A Dark Secret – Chapter 59
"दीदी, मुफ़्त का हिसाब मैं नहीं रखता।" मैंने कहा।
"तो रखना सीख।" वो मेज़ पर झुकी। "कल से ढाबे के पीछे पड़े पुराने बेंच ठीक कर दे। दो टूटे हैं, एक का पाया हिलता है, चार का पत्ता खड़ा नहीं रहता। चार नए लकड़ी के पत्ते बाज़ार से आ जाएँगे। उसका हिसाब हो जाएगा।"
"कितने बेंच?"
"सात।"
"ठीक है।"
"और एक बात।" उसकी आवाज़ नीची हुई। "यहाँ खाना खा। बातें सुन। पर किसी से पूछना मत कि तू कौन है। जो खुद बताए, सुन लेना।"
मैंने सिर हिलाया।
वो चूल्हे पर लौट गई। और मैंने पहली बार ढाबे को पूरा देखा।
पंद्रह-बीस ड्राइवर थे। कोई चारपाई पर, कोई बेंच पर, कोई ट्रक के पहिये के सहारे ज़मीन पर। दो लालटेन के बीच एक तख़्ता टेबल था, जिस पर किसी ने अपनी कॉपी खोली थी और हिसाब जोड़ रहा था। पीछे एक नीम का पेड़ था, और नीम के नीचे उलटा ढोल पड़ा था, जिस पर जुगनू बैठा था। वो नंगे पाँव, घुटने पर पुराना निशान, और मुँह में एक रोटी का टुकड़ा लिए मेरी तरफ़ देख रहा था।
मैंने चाय का घूँट लिया और धीरे से पूछा, "दीदी, आज शाम कोई आया था? पाँच बजे के आसपास?"
उसके हाथ नहीं रुके। चूल्हे की आग पर तवा धीरे से चटका।
"बहुत लोग आते हैं।"
"सफ़ेद कुर्ता?"
"बहुत लोग सफ़ेद कुर्ता पहनते हैं।"
मैं चुप हो गया।
फिर वो खुद बोली, बिना मेरी तरफ़ देखे। "एक आदमी आया था। पाँच बजे। दो कटोरे चाय पी। एक चाय में इलायची डलवाई। पैसा दुगुना रखा और बोला, दीदी, बाकी अगली बार।"
"क्या बात की?"
"बात? उसने बात नहीं की।" उसने रोटी पलटी। "उसने सिर्फ़ पूछा — पीली गाड़ी वाला लड़का यहाँ आता है?"
मेरे हाथ में कटोरा था। मैंने उसे मेज़ पर रखा और आवाज़ धीमी रखी।
"और आपने क्या कहा?"
"मैंने कहा, यहाँ बहुत गाड़ियाँ आती हैं।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "और फिर मैं उसका कटोरा धोने गई, तो देखा वो कटोरा इलायची की महक छोड़ गया है। दो घंटे बाद भी।"
"कहाँ गया?"
"पता नहीं।" उसके हाथ फिर चले। "पर जाते वक़्त वो दरवाज़े पर रुका और उसने बाहर खड़ी गाड़ी की तरफ़ ऐसे देखा जैसे गाड़ी उसकी नौकर हो।"
मैंने पीछे देखा। ढाबे के सामने खाली सड़क थी। पर हवा में अभी भी हल्की सी गंध थी, जो इलायची की थी और धूल की भी।
मैंने कटोरा उठाया और पीछे की तरफ़ चल दिया, जहाँ ड्राइवर बैठे थे।
इस ढाबे पर एक बात है। यहाँ कोई आदमी अकेला नहीं बैठता। कोई चाय माँगता है, और उसके दो मिनट बाद पाँच और लोग उसकी चारपाई के आसपास बैठ जाते हैं। बात किसी और की शुरू होती है, और पहुँच किसी और की होती है।
मैं पान चबाने वाले ड्राइवर के पास बैठा। वो वही था जिसने मरून ट्रक गैराज में लाकर मेरे कान की तारीफ़ की थी। उसके हाथ में आज भी पान का कटोरा था, और शर्ट पर पसीने की सफ़ेद लकीरें थीं।
"अरे, तू!" उसने कहा। "क्या बात है, ट्रक चल रहा है?"
"चल रहा है।"
"अच्छा।" उसने कटोरा नीचे रखा। "सुन, मेरी गाड़ी की एक बीमारी है। पूरा डीज़ल डालता हूँ, फिर भी कम पड़ता है।"
"पंप पर जाता है?"
"रोज़।"
"तो पंप वाले को कहना, पहले हवा डाले, फिर डीज़ल।" मैंने कहा। "आपकी गाड़ी में पंप की झिल्ली कमज़ोर है। वो हवा खींच लेती है। मीटर पूरा दौड़ता है, डीज़ल आधा जाता है।"
वो मेरी तरफ़ देखने लगा। फिर हँसा। "ये कहाँ से आया?"
"कान से।"
"कान से डीज़ल नापता है?"
"कान से सिर्फ़ ये पता चलता है कि तुम्हारी गाड़ी सुबह से खाँस रही है।" मैंने कहा। "बाकी हिसाब तुम्हारा।"
वो हँसा, और हँसते-हँसते उसने दूसरे ड्राइवरों को इशारा किया।
"देखो, ये वही लड़का है। पीली गाड़ी वाला।"
एक युवा ड्राइवर मेरी तरफ़ झुका। दुबला, छोटी दाढ़ी, जेब में टूटा हुआ प्लास्टिक का कार्ड, जो वो बार-बार निकालकर देखता था जैसे कोई ताबीज़ हो।
"भाई, मेरी गाड़ी में एक आवाज़ है।" उसने कहा। "रुकने पर घरघर, चलने पर गायब।"
"बेयरिंग।" मैंने कहा। "कल सुबह आ जाना। ढाई सौ लगेंगे।"
"मेरे पास अभी…"
"तो कल नहीं, परसों।" मैंने कहा। "गाड़ी ज़्यादा नहीं खींचना। बेयरिंग जब बोलेगी, तब वो पूरी धुरी को साथ ले जाएगी।"
उसने सिर हिलाया। फिर उसने मेरी कॉपी देखी, जो मेरी जेब से आधी बाहर थी।
"ये क्या है?"
"हिसाब।"
"ऐसा हिसाब?"
"हर गाड़ी की आवाज़, काम, रकम, तारीख़।" मैंने कहा।
वो हँसा, पर हँसी में वो चीज़ नहीं थी जो मज़ाक में होती है।
"तू नया है।" उसने कहा। "यहाँ कोई हिसाब नहीं रखता, भाई। यहाँ लोग सिर्फ़ याद रखते हैं। और याद भी उतनी ही देर, जितनी देर में चाय ठंडी होती है।"
मैंने चाय का कटोरा उठाया। "तो फिर बताओ। मैं सुनता रहूँगा।"
पान वाले ने अपना कटोरा फिर भरा और बोला, "देख, सताईस तारीख़ का दिन।"
"क्या है सताईस में?"
"सताईस को सफ़ेद गाड़ियाँ निकलती हैं। सात। कभी नौ।" उसने उँगली से गिनाया। "पर रसीद पर कभी नाम नहीं होता। मैंने एक बार काउंटर पर पूछा था, भाई, इनका नाम क्यों नहीं? तो काउंटर वाले ने मुझे ऐसे देखा जैसे मैंने उसकी माँ का नाम पूछ लिया हो।"
"रसीद पर क्या होता है?"
"तारीख़। बस। और कभी-कभी एक नीला गोल निशान।"
मेरे हाथ रुक गए।
"नीला गोल?"
"हाँ। मुहर जैसा। पीछे की तरफ़।" उसने कटोरा मेज़ पर रखा। "उस निशान को देखते ही काउंटर वाले आँख फेर लेते हैं। मैंने एक बार टीटू से पूछा था। वो बोला, भाई, मेरी नौकरी में मत झाँक।"
मैंने कटोरा दोनों हाथों में पकड़ा और चुप बैठ गया। नीला गोल निशान। सरिता कार्गो। सात सफ़ेद ट्रक। और वो जूट में लिपटा डिब्बा, जिस पर वही नीला निशान था और रस्सी पर लाल मोहर के नीचे चार सौ उन्नीस लिखा था।
"कहाँ जाती हैं?" मैंने पूछा।
"काँच की इमारत।" दूसरे ड्राइवर ने कहा। "टोल से आगे। जहाँ फाटक पर बोर्ड है, पर बोर्ड पर नाम नहीं।"
"नाम क्यों नहीं?"
"क्योंकि जिसका नाम होता है, उसे पकड़ा जा सकता है।" पान वाले ने कहा। "जिसका नाम नहीं, उसे कौन पकड़ेगा?"
युवा ड्राइवर ने धीरे से कहा, "मैंने एक बार देखा था। सातवीं गाड़ी का लड़का मेरे साथ ही चाय पीता था। किशोर था, मुझसे भी छोटा। मैंने कहा, भाई, इन गाड़ियों के काग़ज़ क्या ऐसे ही चलते हैं? वो हँसा और बोला, काग़ज़ से क्या, यहाँ माल भी ऐसे ही चलता है।" उसने रुककर कटोरा घुमाया। "तीन दिन बाद उसकी गाड़ी का पता नहीं था। कहते हैं उसने काम छोड़ दिया।"
"और सच?"
"सच किसी ने नहीं पूछा।"
फिर एक पल के लिए शोर गिर गया। एक ड्राइवर बोला, "ये नया लड़का है न। इसको क्यों डरा रहे हो?"
"ये नया नहीं है।" पान वाले ने मेरी तरफ़ देखा। "ये रघुवीर का बेटा है।"
और जैसे सबको एक साथ याद आ गया। मुझे देखने वाली आँखें बदल गईं। कुछ लोगों ने कटोरा नीचे रखा। एक बुज़ुर्ग ड्राइवर जो अब तक चुप बैठा था, उसने धीमी आवाज़ में कहा, "रघुवीर को कोई भूला नहीं है।"
मेरी आवाज़ अपने आप धीमी हो गई। ये मेरी आदत है। जब अंदर कुछ हिलता है, तो बाहर से आवाज़ नीची हो जाती है।
"आप पापा को जानते थे?"
वो बुज़ुर्ग मेरी तरफ़ मुड़ा। उसकी आँखें दबी हुई थीं, जैसे बहुत दिन से नींद नहीं आई हो।
"जानता था।" उसने कहा। "वो चाय में चीनी कम लेता था और मीठी बात ज़्यादा करता था। पर उसकी मीठी बात में हिसाब होता था। वो ऐसा आदमी नहीं था जो झूठ बोले।"
"किसने मारा उन्हें?"
मेरा सवाल सीधा था। ढाबे में चम्मचों की आवाज़ एक सेकंड के लिए रुकी।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno