A Dark Secret – Chapter 48
और माहौल फिर से खुल गया — पर इस बार कुछ बदलकर। अब वो लोग मुझसे बात कर रहे थे जैसे कोई पुराना हिसाब वाले आदमी से करता है। धीरे, नाम लिए बिना, तारीख़ लिए बिना, सिर्फ़ इशारों में।
कोई बोला, “सत्ताईस को काउंटर पर एक अलग रजिस्टर रहता है। लाल जेब वाला। उसे कोई छूता नहीं।”
दूसरा बोला, “मैंने एक बार देखा था, सुबह छह बजे, एक आदमी उस रजिस्टर को बंद कमरे में ले गया, और वापस लाकर दराज़ में रख दिया। दराज़ की चाबी किसी और की जेब में जाती है।”
तीसरा बोला, “मेरे मालिक की गाड़ी दो बार जल चुकी है। दोनों बार सत्ताईस को। दोनों बार बीमा के पैसे आए, और दोनों बार हमें एक-एक हज़ार मिला, चुप रहने के लिए। मैंने लिया।” उसने नीचे देखा। “मैंने लिया, भाई। अब बताऊँ तो गला घुटता है।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा और कुछ नहीं कहा। मेरे पास कहने को कुछ नहीं था। जिस आदमी ने अपनी चुप्पी का दाम लिया हो, उसे उपदेश नहीं दिया जाता। उसका दाम लेने वाला भी सामने बैठा होता है, किसी दिन।
इसी बीच मुझे रुक्मा दीदी की आवाज़ सुनाई दी। वो चूल्हे के पास खड़ी थी और किसी से कह रही थी, “रोटी पतली कर, मोटी नहीं। ये ड्राइवर हैं, काग़ज़ नहीं हैं।”
मैं मुस्कुराया।
और तभी बाहर सड़क पर एक गाड़ी गुज़री।
उसकी मफ़लर फटी थी। वो आवाज़ मैंने तुरंत पहचान ली — वो वही बोलेरो थी जो सुबह गोदाम के बाहर खड़ी थी, जिसमें बैठे आदमी ने चश्मा उतारकर घुमाया था।
मेरा हाथ रुक गया।
मैं उठकर दरवाज़े तक गया और बाहर झाँका। सड़क खाली थी। बस धूल थी जो अभी बैठी नहीं थी, और दूर टोल की लाइटें।
मैं वापस आकर बैठा।
“वो गाड़ी रोज़ आती है?” मैंने पूछा।
पान वाले ने कंधा उचकाया। “कौन सी?”
“फटी मफ़लर वाली बोलेरो।”
वो सोचने लगा। फिर बोला, “रोज़ तो नहीं, पर हाँ… शाम को अक्सर। सात से आठ के बीच। हम सब खाने बैठते हैं, वो निकल जाती है। एक बार मैंने हाथ उठाया चाय के लिए, तो रुकी नहीं।”
“कौन बैठता है उसमें?”
“कोई चश्मे वाला। और एक आदमी जो हाथ में छोटा लोहा घुमाता रहता है।”
मैंने कटोरा उठाया और चाय पी। पर मन में मैंने एक और चीज़ लिख ली — सात से आठ। हर शाम। सड़क। और वो गोदाम की तरफ़ से आती है, काँच की इमारत की तरफ़ जाती है।
उसी वक़्त उस युवा ड्राइवर ने, जो पहले मुझसे अपनी गाड़ी पूछ रहा था, अपनी जेब से एक पुरानी चीज़ निकाली — एक टूटा हुआ प्लास्टिक का कार्ड, जिस पर तारीख़ और गाड़ी का नंबर लिखा था।
“ये देख,” उसने कहा। “ये मेरी पहली गाड़ी का पास है। पुराना है। मैंने रखा हुआ है।”
“क्यों रखा?”
“क्योंकि उस दिन मैंने पहली बार अपना नाम काग़ज़ पर लिखा था,” उसने कहा। “मुझे लगा था, अब मैं ड्राइवर बन गया।” वो हँसा। “ड्राइवर तो मैं तभी बन गया था जब पहली बार पहाड़ पर बिना ब्रेक के उतरा था। काग़ज़ कुछ नहीं करता। पर फिर भी रखा है।”
मैंने उसे देखा। मुझे अपनी कलाई की घड़ी याद आई — जो पाँच मिनट आगे चलती है, जिसे मैंने आज तक ठीक नहीं करवाया। कुछ चीज़ें ठीक नहीं करवाई जातीं। कुछ चीज़ें ठीक हो जाएँ तो आदमी भूल जाता है कि वो किसकी थीं।
फिर वही बात हुई जो होनी थी।
बात सत्ताईस पर आई थी और वहीं अटक गई थी।
एक ड्राइवर ने कहा, “और कल सत्ताईस है।”
मैंने कहा, “कल?”
“हाँ। कल सत्ताईस है। इसीलिए मैं आज सबसे कह रहा हूँ, कल नाके पर ज़्यादा देर मत रुकना। काग़ज़ पहले करा लेना, सुबह। शाम को नहीं।”
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला और पापा की रसीद छुई — वही सताईस सितंबर की रसीद, दस साल पुरानी, जिस पर रघुवीर यादव के हस्ताक्षर थे और जो मुझे पीले ट्रक के काले लोहे के डिब्बे में मिली थी।
और उसी पल——
हँसी बंद हो गई।
रुक्मा दीदी की हँसी। पूरी तरह। जैसे किसी ने हँसी का बटन दबा दिया हो।
मैंने पलटकर देखा। वो चूल्हे के पास खड़ी थी, कड़छी हाथ में, और उसका चेहरा अभी भी वैसा ही था जैसा हँसते वक़्त होता है — पर आँखें नहीं। आँखें कहीं और थीं। आँखें ढाबे के बाहर, उस पुराने पुल की तरफ़ गई थीं जो ढाबे से आगे, सड़क छोड़कर, सूखी नदी के ऊपर पड़ा है और जिस पर रोज़ शाम को कोई एक आदमी अकेला बैठता है।
बस एक पल। फिर वो चूल्हे की तरफ़ मुँह करके बर्तन खड़काने लगी — खड़, खड़, खड़। ज़ोर से। ज़रूरत से ज़्यादा ज़ोर से।
ढाबे में बैठे ड्राइवरों ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा और बात बदल दी। कोई बोला, “कल का तेल भरवा लेना।” कोई बोला, “मेरी गाड़ी की बत्ती जलती नहीं।”
सब जानते थे कि बात बदलनी है। सब जानते थे कि कौन सी बात नहीं लेनी।
मैं चुपचाप रोटी खाता रहा।
पर मेरे अंदर एक आवाज़ बज रही थी, और वो आवाज़ मेरी नहीं थी, वो उस बर्तन की थी। जब कोई औरत हँसते-हँसते अचानक चूल्हे की तरफ़ मुँह फेरकर बर्तन खड़काने लगे, तो मतलब वो अपने हाथ व्यस्त कर रही है ताकि उसकी आवाज़ कुछ और न कहे।
मैंने अपनी थाली खत्म की और कटोरा खाली किया।
रुक्मा दीदी आई, कटोरा लेने।
मैंने कहा, “दीदी, पैसे बल्लू भाई के हिसाब में——”
“डाल दिए,” उसने कहा। “वो फोन कर चुका है। बोला, दो थाली का लिख लेना। मैंने कहा, एक का लिखा है। उसने कहा, बेटा है तेरा, दो का लिख।”
मैं हँसा।
वो कटोरा भरने लगी — मेरे लिए चाय, बिना माँगे, जैसे हर बार करती है।
और कटोरा भरते वक़्त, मेरी तरफ़ देखे बिना, बर्तन से चाय उँडेलते हुए, उसने कहा——
“बेटा।”
“हाँ, दीदी।”
“सत्ताईस का नाम मेरे ढाबे पर मत लेना।”
मैं ठिठक गया।
उसकी आवाज़ में वो कंपन थी जो मैंने पहली बार उस औरत में सुनी थी। मैंने उसकी हँसी सुनी थी, उसकी डाँट सुनी थी, उसका हुक्म सुना था — पर ये कंपन नया था।
और मैं जानता हूँ कंपन। मैंने इस शहर में बहुत कंपन सुने हैं। झूठ बोलते वक़्त आदमी की आवाज़ ऊपर जाती है, फिसलती है, फटती है। पर ये कंपन ऐसा नहीं था। ये वो कंपन था जो मैंने अपनी अम्मा की आवाज़ में सुना था, जिस दिन पापा की लाश आई थी — जब वो किसी से कुछ नहीं कह रही थी, बस चूल्हा जला रही थी और उसके हाथ काँप रहे थे।
ये झूठ का कंपन नहीं था।
ये डर का था।
मैंने कटोरा पकड़ा। चाय गरम थी, और मेरी हथेली जल गई, पर मैंने कटोरा नहीं छोड़ा।
“दीदी,” मैंने धीरे से कहा, “आप——”
“चाय पी,” उसने कहा। “और सुन।”
“हाँ।”
“ये शहर काग़ज़ों का है, बेटा। तू काग़ज़ ढूँढता फिरता है, मुझे पता है।” उसने पहली बार मेरी तरफ़ देखा। “पर एक बात याद रख। जो काग़ज़ किसी की जान से बना हो, वो काग़ज़ कभी अकेला नहीं आता। उसके पीछे एक आदमी आता है। और वो आदमी तेरे जितना ही भूखा होता है।”
मैंने कुछ नहीं कहा।
वो चली गई। चाबियों का गुच्छा बज रहा था — छन, छन, छन।
पर इस बार वो आवाज़ मुझे काग़ज़ जैसी नहीं लगी।
इस बार वो आवाज़ मुझे किसी के जेब में बंद चाबियों जैसी लगी, जो किसी ताले को नहीं, किसी दरवाज़े को याद कर रही थीं।
मैंने चाय खत्म की और उठा।
बाहर आकर मैंने एक बार उस पुराने पुल की तरफ़ देखा।
वहाँ कोई बैठा था। अंधेरा था, दूरी थी, पर आदमी की शक्ल बन रही थी — घुटने मोड़कर, दोनों हाथों पर झुका हुआ, सामने सूखी नदी और ऊपर आसमान।
मैंने रघुवीर का दरवाज़ा खोला और बैठ गया।
इंजन चालू किया। रघुवीर की आवाज़ साफ़ थी, पर मेरे अंदर की आवाज़ साफ़ नहीं थी।
मेरे पास अब एक और चीज़ थी जो पहले नहीं थी — एक औरत का डर, जो बीस ड्राइवरों के सामने नहीं खुला, पर मेरे सामने एक लाइन में खुल गया।
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