A Dark Secret – Chapter 56
मेरी साँस अटक गई।
मैं उसका मुँह देखता रह गया। और फिर मैं वहीं, सड़क के बीच, बिना किसी शोर के, मुस्कुरा दिया।
क्योंकि अब मुझे पता था — मेरे चाचा जो मुझसे कहते हैं कि वो उस रात गैराज में थे, किसी को जवाब दे रहे हैं। हर रात। अपने आप को। और वो खुद मान चुके हैं कि वो पापा से बात कर रहे हैं। मुर्दे से। जो ज़िंदा आदमी मुर्दे से बात करता है, वो मुर्दे को ज़िंदा नहीं कर रहा होता — वो अपने ही गुनाह को माफ़ी माँग रहा होता है।
मैंने जुगनू को देखा।
"कुछ नहीं। चल।"
हम फिर चले।
और पुराने पुल के नीचे उतरते वक़्त मैंने देखा — कटोरी वहीं रखी थी। मिट्टी की कटोरी। छोटी। ढाबे वाली कटोरी। और उसमें राख थी, हल्की गरम, जैसे अभी हाथ ने उसे पकड़ा हो और छोड़ा हो।
मैंने कटोरी उठाई। नीचे एक पुरानी पर्ची चिपकी थी। पर्ची पर फाड़ा हुआ कोना था और उस पर एक नाम आधा मिटा हुआ था।
मैंने उसे अपनी कॉपी के उसी पन्ने में रखा जहाँ सात खाली घर बने थे।
सातवें घर के नीचे।
मैंने ऊपर देखा — आसमान में बादल गरज रहे थे और पुल के किनारे एक आदमी खड़ा था, जो मुझे देख नहीं रहा था, बस एक दिशा में देख रहा था।
और मैंने ठान लिया — अब मैं सिर्फ़ तार नहीं ढूँढूँगा। मैं वो हाथ भी ढूँढूँगा जो ये राख हर रोज़ आकर रखता है।
॥
सुबह के पाँच बजे आसमान का रंग ऐसा था जैसे किसी ने धुली कमीज़ पर थोड़ी कालिख मल दी हो। बारिश नहीं आई थी। हवा में बस नमी थी और कीचड़ की वो महक थी जो पुराने ज़ख्म की तरह देर तक नाक में रहती है।
मैं पुराने पुल से उतरकर सीधा उसी मोड़ पर पहुँचा जहाँ मोती पलटा था। दो दिन बीत चुके थे, पर ज़मीन अब भी वैसी ही पड़ी थी। किसी ने मिट्टी नहीं हटाई थी। क्रेन के पंजों ने जहाँ ज़मीन दबाई थी, वहाँ कीचड़ सूखकर पत्थर जैसा हो गया था, और उसी के बीच एक गहरा गड्ढा था — जितनी जगह में ट्रक का पिछला हिस्सा बैठा था।
किनारे पर काँच के टुकड़े अब भी चमक रहे थे, जैसे रात भर किसी ने उन्हें गिना हो।
जुगनू मेरे पीछे-पीछे आ रहा था। मैंने उसे रोका।
"तू यहीं रुक। सड़क के मोड़ पर खड़ा हो जा।"
"क्यों भैया?"
"क्योंकि अगर कोई आए, तो मुझे पहले तेरी सीटी सुनाई दे। वो वाली, जो तू फ़िल्मों की बजाता है।"
वो हँसा। "वो तो बेसुरी है।"
"इसीलिए। बेसुरी चीज़ दूर तक सुनाई देती है।"
वो चला गया। मैं अकेला कीचड़ में घुटनों के बल बैठ गया।
मेरे हाथ ठंडे थे। मैंने जेब से रुमाल निकाला, तेल में डूबा हुआ, और उसे वापस रख दिया। फिर सीधे हाथ से कीचड़ खुरचना शुरू किया।
पहली परत गीली थी, दूसरी सख़्त, और तीसरी में वो गंध आई जो सिर्फ़ ट्रक के नीचे होती है — डीज़ल, गरम लोहा और जला हुआ रबर।
मेरी उँगलियाँ किसी चीज़ से टकराईं। कुछ सख़्त। मैंने धीरे से खींचा।
तार था। ब्रेक का तार। मोटा, काला, बाहर से घिसा हुआ।
और सिरा कटा हुआ था।
मैंने उसे आँख के पास उठाया। भोर की रोशनी बहुत थी नहीं, पर जितनी थी, वो काफ़ी थी। कटा हुआ सिरा चिकना था। चिकना और सीधा। जैसे पहले किसी ने औज़ार की धार तेज़ की हो, फिर एक ही बार में दबाया हो।
मैंने और खुरचा। दस मिनट बाद मेरे हाथ में तीन टुकड़े थे।
पहला — मोटी केबल का, जिसके अंदर लोहे के धागे बालों की तरह बिखरे हुए थे।
दूसरा — उसी केबल का पतला हिस्सा, जो किसी क्लिप में दबा रह गया था।
और तीसरा — नाखून जितना एक छोटा टुकड़ा, जिसका सिरा इतना साफ़ कटा था कि उसे देखकर मुझे अपनी जेब में पड़ा वो पुराना टुकड़ा याद आ गया, जो मुझे गैराज में स्प्रिंग के पास मिला था।
मैंने जेब से वो टुकड़ा निकाला और दोनों को हथेली पर रख दिया।
एक जैसे। उतनी ही मोटाई, उतना ही रंग, उतना ही चिकना कटा हुआ सिरा।
मेरी साँस रुक गई।
यह कोई इत्तेफ़ाक़ नहीं था। जिसने ये काटा था, उसने एक जगह नहीं काटा था। उसने पहले भी काटा था। और वो आदमी अपना औज़ार पहले से तेज़ करके रखता था। यानी वो जानता था कि उसे काटना है। वो सड़क पर औज़ार लेकर नहीं निकला था — वो तैयार होकर निकला था।
मैंने तीनों टुकड़े रुमाल में लपेटे और जेब में रखे।
फिर मैं उठा और आसमान की तरफ़ देखा। बादल पहले से भारी हो गए थे।
जुगनू दूर सड़क के मोड़ पर खड़ा सीटी बजा रहा था। बेसुरी। मेरे होंठ हिले बिना मुस्कुरा दिए। कम से कम एक आवाज़ ऐसी थी जो वैसी ही थी जैसी दिख रही थी।
मैं कीचड़ से बाहर निकला और सीधा बल्लू के पास चल दिया।
बल्लू रातरानी ढाबे के पीछे, नीम के नीचे, चारपाई पर लेटा था। उसका पैर दो तकियों पर रखा था और उसका भांजा उसकी पट्टी बदल रहा था। पट्टी खोलते ही वो गंध उठी जो घावों की होती है — दवा, पसीना और थोड़ा सा डर।
बल्लू ने मुझे देखा और उसका चेहरा बदल गया।
"भाई, तू इतनी सुबह?"
