A Dark Secret41 / 536

A Dark Secret – Chapter 41

7 min read November 6, 2026

बल्लू ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें लाल थीं, और मैं नहीं जानता कि पान से या रात भर जागने से।

"उसे ठीक कर दे। ठीक से कर दे, जैसे तू अपनी गाड़ी करता है।" वो रुका। "और एक चीज़ है।"

"बोलो।"

"एक डिब्बा है। बंद, सील लगा हुआ। मेरे पास रखा है। मुझे उसे गोदाम तक पहुँचाना था, पर मेरे पैर की हालत देख। और मेरे पीछे दो आदमी लगे हुए हैं। वो मुझे बस ढाबे तक आने देते हैं। अगर मैं वो डिब्बा लेकर गया, तो रास्ते में कुछ हो जाएगा।"

"तुम्हें कैसे पता कि रास्ते में कुछ होगा?"

उसने कुछ देर सोचा। फिर बोला, "पता नहीं। बस लगता है। जिस आदमी ने मुझे ये डिब्बा दिया, उसकी आवाज़ मीठी थी। बहुत मीठी।"

मेरे हाथ ठंडे हो गए।

"कैसी मीठी?"

"ऐसी जैसे कोई बच्चे से बात कर रहा हो। और उसने मुझे 'बेटा' कहकर बुलाया।"

मैंने साँस ली।

शहर में एक ही आदमी है जो हर किसी को बेटा कहता है। और मैं उससे दो दिन पहले मिल चुका हूँ — गोदाम के पीछे वाले कमरे के दरवाज़े पर, जहाँ से आवाज़ आई थी, अभी मेहमान है।

"डिब्बे में क्या है?" मैंने पूछा।

"मैंने नहीं खोला।"

"क्यों नहीं?"

"क्योंकि बंद चीज़ खोलने वाले को सब जानते हैं।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "मैं जाना नहीं चाहता। पर अब तू जाएगा।"

"मैं डिब्बा नहीं खोलूँगा।"

"तू खोलेगा।" उसने कहा, बिल्कुल सपाट आवाज़ में। "तू खोलेगा, क्योंकि तुझमें वो बीमारी है जो तेरे पापा में थी। और इसीलिए मैं तुझे ये काम दे रहा हूँ, किसी और को नहीं।"

मैं कुछ देर चुप बैठा रहा। फिर मैंने पूछा, "पैसे कितने?"

"बहुत कम।" उसने अपनी जेब से एक पुराना बटुआ निकाला, जो चमड़े का था और जिसके कोने चबे हुए लग रहे थे। "पूरा काम सात सौ। अभी मैं तुझे तीन सौ दे रहा हूँ। बाक़ी चार सौ जब डिब्बा गोदाम पहुँच जाएगा।"

तीन सौ।

मैंने सोचा। मेरे पास एक सौ सत्तर थे। चाचा को किराए के नाम पर कुछ देना था, और ट्रक के लिए कबीर को डेढ़ सौ हर हफ़्ते देने थे।

"कम है," मैंने कहा।

"बहुत कम है।" उसने तीन नोट मेरी तरफ़ बढ़ाए। "मेरे पास इससे ज़्यादा सच में नहीं है। और अगर मेरी मोती वापस आ जाए, तो तू मुझसे कभी भी माँग लेना।"

मैंने नोट लिए। उनमें से एक नोट गीला था। मैंने उसे नहीं पूछा कि क्यों।

तभी मुझे कुछ सुनाई दिया।

दूर, ढाबे के सामने वाली सड़क पर, एक गाड़ी रुकी। दरवाज़ा खुला। फिर बंद हुआ। फिर पैरों की आवाज़ — दो लोग, दोनों के जूते अलग। एक के जूते की एड़ी घिसी हुई थी, इसलिए उसकी आवाज़ में एक छोटी सी सरकन थी। दूसरा भारी था, पर वो धीरे चल रहा था, जैसे किसी को जगाना नहीं चाहता।

फिर आवाज़ आई, काफ़ी दूर से, पर साफ़।

"दो चाय। एक बिना चीनी की।"

और रुक्मा दीदी की आवाज़, जो हमेशा जवाब देती है भले ही सवाल उससे न हो, "बिना चीनी की कोई नहीं पीता, फिर भी तीन लोग माँगते हैं।"

मैं उठ गया।

"कौन?" बल्लू ने पूछा। उसकी आवाज़ में डर लौट आया था।

"पता नहीं।" मैंने रुमाल जेब में डाला। "पर एक बात तय है। कोई मुझे ढूँढ रहा है। और वो चाय पीने में जल्दबाज़ी नहीं कर रहा।"

"तो तू पीछे से निकल जा।"

"नहीं।" मैंने उसकी तरफ़ देखा। "मैं ढाबे के सामने से निकलूँगा। चाय पीने वाले को जब पता चले कि मैं यहाँ था, तो वो अपनी चाय छोड़कर भागेगा। और भागते आदमी की आवाज़ सबसे ज़्यादा बोलती है।"

बल्लू मुझे देखता रहा। फिर उसने धीरे से कहा, "तू पागल है।"

"मेरे पापा भी यही बोलते थे।"

"वो भी पागल थे?"

"शायद।" मैंने कंधा उचकाया। "पर उनके पास एक रजिस्टर था। पागल आदमी रजिस्टर नहीं रखता।"

बल्लू का चेहरा सख्त हो गया। "कौन सा रजिस्टर?"

मैंने जवाब नहीं दिया। मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा और कहा, "डिब्बा कहाँ है?"

