A Dark Secret – Chapter 67
रुक्मा दीदी के उन शब्दों के बाद ढाबे में काफ़ी देर तक कोई आवाज़ नहीं हुई।
सिर्फ़ तवे पर पड़ी आख़िरी रोटी की भाप उठ रही थी, और दूर टोल पर कोई गाड़ी अपना भारी शरीर घसीट रही थी। मैंने उनका हाथ अपने कंधे से धीरे से हटाया और उन्हें चारपाई पर बैठा दिया।
"दीदी, बैठ जाओ।"
"बैठूँ?" उन्होंने कहा। "मैं ग्यारह साल से बैठी हूँ अर्जुन। तेरे पापा के जाने के बाद से मैं हर रात यहीं बैठती हूँ और हर रात सोचती हूँ कि क्या मैंने उस रात कुछ ऐसा कहा था जिससे वो गए।"
"तुमने क्या कहा था?"
"मैंने कहा था — भैया, ये नया काम मत करो। रजिस्टर वापस कर दो।"
वो चुप हुई। मैंने उन्हें पानी दिया। उन्होंने गिलास नहीं लिया। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और उसे अपने घुटने पर रख दिया, जैसे कोई बीमार आदमी अपनी दवा किसी और के हाथ में थमा देता है।
"तू सुन।" उन्होंने कहा। "जो मैंने आज तक किसी को नहीं बताया।"
"कल बताओ।"
"कल?" उन्होंने हल्का मुँह बनाया। "कल सत्ताईस है।"
"आज भी सत्ताईस है, दीदी।"
वो रुकीं। उन्होंने मेरे चेहरे को देखा, फिर बाहर अंधेरे को, फिर अपनी कमर पर लटके चाबियों के गुच्छे को।
"हाँ।" उन्होंने कहा। "आज भी सत्ताईस है।"
और फिर उन्होंने मुझे बेंच पर लेटने भेज दिया, अपनी चारपाई पर लेट गईं, और ढाबे में सिर्फ़ पंखे की चरचराहट बची रह गई।
मैं लेटा था, पर नींद नहीं आई।
मेरी जेब में दो नट थे। एक वो जो लिफ़ाफ़े में आया था — चिकना, नया, बिना किसी नाम का। और दूसरा — मेरा अपना, जो मैंने रघुवीर के इंजन से निकाला था, जिसकी ऊपर की परत छिल चुकी थी, और जिसके अंदर फ़ौलाद पर कोई बहुत छोटे हाथों से एक नाम खोदा गया था।
रघुवीर।
मैंने बार-बार उसे उँगली में घुमाया। सत्ताईस सितंबर की रात, ढाबे के पीछे, बेंच पर लेटे हुए, मैंने एक बात सोची जो मुझे बहुत देर तक डसती रही — कोई आदमी अपनी गाड़ी के इंजन में अपना नाम नहीं खोदता। नाम वहाँ कोई खोदता है जो चाहता है कि अगर कभी गाड़ी बिके, कभी टूटे, कभी किसी और के हाथ लगे — तो नाम भी साथ जाए।
फिर ख़याल आया — या तो किसी ने उस नट को किसी और की गाड़ी से निकालकर मेरे इंजन में लगा दिया था।
मैंने आँखें बंद कर लीं। और सुबह हो गई।
सुबह सात बजे लकड़ी वाला आया। रुक्मा दीदी ने बेंच की ओर हाथ करके कहा, "इसको सब दिखा दो," और वो आदमी मेरे पास बैठकर बेंच के पुराने जोड़ खोलने लगा।
आठ बजे मैं घुटनों के बल ढाबे के आँगन में था। सात बेंच। पहली बेंच का पाया हिल रहा था, दूसरी के पीछे वाली पट्टी बीच से चटकी थी, तीसरी पर कोई बहुत भारी आदमी सालों बैठा था जिससे उसका बीच का हिस्सा धँस गया था, और बाक़ी चार में सिर्फ़ एक-एक कील ढीली थी।
मेरे हाथ में लकड़ी की रेती थी। पसीना माथे से आँख में जा रहा था। मेरी जेब से लोहे की कीलें गिर रही थीं और मैं उन्हें उठाकर मुँह में दबा लेता था, जैसे गाँव में बढ़ई करता है।
और ठीक तभी, जब मैं तीसरी बेंच को उलटकर उसके नीचे लकड़ी का टुकड़ा लगा रहा था, रुक्मा दीदी आईं, चाय का मिट्टी का कटोरा मेरे पास रखा, और ऊपर आसमान की तरफ़ देखकर बोलीं —
"आज कोई रिपोर्टर आने वाला है।"
मैंने रेती रोक दी।
"रिपोर्टर?"
"हाँ।" उन्होंने कहा। "औरत है। बैग फटा हुआ है, चश्मा टेढ़ा रहता है, और सवाल ऐसे पूछती है जैसे किसी की जेब में हाथ डाल रही हो।"
"कहाँ से आ रही है?"
"कहाँ से आती हैं ऐसी?" रुक्मा दीदी ने कंधे उचकाए। "किसी अख़बार से, किसी वेबसाइट से, मुझे क्या पता। मुझे इतना पता है कि पिछले हफ़्ते उसने मेरे ढाबे पर आकर दो घंटे बैठकर सिर्फ़ एक सवाल पूछा था — दीदी, सत्ताईस तारीख़ को आपके यहाँ क्या होता है?"
