A Dark Secret – Chapter 68
उसने कान लगाया। "नहीं।"
"हाँ है।" मैंने पहली कील उसकी तरफ़ बढ़ाई। "ये पुरानी है, इसका सिरा घिसा है, इसलिए इसकी आवाज़ भारी है — टन।" फिर दूसरी। "ये नई है, इसका सिरा साफ़ है, इसकी आवाज़ पतली है — टिन।"
वो दोनों कोल्हू की तरह घूरती रही।
"तुम पागल हो।"
"हो सकता है।" मैंने कहा। "पर मोती की केबल की आवाज़ ऐसी ही थी। केबल कटी हुई जगह से हवा खींचती है। दबाव पड़ता है तो धातु रगड़ती है और हवा रिसती है। दो आवाज़ें एक साथ। कभी-कभी तीन। लोग सुनते हैं एक — शोर। मैं सुनता हूँ तीन।"
नैना ने अपना कटोरा उठाया और पूरा पी लिया।
"तीन?" उसने कहा।
"तीन।" मैंने कहा। "धातु की घिसाई, हवा का रिसाव, और आवाज़ का वो हिस्सा जो बाक़ी सबको सिर्फ़ शोर लगता है।"
"और तुमने ये कहाँ से सीखा?"
मैं एक पल रुका।
"अपने पापा से।" मैंने कहा।
और मैंने देखा कि उसकी उँगली, जो कटोरे के किनारे पर थी, एक पल के लिए रुक गई।
बहुत छोटा पल। इतना छोटा कि अगर मैं कान वाला आदमी न होता, तो शायद मैं भी न पकड़ता।
"अच्छा।" उसने कहा। बस इतना। "अच्छा।"
और फिर उसने अपना चश्मा ऊपर धकेला और वो बात कही जो वो कहने आई थी।
"अर्जुन, मैं तुम्हें साफ़ बता देती हूँ। अगर तुम मुझसे झूठ बोलोगे, तो मैं तुम्हें छाप दूँगी।"
मैंने सिर उठाया।
"क्या छापोगी?"
"यही कि एक ट्रक मैकेनिक, जो कहता है कि वो गाड़ियों की आवाज़ से राज़ पकड़ता है, असल में उस हादसे के गवाहों को डरा रहा है।"
मैं हँस पड़ा। सच में हँसा।
"इतनी मेहनत कर लोगी?"
"मैं तीन महीने से हर रोज़ ये मेहनत कर रही हूँ।" उसने कहा। उसकी आवाज़ में अब कोई नाटक नहीं था। "मेरे पास इस शहर से तेरह काग़ज़ हैं, चार नाम हैं और एक भी गवाह नहीं। तेरह काग़ज़, अर्जुन। तेरह। और एक भी आदमी ऐसा नहीं जो कहे — हाँ, मैंने देखा। तो अगर तुम झूठ बोल रहे हो, तो तुम मेरी चौदहवीं काग़ज़ बन जाओगे।"
ढाबे के अंदर से रुक्मा दीदी की आवाज़ आई।
"पहले चाय पी ले बिटिया, फिर छापियो।"
नैना ने अंदर देखा। रुक्मा दीदी चूल्हे के पास खड़ी थीं, मोटी भुजाओं पर आटा लगा हुआ, और चेहरे पर वो हँसी जो पूरे ढाबे का शोर दबा देती है।
"दीदी, मैं चाय पी चुकी।"
"तो एक और।" रुक्मा दीदी ने कहा। "और मेरी बात सुन — इस लड़के को तू डराने की कोशिश मत करना। ये वैसा नहीं है। इसके पापा भी ऐसे ही थे। जो बात सुन लेते थे, वो भूलते नहीं थे। और जो भूलते नहीं थे, वो ज़्यादा दिन नहीं चलते थे।"
नैना एक पल के लिए चुप हुई।
मैंने वो चुप्पी सुनी। उसमें एक हल्की कंपन थी — बहुत हल्की, बहुत नीचे, जैसे बंद कमरे में किसी ने खिड़की खोली हो।
मैंने सोचा — ये डर है। या ये कुछ और है।
और मैंने खुद से कहा — अर्जुन, तू हर काँपने वाली आवाज़ को झूठ मत समझ। कभी-कभी अच्छे लोग भी डर से काँपते हैं।
मैंने अपनी बेंच की ओर ध्यान लौटाया। रेती उठाई। लकड़ी पर रगड़ी। चूरा उड़ा।
पर नैना उठी नहीं। वो वहीं बैठी रही, कैमरा गोद में, और मुझे देखती रही जैसे कोई तराज़ू वाला चीज़ तौल रहा हो।
"तुमने अपने पापा की बात की।" उसने धीरे से कहा।
"हाँ।"
"कब?"
"अभी।" मैंने कहा। "दो मिनट पहले।"
"नहीं, मेरा मतलब है — वो गए कब?"
मैंने रेती रोक दी।
ढाबे के बाहर एक ट्रक गुज़रा। उसका हॉर्न लंबा था, दो बार। फिर एक बस। फिर कोई साइकिल की घंटी।
"ग्यारह साल पहले।" मैंने कहा। "सत्ताईस सितंबर को।"
नैना ने अपना कैमरा गोद से उठाया। उसे दोनों हाथों से पकड़ा। और फिर उसने उसे वापस गोद में रख दिया, जैसे उसने कुछ सोचा हो और फिर उस सोच को वापस जेब में डाल दिया हो।
"मोती किसकी गाड़ी है?" उसने पूछा।
"बलदेव सिंह की। बल्लू।"
"वो कहाँ है?"
