A Dark Secret55 / 299

A Dark Secret – Chapter 55

7 min read November 6, 2026

"मुझे कुछ नहीं पता।" उसकी आवाज़ थोड़ी नरम हुई। "मैं बस इतना जानता हूँ कि इस शहर में टायर खुद से नहीं कटते। नया टायर चार सौ अस्सी का पड़ेगा। असली माल। मेरे पास एक पुराना भी है, तीन सौ में, पर वो तीन महीने में फिर चलेगा।"

"नया लगा दो।"

"अभी?"

"अभी।"

"अच्छा।" वो हँसा। "भाई, एक बात पूछूँ?"

"पूछो।"

"ये कटा हुआ टायर है या तेरे आने का हिसाब?"

मैं हँस पड़ा। सच में हँसा। पहली बार उस सुबह मेरी हँसी निकली। "हिसाब तो अभी शुरू हुआ है, कबीर। बस शुरू हुआ है।"

"तो जल्दी आ जा। मैं दुकान खोल रहा हूँ। चाय मैं रखता हूँ, चीनी तू लाना।"

फोन कट गया।

मैंने रबर उठाया और गोद में रखा। फिर बैग से कॉपी निकाली और उस पन्ने पर एक लाइन लिखी — "सोलहवाँ दिन। रघुवीर का पिछला टायर कटा। तीन सीधे निशान। कोई जानने वाला। नाम नहीं मिटाऊँगा।"

मैंने कलम रखी और कॉपी बंद की।

कबीर की दुकान पर पहुँचा तो सात बजे थे। उसने दुकान खोल दी थी, चाय बनाई थी, और वो अपनी रुकी हुई घड़ी को सामने से हटाकर पीछे रख रहा था — जैसे कोई बार-बार देखी हुई तारीख़ से ऊब गया हो।

"टायर ले जा।" उसने एक तरफ़ इशारा किया। "चार सौ अस्सी। और सुन — तीन सौ अस्सी में एक और चीज़ है। मत ले, पर मैं बताता हूँ।"

"क्या?"

"तार काटने का प्लायर।" उसने अलमारी से एक पुराना लाल प्लायर निकाला। "किसी ने इसे चार दिन पहले मुझे बेच दिया। दो सौ का। मुझे उसकी आवाज़ पसंद आई थी।"

"किसकी आवाज़?"

"प्लायर की नहीं।" उसने मुझे देखा। "बेचने वाले की। वो बहुत धीमा बोल रहा था। और जब वो गया, उसने पीछे मुड़कर दो बार देखा। भाई, जो आदमी दो बार पीछे देखता है, वो कुछ बेचने नहीं आता, वो कुछ छोड़ने आता है।"

मैंने वो प्लायर हाथ में लिया। पुराना, धँसा हुआ, लाल रंग उतरा हुआ।

"ये रख लो।"

"पैसे?"

"पैसे बाद में।" मैंने जेब से कॉपी निकाली। "मुझे तीन सीधे निशान दिखे। तीन। कोई अजनबी तीन बार इतनी सफ़ाई से नहीं काटता।"

कबीर ने प्लायर वापस अलमारी में रखा। "तो कोई पहचान वाला है। और पहचान वाले तेरे अपने ही होते हैं, भाई। यही तो सबसे बड़ी मुसीबत है।"

मैं उसकी बात से सहमत था।

टायर बदला। पैसे दिए — चार सौ अस्सी, पूरे हिसाब से, किसी से उधार नहीं।

फिर मैं पुराने पुल की तरफ़ गया। मुझे रोज़ की तरह शाम नहीं रुकनी थी, पर आज मुझे अकेले बैठना था।

रास्ते में सूरज ढल रहा था। धूल में सुनहरा रंग आ गया और ट्रकों की लाइन सड़क पर साँप की तरह मुड़ रही थी।

पुल पर पहुँचा तो कोई नहीं था।

वो अकेला आदमी — जो रोज़ शाम यहाँ घुटने मोड़कर बैठा मिलता था — आज नहीं था।

मैंने एक तरफ़ बैठकर पापा की घड़ी देखी। पाँच मिनट आगे चल रही थी, हमेशा की तरह। मैंने घड़ी को कान से लगाया। टिक-टिक साफ़ सुनाई दे रही थी। मुझे लगा, अगर पापा कभी लौटे तो वो पहले यही घड़ी पहनेंगे, बस पाँच मिनट पीछे। क्योंकि उनके जाने के बाद शहर ने कभी घड़ी सही नहीं की।

मैंने फिर सोचा।

ढाबे पर एक ड्राइवर था। वो पान चबाता था, मोटी तोंद थी, और जब मोती के पलटने की बात चली तो उसने मुँह फेर लिया था। उसने कुछ कहा था — ब्रेक खुल गए थे — और फिर जैसे अपनी ही बात से डरकर पान का कटोरा नीचे रख दिया था।

मैंने तय किया कि सुबह सबसे पहले उसी को पकड़ूँगा।

पर सुबह मुझे पकड़ने की ज़रूरत नहीं पड़ी। सुबह खुद कोई और आया।

सुबह मुँह अंधेरे, पाँच बजे से पहले, मैं चारपाई पर पड़ा था। रघुवीर ठीक करके तिरपाल के नीचे खड़ी थी। धुंध थी, जैसे आसमान ने अपना मुँह धो रखा हो।

और फिर मुझे नंगे पाँवों की आवाज़ सुनाई दी, जो तेज़ी से आ रही थी।

जुगनू।

उसका घुटना फिर छिल गया था। वो हाँफ रहा था, हाथ में उसकी पुरानी पन्नी वाली थैली थी, और आँखें इतनी बड़ी कि जैसे वो कोई खज़ाना ढूँढ लाया हो।

"भैया!"

