A Dark Secret – Chapter 47
रुक्मा दीदी ने उस वक़्त हँसी — बड़ी हँसी। फिर अचानक चुप हो गई, जैसे हँसी भी किसी दरवाज़े से आई हो और किसी ने दरवाज़ा बंद कर दिया।
“बैठ,” उसने कहा। “क्या खाएगा?”
“दो थाली।”
वो रुकी। “दो?”
“हाँ।”
“तू दुबला है,” उसने कहा और थाली पकड़ा दिया, “इसलिए दो। पर पैसे एक थाली के लूँगी। बाक़ी एक मैं रघुवीर के हिसाब में डाल दूँगी।”
“दीदी, वो हिसाब कहाँ है?”
“मेरे पास,” उसने कहा, “सब हिसाब मेरे पास है। इन शहर के आधे आदमियों का उधार मेरी कॉपी में लिखा है और आधे का मैंने याद रखा है। काग़ज़ कभी नहीं जलाना चाहिए, बेटा। जो आदमी अपना काग़ज़ जलाता है, वो अपनी आवाज़ भी जला देता है।”
वो चली गई। उसकी कमर का चाबियों का गुच्छा बज रहा था — छन, छन, छन। मैं उस आवाज़ को सुनता रहा, क्योंकि वो किसी काग़ज़ की आवाज़ थी, फटे के किनारे की आवाज़ नहीं, पूरे पन्ने की।
मैं बेंच पर बैठ गया।
बेंच पर मेरे दोनों तरफ़ दो ड्राइवर बैठे थे। एक की तोंद थी, शर्ट पर पसीने की सफ़ेद लकीरें, और हाथ में पान का कटोरा। मैंने उसे पहचान लिया — यही तो गैराज पर मरून ट्रक लेकर आया था, वही जिसने मेरी ठीक की हुई क्लिप देखकर पूछा था, ये कहाँ से आया।
उसने मुझे देखा और उसका चेहरा खुल गया।
“अरे,” वो बोला, “ये तो वो कान वाला है।”
मैंने कहा, “कान वाला ही हूँ, भाई साहब। नाम अर्जुन है।”
“अर्जुन, अर्जुन!” उसने पान का कटोरा नीचे रखा, जैसे नाम याद आने पर कटोरा रखना ज़रूरी हो। “सुनाओ सबको। ये लड़का गैराज पर आया था, मेरी गाड़ी तीन महीने से खाँस रही थी। मैंने चार मैकेनिक बदले, कोई नहीं पकड़ा। और ये आया, मेरी गाड़ी के सामने खड़ा हुआ, आँख बंद की, और बोला — क्लिप ढीली है, और एक नट है जो तीन दिन में गिर जाएगा।”
बेंच पर बैठे आदमी हँसे।
“तीन दिन में?”
“तीन दिन में,” उसने कहा। “और तीसरे दिन गिर भी गया। मैं आज भी उसी नट को रुमाल में बाँधकर रखता हूँ।”
इस पर हँसी और बड़ी हुई। एक आदमी ने कटोरा मेरी तरफ़ बढ़ाया, “पी ले।”
“शुक्रिया, भाई साहब, मैं चाय वाला काम करता हूँ, चाय पीने वाला नहीं,” मैंने कहा।
वो ठहरा, फिर हँसा। “अच्छा जवाब है।”
रोटी आई। मैंने खाना शुरू किया। रुक्मा दीदी की रोटी में जो बात है, वो मैं बताऊँगा नहीं, क्योंकि कोई मुझ पर इल्ज़ाम लगा देगा कि मैं ढाबे की तारीफ़ करता हूँ। पर सच ये है कि जब मैंने पहला टुकड़ा मुँह में रखा, तो मुझे अपनी माँ का आँगन याद आया — और ये बात मैंने आज पहली बार महसूस की कि मुझे घर की याद इतनी नहीं आई जितनी आज आई।
ड्राइवर खुलते चले गए। यही तो बात है इस ढाबे की। आदमी यहाँ अपनी गाड़ी का नंबर बताने से पहले अपनी बीमारी बता देता है।
एक बुज़ुर्ग बैठे थे कोने में। सत्तर से ऊपर के थे, सफ़ेद अधूरी दाढ़ी, घुटनों में दर्द, और उनके कंधे पर एक बोरी टँगी थी जिसमें कुछ धातु खनक रही थी। वही थे जो गैराज के बाहर मुझे चेताने आए थे। वो चुप बैठे थे और रोटी के टुकड़े को बहुत धीरे चबा रहे थे, जैसे हर टुकड़ा एक हिसाब हो जो उन्हें चुकाना है।
पान वाले ड्राइवर ने रोटी के बीच से बात उठाई।
“भाई साहब की गाड़ियों में एक बात है,” उसने कहा, “डीज़ल कम, हवा ज़्यादा।”
मेरे हाथ में रोटी रुक गई। “कैसे?”
“उनका अपना पंप है, गोदाम के पीछे। वहाँ गाड़ी ले जाते हैं, नली लगाते हैं, और पहले टैंक में हवा डालते हैं। हवा डालेंगे तो मीटर दौड़ेगा। मीटर कहेगा तीन सौ लीटर गया, और टैंक में अक्सर आएगा दो सौ अस्सी। अठारह-बीस लीटर हवा का पैसा।”
“और गाड़ी?”
“गाड़ी वही करती है जो हवा करती है — साँस लेती है, पर पेट नहीं भरता। पहाड़ पर चढ़ते वक़्त पता चलता है कि तेल कम है।”
मैंने कहा, “इसकी परची मिलती है?”