"तुम उससे बात नहीं करोगी।"
"क्यों?"
"क्योंकि वो डरा हुआ है।" मैंने कहा। "और डरे हुए आदमी से अगर कोई कैमरा लेकर सवाल पूछे, तो वो आदमी और डर जाता है। फिर वो कुछ नहीं बोलता। फिर वो हमेशा के लिए चुप हो जाता है।"
नैना ने मेरी तरफ़ देखा। इस बार उसकी आँखों में वो पहला तेवर नहीं था।
"तुमने उसकी रक्षा की।"
"मैंने किसी की रक्षा नहीं की।" मैंने कहा। "मैंने बस ये कहा कि जो डरा हुआ है, उसे और मत डराओ।"
वो मुस्कुराई। पहली बार। छोटी सी, एक तरफ़ की मुस्कान, जैसे किसी पुरानी लत को याद कर रही हो।
"तुम अजीब हो।" उसने कहा।
"मुझे पता है।"
"तुम्हारे चाचा कहाँ हैं?"
मैंने रेती फिर रोक दी। दूसरी बार।
"क्यों?"
"क्योंकि मैंने उनका नाम सुना है।" उसने कहा। "और इस शहर में जिसका नाम सुना जाता है, वो आमतौर पर किसी काग़ज़ पर लिखा होता है।"
मैंने रेती रख दी। मैं उठा। मैंने अपनी कमर सीधी की, जो घुटनों के बल बैठे-बैठे अकड़ गई थी।
"नैना।" मैंने कहा। "तुम आज सुबह यहाँ क्यों आई हो? सच बोलो। क्योंकि रिपोर्टर सुबह आठ बजे किसी ढाबे पर नहीं आता। रिपोर्टर दस बजे आता है, जब भीड़ होती है, जब गवाह मिलते हैं।"
उसने चश्मा उतार लिया। उसे अपनी शर्ट से पोंछा। वापस पहना।
और जब उसने पहना, तब मुझे कुछ दिखा जो मैंने पहले नहीं देखा था — उसकी आँखों के नीचे वो हल्की सी लकीरें थीं जो रात भर न सोने से आती हैं। और उसकी उँगलियों पर स्याही के छोटे-छोटे दाग़ थे, जैसे किसी ने बहुत देर तक लिखा हो।
"ठीक है।" उसने कहा। "मैं सच बोलती हूँ। पर एक शर्त है।"
"क्या शर्त?"
"तुम भी सच बोलोगे।"
"मैं झूठ नहीं बोलता।" मैंने कहा। "मुझे आता ही नहीं।"
"हर आदमी को आता है, अर्जुन।" उसने कहा। "बस कुछ को कम आता है।"
मैं उसके सामने बेंच पर बैठ गया। मेरे हाथ में लकड़ी का बुरादा था, मैंने उसे झाड़ दिया।
"पूछो।" मैंने कहा।
उसने कटोरा रखा, कैमरा गोद से उठाया, और उसे अपने पास बेंच पर रख दिया। फिर उसने अपना बैग खोला — फटे कंधे वाला, उलझी तार वाला — और उसमें से एक पुराना काग़ज़ निकाला। मुड़ा हुआ था, चार जगह से। उसने उसे खोला और उसे अपनी जाँघ पर रख लिया, पर मुझे नहीं दिखाया।
"पहले एक सवाल।" उसने कहा। "तुम्हारे पापा का नाम रघुवीर यादव था?"
"हाँ।"
"और वो ट्रक चलाते थे?"
"हाँ। ठाकुर ट्रांसपोर्ट के लिए।"
उसने आँखें बंद कीं। एक, दो, तीन सेकंड। फिर खोलीं।
"तुम्हें क्या पता है उस रात क्या हुआ?"
"बहुत कम।" मैंने कहा। "और जो पता है, वो अभी बताने लायक नहीं है। मेरे पास सिर्फ़ टुकड़े हैं। काग़ज़ के टुकड़े, आवाज़ के टुकड़े, लोगों के डर के टुकड़े।"
"टुकड़े काफ़ी होते हैं।" उसने कहा। "अगर सही जगह पर रखे जाएँ।"
"मैं वही कर रहा हूँ।"
"अकेले?"
मैं कुछ नहीं बोला।
"अकेले टुकड़े जोड़ने वाले आदमी को कोई नहीं देखता, अर्जुन।" उसने कहा। "और जिसे कोई नहीं देखता, उसे कोई बचाता भी नहीं।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आवाज़ में वो कंपन नहीं थी। इस बार साफ़ थी।
"तुम्हें क्यों पड़ी है?" मैंने पूछा। "तुम रिपोर्टर हो। एक ख़बर लिखोगी, चली जाओगी। मैं यहीं रहूँगा।"
"क्योंकि।" उसने कहा।
"यह कोई जवाब नहीं है।"
"नहीं है।" उसने मान लिया। "पर अभी यही है।"
और फिर उसने वो किया जो मुझे उम्मीद नहीं थी।
उसने काग़ज़ को जाँघ से उठाया, उसे एक हाथ में पकड़ा, और उसकी तरफ़ देखने के बजाय मेरी तरफ़ देखकर कहा —
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