ लिखा था। पेंसिल से, बहुत हल्के हाथ से। मैंने झुककर देखा।
वहाँ लिखा था — "सत्ताईस सितंबर, सुबह।"
और नीचे, एक और लकीर थी, जिसे कोई बाद में मिटाने की कोशिश कर चुका था। मिटाने के बावजूद जो बचा था, वो एक नाम जैसा लगता था।
"ये नाम किसका है?" मैंने पूछा।
"मुझे पता होता तो मैं यहाँ नहीं होती।"
मैंने फोटो को हाथ में लिया। मेरी उँगली उस मिटे नाम पर चली गई।
"ये फोटो तुम्हें कहाँ से मिली?"
नैना ने अपना बैग बंद किया। उसकी ज़िप भी खराब थी, वो उसे दो बार खींचकर लगाया।
"मुझे एक ढाबे की कॉपी में मिली।" उसने कहा। "एक बहुत पुरानी कॉपी, जिसमें शहर के आधे लोगों का उधार लिखा है। और उस कॉपी के बीच में ये फोटो दबी हुई थी।"
मेरे पीछे, ढाबे के अंदर, चूल्हे की आवाज़ रुक गई।
मैंने मुड़कर देखा। रुक्मा दीदी दरवाज़े पर खड़ी थीं। उनके हाथ में आटे वाली लोई थी, और वो हिल रही थी।
"मेरी कॉपी में?" उन्होंने कहा। "मेरी कॉपी में क्या?"
नैना उनकी तरफ़ मुड़ी।
"दीदी, ये फोटो —"
"मेरी कॉपी में कोई फोटो नहीं थी।" रुक्मा दीदी ने कहा। उनकी आवाज़ बदल गई थी — नीची, सपाट। "मेरी कॉपी में सिर्फ़ हिसाब था।"
वो दो कदम आगे आईं, फिर रुक गईं। उन्होंने फोटो देखी। और मैंने देखा कि उनका चेहरा कैसे बदला — जैसे किसी ने कमरे में अचानक बत्ती बुझा दी हो।
"ये…" उन्होंने धीरे से कहा। "ये तो रघुवीर है।"
"हाँ।" मैंने कहा।
"ये सुबह की फोटो है।" रुक्मा दीदी ने कहा। "ये सुबह की है। उसी सुबह की।"
कमरे में कुछ देर कोई नहीं बोला।
फिर नैना ने अपना चश्मा उतारा और उसे अपनी शर्ट से पोंछा, और यह बार उसे पहनने में उसे थोड़ी देर लगी।
मैंने रुक्मा दीदी को बेंच पर बैठाया। उन्होंने मना किया, फिर बैठ गईं।
"दीदी," मैंने कहा, "तुमने ये फोटो कभी देखी है?"
"नहीं।" उन्होंने कहा। "मतलब… मुझे याद नहीं।"
"गौर से देखो।"
उन्होंने देखा।
फिर उनका हाथ उस दूसरे आदमी पर गया — जो फोटो के दाईं तरफ़ खड़ा था, जो कुछ छिपा हुआ लग रहा था, जिसका चेहरा फोटो के किनारे की परछाई में आधा ग़ायब था।
"ये…" रुक्मा दीदी की आवाज़ फिसल गई। "ये मैं नहीं जानती। ये मैंने नहीं देखा।"
"पर तुम्हारी कॉपी में थी।"
"मेरी कॉपी में कोई फोटो नहीं थी, अर्जुन।" उन्होंने कहा, और इस बार उनकी आवाज़ में वो डर था जो पहले सिर्फ़ चुप्पी में था। "मेरी कॉपी में सिर्फ़ पन्ने थे। और वो कॉपी मैंने ग्यारह साल पहले किसी को दी थी और वो कभी लौटी नहीं।"
मैंने अपनी साँस धीमी की।
"किसे दी थी?"
उन्होंने नैना की तरफ़ देखा। फिर मेरी तरफ़।
"अर्जुन, तू बाहर जा।"
"दीदी —"
"बाहर जा।" उन्होंने कहा। "मुझे इससे दो मिनट अकेले बात करनी है।"
मैं उठा। मैं तीन कदम दूर गया। मैंने दरवाज़े का चौखट पकड़ा। और मैंने उनकी आवाज़ें सुनीं, बहुत धीमी, बहुत दबी हुई — इतनी धीमी कि मुझे साफ़ लफ़्ज़ नहीं मिले, पर सुर मिले। रुक्मा दीदी का सुर ऊँचा था, सख़्त था। और नैना का सुर नीचा।
पाँच मिनट बाद नैना बाहर आई।
उसका चेहरा वैसा ही था, पर उसके हाथ में वो काग़ज़ नहीं था।
"कहाँ है फोटो?" मैंने पूछा।
"दीदी के पास है।"
"क्यों?"
"क्योंकि वो उनकी कॉपी से आई है।" नैना ने कहा। "और मैं किसी की चीज़ चुराकर काम नहीं करती।"
मैं एक पल उसे देखता रहा।
"तुमने मुझे पहले क्यों नहीं बताया कि फोटो ढाबे से आई है?"
"क्योंकि मैं तुम्हें देखना चाहती थी।" उसने कहा। "तुम्हारा चेहरा। तुम्हारी आवाज़। मैं ये देखना चाहती थी कि तुम अपने पापा को देखकर क्या करते हो।"
"क्यों?"
"क्योंकि मैंने तीन महीने में ग्यारह लोगों को ये फोटो दिखाई।" उसने कहा। "नौ ने कहा कि वो उन्हें नहीं जानते। एक ने कहा कि फोटो में पहाड़ है। एक ने देखा और उल्टी करने चला गया।"
मैं चुप रहा।
"और तुमने पहले शब्द में कह दिया — ये मेरे पापा हैं।" उसने कहा। "तुम्हारी आवाज़ नहीं काँपी, अर्जुन। तुम्हारा हाथ काँपा। ये फ़र्क़ बहुत बड़ा होता है।"
मैंने दरवाज़े का चौखट छोड़ा।
"नैना, एक बात पूछूँ?"
"पूछो।"
"तुमने कहा कि तुम इस शहर में एक ख़बर के पीछे आई हो।" मैंने कहा। "कौन सी ख़बर?"
वो बेंच पर बैठी। बैग अपनी गोद में रखा। उसने अपने कैमरे का ढक्कन उतारा, फिर लगाया, फिर उतारा — जैसे हाथ को कुछ करना हो और दिमाग़ को सोचना।
"मैं एक ख़बर के पीछे नहीं आई।" उसने कहा। "मैं एक आदमी के पीछे आई हूँ।"
"कौन सा आदमी?"
"जिसका नाम मैं तीन साल से हर काग़ज़ पर देख रही हूँ और जिसका चेहरा मैंने कभी नहीं देखा।"
"अब तक क्यों नहीं दिखा?"
"क्योंकि वो मिलता ही नहीं।" उसने कहा। "वो काग़ज़ों में रहता है। काग़ज़ात में। मोहरों में। तारीख़ों में। और जब वो किसी से मिलता है, तो वो मिलने के बाद अपना नाम मिटा देता है।"
मेरा पेट ठंडा हुआ।
"मिटाया हुआ नाम।" मैंने धीरे से कहा।
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