उसने पान चबाया, फिर अपनी जेब से एक मुड़ी हुई काग़ज़ की परची निकाली — पंप की रसीद, जिस पर नीली स्याही से तीन सौ लीटर लिखा था और तारीख़ पुरानी थी।
“रख ले,” उसने कहा। “मेरे पास ऐसी चार हैं। मैंने एक बार काउंटर पर शिकायत की थी, पर अगली बार मेरी गाड़ी को लाइन में सबसे आख़िर में खड़ा किया गया। दो दिन लगे। दो दिन में डीज़ल भी गया और हाड़ भी।”
मैंने परची जेब में रखी। ये मेरे पास का नया काग़ज़ था, और मैंने उसे ऐसे रखा जैसे कोई चिकित्सक नाड़ी की परची रखता है।
फिर एक युवा ड्राइवर बोला — दुबला, छोटी दाढ़ी, हाथ में चम्मच पकड़े। “भाई, तुम कान वाले हो न? बता, मेरी गाड़ी क्या बोलती है?”
“मैंने कब सुना तेरी गाड़ी?”
“मेरी गाड़ी बाहर खड़ी है। तीसरी है, पीली।”
“तेरी गाड़ी का मफ़लर फटा है,” मैंने कहा, “और जब तू आया था, तब आख़िरी मोड़ पर ब्रेक मारा, उसमें एक चटकी आवाज़ थी। लगता है ब्रेक शू घिसा है। और तेरी गाड़ी के पिछले हिस्से में जो कंपन है, वो असंतुलित पहिये का है, लोड का नहीं।”
वो चुप बैठा रहा। फिर बोला, “तीन महीने से मैं वो चटकी आवाज़ सुन रहा था। गैराज वाला कहता था, कुछ नहीं है, चलाते रहो।”
“गैराज वाला तेरी गाड़ी के नीचे नहीं गया,” मैंने कहा। “उसने तेरी गाड़ी को देखा नहीं, तेरी बात सुनी है।”
हँसी फैल गई। पर एक आदमी नहीं हँसा। वही बुज़ुर्ग। उन्होंने बस मेरी तरफ़ देखा और सिर हिलाया, जैसे कोई हिसाब मिल गया हो।
फिर बात आगे बढ़ी। और बात जब आगे बढ़ी, तो काग़ज़ों की तरफ़ गई।
“अब सुनो,” पान वाले ने कहा, “नाके पर सबसे बड़ी बला क्या है? काग़ज़। हर चीज़ का काग़ज़। गाड़ी की, माल की, चालक की, बीमा की। और सबमें एक चीज़ कॉमन है।”
“क्या?”
“तारीख़।”
कुछ आदमी हँसे, कुछ चुप हुए।
“सत्ताईस,” उसने कहा। “नाके पर सत्ताईस को हर बार कुछ न कुछ होता है। कोई काग़ज़ गायब, कोई मुहर उल्टी, कोई रसीद जो काटी ही नहीं गई। मैं तेरह साल से यहाँ हूँ, मैंने देखा है — सत्ताईस का दिन इन लोगों का रखा हुआ दिन है।”
मेरी रोटी का टुकड़ा प्लेट में गिर गया।
“सत्ताईस को क्या होता है?” मैंने पूछा, आवाज़ नीची रखकर।
एक दूसरे ड्राइवर ने कहा, “मेरी गाड़ी का बीमा सत्ताईस तारीख़ को ही कटता है। दो बार मेरी गाड़ी के काग़ज़ में हादसा लिखा गया — और उस वक़्त मेरी गाड़ी कबाड़ बाज़ार के गैराज में खड़ी थी, मेरा इंजन खुला था। मैंने काग़ज़ दिखाकर झगड़ा किया, तो कहा, ग़लती हो गई, सुधार देंगे। सुधारा नहीं। पर अगले महीने मेरी गाड़ी को नाके पर रोका ही नहीं गया। पूरा महीना। और उस महीने मेरी कमाई दोगुनी हो गई।”
“तुझे रिश्वत दी गई,” मैंने कहा।
“मुझे रोककर नहीं दी गई, भाई। मुझे सिर्फ़ देखकर नहीं दी गई।” उसने मेरी तरफ़ देखा। “फ़र्क़ समझता है? पैसा देने से आदमी खरीदा जाता है, और न देने से भी आदमी खरीदा जाता है। दूसरे वाले में आदमी को पता भी नहीं चलता कि बिक गया।”
मैंने उसे देखा। उसकी आवाज़ में गुस्सा नहीं था, शर्म थी।
मैंने कहा, “तेरी गाड़ी का नंबर क्या है, भाई?”
“क्यों?”
“क्योंकि मैं उस तारीख़ को लिखकर रखूँगा, और जिस दिन काग़ज़ बाहर आएँगे, उस दिन तेरा नंबर भी उसमें आएगा।”
वो चुप हो गया।
पूरा ढाबा चुप हो गया।
बीस आदमियों की चुप्पी में सिर्फ़ चूल्हे की आग की फुसफुसाहट बची थी। मुझे लगा कि मैंने कुछ ज़्यादा कह दिया। मैं अभी नया हूँ, मेरी जेब में एक सौ सत्तर रुपये हैं, मेरी गाड़ी का नाम पापा का नाम है और उस नाम पर शहर में दो ही तरह के लोग हैं — जो डरकर चुप हैं और जो डरकर पूछते हैं कि ये नाम फिर क्यों उभरा।
पर पान वाले ने कटोरा उठाया और बोला, “इसकी बात सुनो। ये कान वाला है।”
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