"पीछे। मेरे कमरे में।" उसने सिर हिलाया। "चारपाई के नीचे, जूट में लिपटा।"

"कुंजी?"

"नहीं है। सील लगी है।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "और अर्जुन, एक बात।"

"बोलो।"

"अगर तू इसे खोलेगा, तो खोलने से पहले सोच लेना। क्योंकि जो चीज़ सील में बंद है, वो जब खुलती है तो सिर्फ़ अंदर वाला नहीं दिखता। बाहर वाला भी दिखने लगता है।"

मैं हँसा। "भाई, तुम्हारी बातें तो चाचा की तरह लगने लगी हैं।"

"मैं चालीस साल गाड़ी चला हूँ।" उसने कहा। "चाचा की बातें नहीं करता।"

मैं ढाबे के सामने से निकला।

दो आदमी एक कोने की मेज़ पर बैठे थे। एक के हाथ में मोटी सी फाइल थी, जिसके नीचे कुछ पीला दिख रहा था — मुड़ा हुआ काग़ज़। दूसरा आदमी दीवार की तरफ़ मुँह करके बैठा था और उसके हाथ में एक छोटा लोहा था जिसे वो उँगलियों में घुमा रहा था।

मैंने उनकी तरफ़ नहीं देखा। मैंने सीधे अपनी गाड़ी की तरफ़ चलना शुरू किया।

और जैसे ही मैंने रघुवीर का दरवाज़ा खोला, मेरे पीछे से आवाज़ आई।

"ओ भाई।"

मैं रुका, पर पलटा नहीं।

"वो पीली गाड़ी तेरी है?"

मैं पलटा।

फाइल वाला आदमी मुस्कुरा रहा था। उसकी मुस्कान में कुछ भी नहीं था — न धमकी, न दोस्ती। बस मुस्कान थी, जैसे कोई ऊपर से चिपका दे।

"हाँ," मैंने कहा। "मेरी है।"

"अच्छी है।" उसने फाइल बंद की। "पुरानी है पर अच्छी है। कहाँ से ली?"

"कबाड़ से।"

"कबाड़ से अच्छी गाड़ी?" उसने सिर हिलाया। "लोग कहते हैं कबाड़ में कुछ नहीं मिलता।"

"लोग झूठ बोलते हैं।"

वो हँसा। एक छोटी सी हँसी, जैसे किसी ने दरवाज़ा बंद किया हो।

"सुन भाई, एक बात पूछूँ?"

"पूछो।"

"ये जो तूने गाड़ी के आगे नाम लिखा है। रघुवीर।" उसने फाइल फिर खोली और उसके पन्नों को बिना देखे उलटने लगा। "ये कौन है?"

मेरे भीतर कुछ हिला।

पर मैंने आवाज़ नीची रखी। पापा कहते थे, जब गुस्सा आए तो आवाज़ नीची कर लेना, क्योंकि ऊँची आवाज़ वाला आदमी लड़ता है और नीची आवाज़ वाला सोचता है।

"मेरे पापा का नाम था।"

"अच्छा।" उसने फाइल बंद की और मेरी तरफ़ देखा। "और वो अब नहीं हैं?"

"नहीं हैं।"

"सॉरी।"

"कोई बात नहीं।"

वो उठा। उसने अपनी जेब से पैसे निकाले और मेज़ पर रखे। फिर वो मेरे पास आया, इतना पास कि मैं उसके कपड़ों से साबुन की महक सुन सकता था — अजीब बात है, पर मैं महक भी सुनता हूँ। कुछ महकें शोर होती हैं और कुछ महकें आवाज़।

उसकी महक शोर थी।

"एक बात याद रख," उसने धीरे से कहा। "पुरानी गाड़ियों पर पुराने नाम ठीक नहीं लगते। उनके ऊपर पुरानी बातें चिपक जाती हैं। और पुरानी बातें उतारने का एक ही तरीका है।"

"क्या?"

"गाड़ी बदल दो।"

मैं मुस्कुराया। "भाई साहब, मेरी गाड़ी बदलने से पहले मेरी जेब बदलनी पड़ेगी।"

वो हँसा और चला गया। उसका साथी भी उठा। उसने अपना छोटा लोहा जेब में डाला और जाते-जाते एक बार मेरी तरफ़ देखा।

मैंने उसकी आवाज़ याद रखी।

मैंने उनकी गाड़ी की आवाज़ याद रखी। वो एक बोलेरो थी, फटे मफ़लर वाली। जब वो स्टार्ट हुई, तो उसका मफ़लर वैसे ही फटा-फटा बोला, जैसे कोई बूढ़ा आदमी खाँसते-खाँसते रुक जाए।

फटा मफ़लर वाली बोलेरो।

मैंने गाड़ी में बैठकर दरवाज़ा बंद किया और एक पल स्टेयरिंग पर सिर टिका दिया।

मुझे जुगनू की बात याद आई। पंद्रह गाड़ियाँ, तीन बिना रसीद, फटे मफ़लर वाली बोलेरो चार बजकर दस मिनट पर, टोल के बगल में रुकी एक गाड़ी जिसमें काले धागे वाला था।

अब बोलेरो वाला मेरा नाम भी जानता था।

मैंने चाबी घुमाई।

रघुवीर गरजा, और उसकी गरज में मुझे आज एक नई चीज़ सुनाई दी — वो अपनी पुरानी आवाज़ से थोड़ा और साफ़ बोल रहा था, जैसे उसे भी कुछ बताना हो।

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho