A Dark Secret – Chapter 58
"क्योंकि मैं डरता हूँ।" उसने बिलकुल सीधी बात कही, बिना शर्म के। "मैं सत्तर साल का हूँ, भाई। मैंने चालीस साल गाड़ी चलाई और मैंने अपनी आँखों से सात नाम मिटते देखे। मैं उन सात में से एक भी नहीं हूँ, क्योंकि मैं चुप रहा। और अब मैं तुझे कुछ नहीं बताऊँगा। तू खुद निकाल।"
वो उठा। उसने मेरी जेब में एक काग़ज़ ठूँस दिया।
"ये क्या है?"
"पुर्ज़े का पैसा। दो सौ। बल्लू बाद में चुकाएगा, अभी तू रख।"
"मैं मुफ़्त में लगा दूँगा।"
"मुफ़्त में काम करने वाले लोग जल्दी मरते हैं।" उसने कहा। "पैसा ले। पैसा लेने वाला आदमी ज़िंदा रहता है।"
मैंने पैसे रख लिए।
वो गाड़ी में चढ़ा। फिर खिड़की से बाहर झाँका।
"सुन।" उसने कहा। "बल्लू तुझे आज शाम कुछ बताएगा। वो बहुत मीठा बोलने वाले आदमी के बारे में है। पर भाई, एक बात याद रख।"
"क्या?"
"मीठी आवाज़ में झूठ सबसे ज़्यादा देर टिकता है। क्योंकि लोग उसे सुनकर आँखें बंद कर लेते हैं।"
गाड़ी चली गई। धुआँ उड़ता रहा।
मैं वहीं खड़ा रहा। मेरे हाथ तेल में काले थे और जेब में दो सौ रुपये थे और दिल में एक नाम था जो मैं नहीं मिटाने वाला था।
शाम को लौटते वक़्त अम्मा का फ़ोन आया।
"खाना खाया?"
"खाया अम्मा।"
"क्या खाया?"
मैंने दो सेकंड सोचा। "रोटी।"
"किसके साथ?"
"अकेले।"
वो चुप हो गई। माँ को झूठ पकड़ने के लिए कान नहीं चाहिए होते।
"अर्जुन।" उसकी आवाज़ धीमी हो गई। "पाँच सौ लौटा देना जो भेजा था। मेरे पास पड़ा है। मुझे नहीं चाहिए।"
"अम्मा, रख ले।"
"नहीं रखूँगी।" उसकी आवाज़ में वो पत्थर आ गया जो सिर्फ़ माँ की आवाज़ में आता है। "उन पैसों से कुछ खरीदना मत। और सुन, उन लोगों से मत उलझना।"
"कौन से लोग?"
"जिनके पास बहुत पैसा है और बहुत मीठी बोली।" वो कुछ देर चुप रही, फिर बोली, "तेरे पापा भी मीठी बोली वालों से ही मिलने गए थे उस रात।"
मेरे हाथ रुक गए।
"अम्मा।"
"अब मत पूछ।" उसने फ़ोन काट दिया।
मैं सड़क के किनारे खड़ा रह गया। शाम की हवा में पहली बारिश की गंध आ रही थी।
मैं ढाबे पहुँचा तो रुक्मा दीदी चूल्हे पर रोटियाँ बना रही थी। उसने मेरी तरफ़ देखा और बस इतना कहा, "पैर धो ले। कीचड़ में घुसा था?"
"हाँ।"
"कुछ मिला?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। वो अपने काम में लगी रही, जैसे उसने कुछ पूछा ही न हो।
"दीदी, आज शाम कोई आने वाला है?"
उसके हाथ एक सेकंड रुके। बस एक सेकंड।
"बहुत लोग आते हैं।" उसने कहा। "बैठ। चाय पी।"
मैं बल्लू के पास गया। वो अब भी चारपाई पर था, पर उसने कंधे से चादर हटा दी थी और वो सीधा बैठा था। उसकी आँखें मुझे देखते ही बदल गईं।
"पुर्ज़ा लग गया?"
"लग गया। गाड़ी चल पड़ी।"
"बूढ़े से बात हुई?"
"हुई।"
"क्या बोला?"
"बोला कि तू मुझे आज शाम कुछ बताएगा।"
बल्लू ने अपना मुँह दूसरी तरफ़ कर लिया। उसके हाथ चादर को मुट्ठी में दबा रहे थे।
मैं उठने लगा। मैंने जान-बूझकर उसकी तरफ़ पीठ कर दी। मुझे पता था कि डरे हुए आदमी को पीठ दिखाने से कभी-कभी उसकी जुबान खुल जाती है।
और फिर वो हुआ।
"अर्जुन।"
मैं रुका।
"इधर आ।" उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि लगा किसी और का गला बोल रहा है।
मैं वापस गया और उसके पास झुक गया।
बल्लू ने मेरा कंधा पकड़ा। उसके होंठ मेरे कान के पास आए और उसकी साँस में दवा की महक थी।
"शाम को रातरानी ढाबे पर आ।" उसने फुसफुसाकर कहा। "वहाँ एक आदमी तेरे पापा का नाम लेकर बैठा था।"
मैं सीधा हो गया।
"कौन?"