"सुबह नहीं बल्लू भाई। दिन निकलने वाला है।" मैं उसके पास बैठ गया। "पैर कैसा है?"
"चलने लायक नहीं। डॉक्टर कहता है हड्डी में दरार है।" उसने मुँह फेर लिया। "मोती पलट गया, भाई। मेरी गाड़ी, मेरा खून, मेरा हिसाब — सब उसी कीचड़ में पड़ा है।"
"मोती की बात छोड़। मुझे तुझसे एक बात पूछनी है।"
"पूछ।"
मैंने रुमाल खोला और वो तीन टुकड़े उसकी आँखों के सामने रख दिए।
बल्लू ने देखा। एक सेकंड। दो सेकंड। फिर उसने नज़र हटा ली, इतनी जल्दी कि जैसे उसने उन्हें छुआ ही न हो।
"ये क्या है?"
"यही मैं तुझसे पूछ रहा हूँ। तेरी गाड़ी के नीचे से निकला है। कटा हुआ है। साफ़ कटा हुआ।"
"मैंने ऐसा कुछ नहीं देखा।" उसकी आवाज़ तेज़ हो गई, जैसे कोई बात को जल्दी से ढकना चाहता हो। "भाई, मैंने ऐसा कुछ नहीं देखा। मेरी गाड़ी पलटी और मैं बेहोश हो गया। बस। इसके आगे मुझे कुछ नहीं पता।"
उसका भांजा चुपचाप पट्टी लपेटता रहा। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं, पर वो कुछ नहीं बोला।
मैंने बहस नहीं की।
मैं उठा, बल्लू का हाथ पकड़ा, और वो तीनों टुकड़े उसकी हथेली पर रख दिए। फिर उसकी उँगलियाँ बंद कर दीं, एक-एक करके, जैसे कोई बच्चे की मुट्ठी बंद करता है।
"अच्छा, फिर ये तार तेरे पास रहेगा।" मैंने उसके कान के पास धीरे से कहा। "जिस दिन याद आए, उस दिन लौटा देना। जल्दी नहीं है।"
बल्लू का चेहरा पीला पड़ गया। सच में पीला। जैसे किसी ने उसके चेहरे से खून का आख़िरी कतरा भी निचोड़ लिया हो।
वो कुछ देर बैठा रहा। उसका भांजा उठकर दूर चला गया, जैसे उसे पता था कि अब जो होगा, वो बड़ों का मामला है।
फिर बल्लू ने मेरी कलाई पकड़ी। उसकी पकड़ कमज़ोर थी, पर उसमें वो ज़िद थी जो डरे हुए आदमी में ही आती है।
"भाई, एक काम है।"
"बोल।"
"मेरा एक पुराना ड्राइवर है। बाईपास पर गाड़ी बंद करके खड़ा है, कल शाम से। उसका पुर्ज़ा मँगवाना था, मैं यहाँ पड़ा हूँ। तू ले जाएगा?"
"कहाँ से लेना है?"
"गाड़ी महल से। कबीर के वहाँ सब मिल जाता है। पैसे गाड़ी के काग़ज़ में बँधे हैं।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "और भाई, वो आदमी थोड़ा अजीब है। पुराना है। सत्तर के ऊपर। उससे ज़्यादा मत बोलना।"
मैं कुछ देर उसे देखता रहा।
फिर मैं समझ गया। बल्लू मुझे पुर्ज़ा नहीं दे रहा था। बल्लू मुझे परख रहा था। वो मुझे उस आदमी के पास भेज रहा था जिसके पास शायद कोई बात है। और वो देखना चाहता था कि मैं वहाँ पहुँचकर क्या करता हूँ।
बल्लू ने पुर्ज़े की पर्ची लिखी और मेरी जेब में डाल दी। फिर उसने कहा, "दो सौ तेरा।"
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