"क्या हुआ?"

"तार अभी भी कीचड़ में पड़ा है!"

मैं उठकर बैठ गया। "कौन सा तार?"

"वही वाला। मोती वाली जगह पर।" उसने फिर फुँफकारकर साँस ली। "बारिश आ रही है, भैया। कल रात मैं वहाँ गया था। तार अब भी वहीं है, मैंने देखा। और—"

वो रुका।

"और?"

"और काले धागे वाला आदमी वहाँ था।" उसकी आवाज़ और पतली हो गई। "वो पैर के निशान देख रहा था। नीचे झुककर। ऐसे।" उसने हाथ से इशारा किया।

मेरा पेट सख़्त हो गया।

"कालू? तूने उसे देखा?"

"उसने मुझे नहीं देखा। मैं नाली के पास वाले बोरे के पीछे छिप गया था। वो आधा घंटा वहीं रहा। कुछ ढूँढ रहा था। फिर उसने फोन निकाला और कहा — साहब, वो तार हमने नहीं लिया, वो तार हमें भी नहीं मिला।"

मैं खड़ा हो गया।

"ये उसने कहा?"

"हाँ भैया। ठीक इन्हीं शब्दों में। वो चले गए हैं, फिर मैंने देखा कि तार वहीं पड़ा है। भैया, बादल गरज रहे हैं।"

मैंने अपना औज़ार का बैग उठाया। बैग में कटा केबल था, रुमाल था, कॉपी थी। मैंने बैग कंधे पर टाँगा।

"चल। इस बार तार हम पहले निकालेंगे।"

जुगनू मेरे पीछे चला।

कुछ कदम चले और फिर वो धीरे से बोला — "पर भैया।"

"हाँ।"

"वो तार देखा तो मैंने एक और चीज़ भी देखी थी।"

मैं रुका।

"क्या?"

उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें पहले से भी ज़्यादा बड़ी थीं, जैसे वो मुझे कुछ ऐसा बताने वाला हो जिसका उसके पास कोई नाम नहीं।

"पुल के नीचे कोई रोज़ आकर एक कटोरी चाय छोड़ जाता है।"

मैंने सोचा, ये कोई छोटी बात है। बच्चा है, कुछ देख लेता है। मैंने कंधे उचकाए।

"तो?"

"तो आज उसमें चीनी नहीं थी, भैया।"

मैं वहीं खड़ा हो गया। पुल के नीचे। कटोरी। हर रोज़। चाय।

"राख थी।"

मेरे हाथ ठंडे हो गए। मैंने जुगनू की तरफ़ देखा। ये बच्चा ग्यारह बरस का था, नंगे पाँव, घुटने पर चोट, और ऐसी बात कह रहा था जिसके लिए रात-रात का इंतज़ार करना पड़ता है।

"तूने खुद देखा?"

"खुद देखा। आधा घंटा पहले। कटोरी अभी भी वहीं है। गरम है, भैया।" उसने अपनी हथेली दिखाई। "मैंने छुआ। गरम थी। जैसे अभी रखकर गया हो।"

मैंने बैग कसा और चल पड़ा।

रास्ते में मैंने पूछा — "उसमें कितनी राख थी?"

"आधा कटोरा। और भैया, एक बात और।" उसकी आवाज़ और पतली हो गई। "जब मैंने कटोरी उठाई, नीचे कुछ लिखा था।"

"क्या लिखा था?"

"मैं पढ़ नहीं सका। कोई नाम था। मैं तो बस इतना समझा कि टूटा-फूटा था, जैसे कोई पुरानी किताब से फाड़ा हुआ।"

मैंने चलते-चलते सोचा — पुल के नीचे हर रोज़ कोई चाय छोड़ जाता है। और आज चाय नहीं, राख थी।

किसी की याद में। या किसी को डराने के लिए। शहर में इन दोनों में फ़र्क़ करना मुश्किल हो जाता है, जब दोनों में खून एक ही हो।

हम गली से निकले। टोल का शोर पास आने लगा। जुगनू मेरे साथ-साथ चल रहा था, पर उसकी साँस अब भी तेज़ थी।

रास्ते में मुझे एक बात सूझी। मैंने कदम धीमे किए।

"जुगनू।"

"हाँ भैया।"

"रुक।"

"क्यों?"

"उस कटोरी को किसी और ने देखा? तेरे अलावा?"

वो सोचने लगा। "नहीं। मैंने तो किसी को नहीं बताया।"

"अच्छा। और वो तार — तूने किसी को बताया?"

"नहीं।"

"तो अच्छा ही किया।" मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा। "आज से नई आदत। जो देखो, पहले मुझे बताओ। किसी और को नहीं। चाचा को भी नहीं।"

वो कुछ देर मुझे देखता रहा। फिर उसने सिर हिलाया।

"भैया।"

"क्या?"

"चाचा से कुछ हुआ है क्या?"

मैंने कोई जवाब नहीं दिया।

वो फिर बोला — "क्योंकि कल रात मैंने उन्हें गैराज पर अपने आप से बात करते सुना था। वो कह रहे थे — भईया, तेरे बेटे ने वही काम शुरू कर दिया जो तूने किया था।"

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