"पता नहीं।" उसने मेरी कलाई और कसकर पकड़ ली। "पर भाई, वो बहुत मीठा बोलता है।"
॥
बल्लू ने मेरी कलाई नहीं छोड़ी। उसकी उँगलियाँ सूखी लकड़ी जैसी थीं, पर पकड़ लोहे की थी।
"क्या पूछूँ उससे?" मैंने पूछा।
"कुछ मत पूछ।" उसने कहा। "बस सुन। और हाँ, उसके सामने मेरा नाम मत लेना। मैं अभी चलने लायक नहीं हूँ, और जो चलने लायक नहीं, उसे ये शहर खा जाता है।"
मैंने उसका हाथ धीरे से खोला। चादर उसके पैरों पर सरक गई, और उसकी एड़ी पर वो दरार फिर दिख गई, जैसे सूखी ज़मीन में चीरा।
"तेरे पास पैसे हैं?" उसने पीछे से पूछा।
"दो सौ साठ।"
"ढाबे पर कुछ मत माँगना। दीदी खुद रख देगी। और अगर वो आदमी तुझे चाय पिलाने की कोशिश करे, तो कहना पहले से पी हुई है।"
"क्यों?"
वो चुप रहा। फिर बोला, "बस कह देना।"
मैं सड़क पर निकल आया।
शाम सात बजे के आसपास थी। हवा में पहली बारिश की गंध आ रही थी, वो गंध जो धूल से पहले आती है और बताती है कि बादल कहीं पास हैं, बस रास्ता भूल गए हैं। ट्रांसपोर्ट नगरी की सड़क पर ट्रकों की कतार धीमी हो गई थी। दिन में यहाँ आवाज़ें दौड़ती हैं, शाम को वो चलने लगती हैं।
मैं चलता रहा।
रास्ते में एक बात मेरे सिर में घूम रही थी। बल्लू ने कहा था — वहाँ एक आदमी तेरे पापा का नाम लेकर बैठा था। यह बात दो तरह से समझी जा सकती थी। पहली, कोई पुराना जानने वाला, जो पापा की याद में आया है। दूसरी, कोई ऐसा, जो नाम लेकर यह देख रहा है कि नाम पर कौन काँपता है।
मैंने अपनी घड़ी देखी। पाँच मिनट आगे। पापा की घड़ी आज भी दिल्ली के समय से आगे चल रही थी, जैसे उन्हें हमेशा जल्दी रही हो।
ढाबे की रोशनी दूर से दिखती है। तीन लालटेन, एक पीली, दो हरी। और उसके नीचे तवे की छनछन, जो मुझे बचपन में अम्मा की रसोई की याद दिलाती है।
पहली बार मैंने रातरानी ढाबे की चौखट पर पैर रखा।
और मैं सच कहूँ तो पहले मुझे आवाज़ ने रोका, फिर देखने की हिम्मत आई।
मिट्टी के कटोरे। सौ कटोरे, एक के ऊपर एक, सामने वाले लोहे के ताक पर धरे। एक ड्राइवर ने हाथ बढ़ाया और एक कटोरा उठाया — खन्। फिर दूसरा — खन्। उसके बाद चम्मच कटोरे से टकराया — टिन्। ये आवाज़ें मिलकर वैसी ही थीं जैसी मुझे पापा के मुँह से सुनी थीं। रुक्मा दीदी कहती थीं कि रघुवीर यहाँ आकर चुप बैठता था और बर्तनों की टन-टन में गाड़ी की आवाज़ सुनता था।
मैंने आँख बंद करके एक सेकंड सुना। कटोरे खनक रहे थे, तवे पर रोटी फूल रही थी, पीछे कोई डीज़ल का ड्रम खोल रहा था, और दूर टोल पर कोई हॉर्न बजा रहा था। सब मिलाकर एक ऐसी आवाज़ बन रही थी जिसमें अगर किसी गाड़ी में कुछ गड़बड़ हो तो टन-टन के बीच छिप जाएगी।
और तभी वो हँसी आई।
रुक्मा दीदी की हँसी। मैंने सुना था कि वो ऐसे हँसती हैं, पर सुनकर लगा जैसे छत उड़ गई। इतनी बड़ी हँसी कि उसके बाद ट्रक का हॉर्न भी शर्मा गया और दब गया।
"अरे!" उसने चूल्हे से ही पुकारा। "तू वही है न? वही है जिसने कबाड़ के भाव वाले ट्रक पर रघुवीर लिख दिया?"
मैं रुक गया।
"हाँ दीदी।"
"कैसे लिखा?"
"सूखा रंग डीज़ल में मिलाया। पुराने ब्रश से।"
उसने तवे से रोटी उतारी और सीधी मेरी तरफ़ आई। कमर पर चाबियों का गुच्छा, हाथ में मोटा तौलिया, और आँखें ऐसी कि दो सेकंड में पूरा आदमी पढ़ लें।
"अच्छा लिखा था।" उसने कहा। "पर बता, वो नाम लिखकर तू सोया कैसे? क्योंकि यह शहर नाम देखकर जाग जाता है।"
"मैंने सोचा, भूलना मेरे हाथ में है। किसी और के हाथ में नहीं।"
वो दो सेकंड मुझे देखती रही। फिर मुड़ी और चिल्लाई, "सलीम! एक थाली!"
मैंने हाथ उठाया। "दीदी, मैं…"
"बैठ।" उसने कहा, ऐसे जैसे कोई रेलवे का सिग्नल गिरा दे।
मैं बैठ गया।
थाली आई। दो रोटी, एक कटोरी दाल, प्याज़, और एक मिट्टी का कटोरा चाय का। चाय में अदरक थी और ऊपर हल्का सा मलाई का छींट। मैंने कटोरा उठाया — खन् — और मुझे लगा कि आज पहली बार मैंने कोई चीज़ बिना डर के उठाई है।
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