A Dark Secret – Chapter 57
"मुझे कुछ नहीं चाहिए।"
"ले ले। काम का पैसा है।"
"काम का पैसा लेता हूँ।" मैंने कहा। "पर ये काम का नहीं है, भाई। ये तेरी तरफ़ से एक बहाना है। बहाने के पैसे नहीं लेता।"
उसने कुछ नहीं कहा। उसकी आँखें भर आईं थीं, और वो इससे छिपाने के लिए आसमान देखने लगा।
मैं जाने को मुड़ा ही था कि मुझे कुछ याद आया। मैं रुक गया।
"बल्लू भाई, एक बात। तेरा भांजा कल क्यों आया था मेरे पास?"
"क्या मतलब?"
"कल वो मुझसे मिलने आया था। कह रहा था कि मामा ने भेजा है। पर तू तो चारपाई पर पड़ा था। तूने कब भेजा?"
बल्लू ने आँखें बंद कर लीं। "मैंने नहीं भेजा।"
"तो?"
"तो इसका मतलब वो खुद आया था।" उसने धीरे से कहा। "और अगर वो खुद आया था, तो कोई और था जिसने उसे भेजा।"
मैं कुछ देर खड़ा रहा। फिर मैंने कहा, "बल्लू भाई, जिस दिन मोती चलेगा, उस दिन तेरी जुबान भी चलेगी।"
वो हँसा। डर के साथ हँसा। "चलेगी भाई। बस तू गाड़ी चला।"
मैं गाड़ी महल की तरफ़ चल पड़ा।
गाड़ी महल सुबह के सात बजे भी उसी तरह सोया हुआ था। लोहे के पहाड़, कबाड़ की महक, और बीच में कबीर की टिन की दुकान पर एक पीली बत्ती जल रही थी।
कबीर चाय पी रहा था। मुझे देखते ही उसने कप नीचे रखा और दोनों पेन जेब से निकाल लिए, जैसे बिना पेन के वो बात भी नहीं कर सकता।
"इतनी सुबह?"
"बल्लू का पुर्ज़ा।" मैंने पर्ची रख दी।
उसने पढ़ी और सीटी बजाई। "फ्यूल पंप की झिल्ली और दो ताँबे की वॉशर। भाई, बल्लू पहले ऐसे पुर्ज़े नहीं मँगाता था।"
"तो अब क्यों मँगा रहा है?"
"यही मैं सोच रहा हूँ।" उसने अलमारी खोली। अंदर से एक छोटा पैकेट निकाला। "और एक बात सुन। इस बाईपास वाली गाड़ी में जो बैठा है, वो सिर्फ़ ड्राइवर नहीं है। वो उस शहर की पुरानी किताब है। उसके पास हर हादसे की याद है। उससे बहस मत करना।"
"तू उसे जानता है?"
"मैं उसे नहीं जानता।" कबीर ने पैकेट मेरी तरफ़ सरकाया। "वो मुझे जानता है। और मुझे उससे बात करनी अच्छी नहीं लगती।"
मैं पैकेट उठाने लगा तो मेरी नज़र दीवार की घड़ी पर पड़ी। दस बजकर सत्ताईस मिनट। रुकी हुई।
"कबीर।"
"हाँ।"
"ये घड़ी अब भी रुकी है।"
"सब रुकी चीज़ें रुकी रहती हैं, भाई।" उसने कहा, और मुझे लगा कि वो घड़ी की नहीं किसी और की बात कर रहा है।
मैंने पैकेट उठाया और चल दिया।
बाईपास पर दोपहर की धूप सिर पर पड़ रही थी। सड़क के किनारे, एक पुराने पीपल के नीचे, हरी गाड़ी खड़ी थी। उसका एक पहिया कीचड़ में धँसा हुआ था और पीछे का पहिया एक ईंट से रोका हुआ था।
गाड़ी के नीचे, जूट की बोरी बिछाकर, एक बूढ़ा आदमी बैठा था। सफ़ेद दाढ़ी। हाथ में लाठी। और साँस में वो हल्की सीटी।
मैं दस कदम दूर रुक गया।
क्योंकि मैं उसकी आवाज़ पहचानता था।
"आ जा।" उसने मेरी तरफ़ देखे बिना कहा। "दूर से ही खड़ा है। ढाबे पर भी तो ऐसे ही खड़ा था।"
मैं उसके पास गया। वो उठा नहीं। बस अपनी लाठी के सहारे थोड़ा सीधा बैठ गया।
"तू बल्लू का आदमी है?"
"बल्लू ने भेजा है। पुर्ज़ा।"
"रख दे।" उसने जगह दिखाई। "और बैठ जा। मैं खुद नहीं लगा पाऊँगा। मेरे घुटने चार साल पहले ही जवाब दे गए थे।"
मैंने पैकेट खोला और गाड़ी के नीचे घुसकर झिल्ली बदलने लगा। हवा की लाइन जवाब दे रही थी, एक वॉशर भी बदलनी पड़ी। मेरे हाथ तेल में लथपथ हो गए।
वो ऊपर से बोलता रहा। किसी से नहीं, अपने आप से, जैसे कोई पुराना रेडियो चल रहा हो।
"बल्लू डरा हुआ है।"
"है।"
"मैं जानता हूँ।" उसने लाठी ज़मीन पर टेक दी। "मैंने उसे कहा था, मोती पलटा नहीं, पलटाया गया। उसने मेरी बात नहीं मानी। अब पछता रहा है।"
"तुमने कैसे जाना?"