मैंने कटोरा उठाया। चाय गरम थी और उसमें अदरक तेज़ था।
"तुमने क्या कहा?"
"मैंने कहा — सत्ताईस को मेरे यहाँ रोटी ज़्यादा बनती है।" वो हँसीं। पर हँसी छोटी थी। "वो हँसी नहीं। वो उठी, दो सौ रुपये रखे और बोली — दीदी, मैं तीन महीने से यही सवाल पूछ रही हूँ और हर कोई मुझे रोटी का जवाब देता है।"
मैंने चाय पी। मुझे कुछ कहना था, पर तभी मेरे कान ने बाहर सड़क पर एक अलग आवाज़ पकड़ी।
एक गाड़ी आ रही थी — छोटी गाड़ी, पुरानी, उसका एक पहिया हवा कम होने की वजह से थोड़ा अलग बोल रहा था। और उसके ऊपर एक और आवाज़ थी — धातु की, लगातार, हल्की — जैसे किसी ने कंधे पर कोई लोहे का फ़्रेम टाँग रखा हो।
"आ गई।" रुक्मा दीदी ने कहा, और वो अंदर चली गईं।
गाड़ी रुकी। दरवाज़ा खुला। पैर पड़े — रबर की चप्पल, ज़मीन पर सीधी, जल्दी। और फिर वो आँगन में आई।
पहले मैंने उसका बैग देखा। फिर उसका चश्मा।
बैग फटा हुआ था — ठीक कंधे की जगह से, इतना कि अंदर का काला कपड़ा बाहर झाँक रहा था। उसमें से एक चार्जर की तार लटक रही थी, और वो तार उलझी हुई थी। हाथ में एक पुराना कैमरा था — भारी, काला, जिसके ऊपर की पट्टी घिस चुकी थी। और चश्मा — नाक पर सरकता हुआ। वो उसे उँगली से ऊपर धकेलती रही।
तीस साल से कम उम्र होगी। पर आँखों में जो था, वो उम्र से बड़ा था।
उसने मुझे देखा। मैं घुटनों के बल था, हाथ में रेती, मुँह में एक कील, जेब से दो और कीलें गिरी पड़ी थीं। मैंने मुँह से कील निकाली और उसे जेब में डाला।
"आप अर्जुन यादव हैं?"
"कौन पूछ रहा है?"
"नैना जोशी।" उसने कहा। "मैं लिखती हूँ।"
"क्या लिखती हो?"
"जो कोई नहीं बोलता।"
मैं हँसा। वो नहीं हँसी। वो मेरे सामने वाली बेंच पर बैठ गई — बिना पूछे — और उसने अपना कैमरा अपनी गोद में रख लिया, जैसे कोई तलवार म्यान से आधी निकालकर रख देता है।
"मैंने सुना है कि तुमने मोती की केबल की आवाज़ पहचानी थी।" उसने कहा। "बिना गाड़ी देखे। बिना नीचे जाकर। सिर्फ़ सड़क पर खड़े होकर।"
मैंने कटोरा उठाया और उसे उसकी तरफ़ बढ़ा दिया।
"चाय पियोगी?"
"मैं सवाल पूछ रही हूँ।"
"और मैं चाय दे रहा हूँ।" मैंने कहा। "यहाँ का रिवाज़ है।"
वो मेरे हाथ को देखती रही। फिर उसने कटोरा लिया, एक घूँट पिया, और उसे अपने घुटने के पास रख दिया।
"अब बताओ।"
"क्या बताऊँ?"
"कैसे पहचानी आवाज़?"
मैंने रेती वापस बेंच पर रखी और अपने हाथ पोंछे। मेरी उँगलियों पर लकड़ी का बुरादा था, और उसके नीचे वो पुरानी काली लकीरें थीं जो साबुन से भी नहीं जातीं।
"कान से।" मैंने कहा।
वो एक पल चुप रही।
"कान से।" उसने दोहराया। "बस?"
"बस।"
"अर्जुन जी —"
"जी मत लगाओ।" मैंने कहा। "मैं तेरे से दस साल बड़ा नहीं हूँ।"
"ठीक है।" उसने कहा। "अर्जुन। तुम मुझे ऐसे नहीं टाल सकते। मैं रिपोर्टर हूँ, कोई इंस्पेक्टर नहीं, पर मैं वहीं खड़ी थी जहाँ वो गाड़ी पलटी थी। मैंने देखा कि चार लोगों ने कहा कि ब्रेक फेल हुआ। पाँचवें ने कुछ नहीं कहा। और छठे ने, जो एक बूढ़ा ड्राइवर था, कहा कि इस गाड़ी ने चीखते हुए ब्रेक लगाए थे। मतलब ब्रेक थे। फेल नहीं हुए थे।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"तो तुम वहाँ थी?"
"मैं सब जगह होती हूँ।" उसने कहा, और चश्मा ऊपर धकेला। "यही मेरा काम है।"
मैंने अपनी जेब से लोहे की दो कीलें निकालीं और उन्हें हथेली में लेकर हिलाया। उनकी आवाज़ आई — हल्की टन, बहुत हल्की।
"सुनो।" मैंने कहा। "इन दोनों की आवाज़ में फ़र्क़ है?"
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