"मैंने कुछ नहीं जाना।" उसकी सीटी वाली साँस तेज़ हो गई। "मैंने चालीस साल गाड़ी चलाई है। मुझे ये नहीं पता कि हादसा कैसे होता है? हादसे में तार टूटता है, भाई, कटता नहीं। टूटे तार के धागे बिखरे होते हैं। कटे तार के धागे सीधे होते हैं, जैसे किसी ने कंघी की हो।"
मेरे हाथ रुक गए।
मैंने गाड़ी के नीचे से उसे देखा। धूप उसके सफ़ेद बालों पर पड़ रही थी।
"तुमने मुझे ढाबे पर कहा था कि पापा का नाम मिटा दे।"
"हाँ।"
"क्यों?"
वो कुछ देर चुप रहा। फिर बोला, "क्योंकि सात नाम मिट चुके हैं। और जिस दिन आठवाँ मिटेगा, उस दिन उस नाम के साथ एक घर भी मिटेगा।"
मैं गाड़ी के नीचे से निकला। मेरे हाथ तेल से काले थे।
"कौन से सात?"
"यही तो बात है।" उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें धुँधली थीं, पर उनमें वो साफ़ चीज़ थी जो धुँधलेपन से भी नहीं छिपती। "तुझे नाम चाहिए या हाथ?"
"दोनों।"
"लालच मत कर। एक चुन।"
"तो हाथ।" मैंने कहा। "नाम अपने आप निकल आएँगे जब हाथ पकड़ में आएगा।"
वो हँसा। खुलकर हँसा। दो ही दाँत थे, पर हँसी पूरी थी।
"अच्छा जवाब।" उसने कहा। "बैठ, पानी पी।"
हम पीपल के नीचे बैठ गए। उसने अपनी बोरी से एक टिन का डिब्बा निकाला और उसमें से दो रोटियाँ निकालीं, सूखी, और मेरी तरफ़ बढ़ा दीं।
"मुझे भूख नहीं।"
"झूठ मत बोल। तेरी आवाज़ सुबह से खाली है।"
मैं हक्का-बक्का रह गया। मैंने रोटी ली।
"तुमने मुझे कैसे पहचाना?"
"क्या?"
"ढाबे पर। मैंने तुमसे कुछ नहीं पूछा था। तुमने मुझसे बात शुरू की। क्यों?"
वो रोटी चबाता रहा। फिर बोला, "क्योंकि तू आँख बंद करके बैठा था।"
"तो?"
"तो मैंने सोचा, ये आदमी देख नहीं रहा, सुन रहा है।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "इस शहर में सुनने वाले दो ही हैं। एक रुक्मा है, और एक तू।"
मैं चुप रहा।
"और एक बात।" उसने रोटी नीचे रख दी। "बल्लू ने तुझे यहाँ सिर्फ़ पुर्ज़े के लिए नहीं भेजा। उसने तेरा कान और तेरी हिम्मत, दोनों नाप लिए। अगर तू आज यहाँ आकर चुपचाप पुर्ज़ा लगाकर चला जाता, तो वो तुझे कभी कुछ नहीं बताता।"
"तो अब बताएगा?"
"अब बताएगा।" उसने कहा। "क्योंकि तूने मुझसे सवाल पूछा। डरा हुआ आदमी सवाल नहीं पूछता।"
तभी दूर से एक आवाज़ आई।
फटा हुआ मफ़लर।
मेरी रीढ़ ठंडी हो गई। मैंने उसकी तरफ़ देखा। वो भी सुन चुका था। उसने बिना कुछ कहे अपनी लाठी उठाई और मेरी तरफ़ आँख से इशारा किया।
मैं गाड़ी के नीचे घुस गया।
बोलेरो सड़क के किनारे से गुज़री। धीमी। बहुत धीमी। जैसे कोई गिन रहा हो कि सड़क पर कितनी गाड़ियाँ खड़ी हैं। खिड़की से कोई बाहर झाँका, पर मैंने उठकर नहीं देखा। मैंने बस सुना।
फिर वो निकल गई।
मैं गाड़ी के नीचे से बाहर आया। मेरी साँस अब भी तेज़ थी।
"उसकी आवाज़ मुझे पहचानी है।" मैंने कहा।
"मुझे भी।" बूढ़े ने मेरी तरफ़ देखा। "पर तू भूल जा कि तूने सुना। समझा?"
"क्यों?"
"क्योंकि आज तेरी जान तेरे कान में है, मुँह में नहीं।" उसने लाठी पर टेक लगाई। "चल। गाड़ी स्टार्ट कर। मुझे सुनना है कि तूने क्या लगाया।"
मैंने चाबी घुमाई। इंजन पहली बार में ही उठा। उसकी घरघराहट साफ़ थी। कोई रिसाव नहीं, कोई झटका नहीं।
बूढ़े ने आँखें बंद कर लीं और सुना। फिर उसने सिर हिलाया।
"ठीक है।" उसने कहा। "बिलकुल ठीक है।"
और उसी वक़्त, दोपहर की गरम हवा में, उसने बहुत धीरे से कहा, "तेरे पापा भी ऐसे ही सुनते थे।"
मैं सख़्त हो गया।
"तुम पापा को जानते थे?"
"मैंने उसके साथ एक साल गाड़ी चलाई।" उसने कहा। "रघुवीर अच्छा आदमी था। पर अच्छा आदमी इस शहर में बहुत जल्दी मर जाता है।"
"तो तुम मुझे बताओ कि क्या हुआ।"
"नहीं।"
"क्यों?"
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