A Dark Secret – Chapter 40
मैं हँस पड़ा। दो दिन में पहली बार मेरी हँसी सच्ची निकली।
"तू अक्लमंद है, जुगनू।"
"माँ कहती है ज़्यादा अक्लमंद लड़के बड़े होकर पकड़े जाते हैं।"
"तो तू कम अक्लमंद बन।"
"फिर काम कौन करेगा?"
मैंने उसकी जेब में बीस रुपये डाले। उसने निकालकर वापस करने की कोशिश की, फिर रुक गया, और बोला, "माँ के लिए चायपत्ती ले लूँगा।"
"ले ले।"
वो भागा, और उसके भागने की आवाज़ भी पतली थी — टप, टप, टप, जैसे बारिश की बूँदें पीतल की परात पर।
मैंने एक बार फिर उस जगह को देखा जहाँ झाड़ू चली थी। मिट्टी सच में समतल थी। बाकी जगह पर क्रेन के निशान गहरे थे, पर यहाँ सब कुछ साफ़। जैसे किसी ने कहा हो — यहाँ कुछ नहीं था, और यहाँ कुछ नहीं है।
मैं रघुवीर के पास लौटा। दरवाज़ा खोला, अंदर सीट के नीचे हाथ डाला और काला लोहे का डिब्बा बाहर निकाला।
उसमें पापा की रसीद थी। दस साल पुरानी, सताईस सितंबर की। और काली जिल्द वाली वो डायरी थी जिसे खोलने की हिम्मत मैं अभी तक नहीं कर पाया था।
और महेंद्र चाचा के नाम पर एक लाख पचास हज़ार की लिपटी पर्ची।
मैंने रुमाल में लिपटा केबल का टुकड़ा उसी डिब्बे में रखा, ऊपर से पापा की रसीद डाली, डिब्बा बंद किया और सीट के नीचे धकेल दिया।
फिर मैंने हाथ पोंछे और गाड़ी चालू की।
उस दिन रघुवीर की आवाज़ में कुछ था। मैं ये नहीं कहूँगा कि वो गुस्सा था या दुख। पर जब मैंने गियर डाला, तो इंजन ने एक छोटी सी गरारी छोड़ी, जैसे कोई बूढ़ा आदमी कह रहा हो — देख लिया न, मैंने कहा था।
ढाबा सुबह के नौ बजे खुलता है, पर रुक्मा दीदी की चूल्हा उससे पहले जल जाती है। जब मैं पहुँचा तो चार बजे की तरह धुआँ उठ रहा था, हालाँकि नौ बजे थे। दीदी उसी तरह बैठी थीं जैसे कोई पहाड़ बैठा हो — भरी हुई, कमर पर चाबियों का गुच्छा, और हाथ में इतनी तेज़ी से चलती हुई कड़छी जैसे वो किसी से झगड़ा कर रही हों।
"अर्जुन।"
"दीदी।"
"हाथ धो ले।"
मैंने हाथ देखे। उन पर कीचड़ सूख रहा था, और नाखूनों के नीचे काला भरा था।
"कीचड़ में क्या ढूँढता रहा?" उन्होंने बिना रुके पूछा।
"कुछ गिरा था।"
"जो गिरकर कीचड़ में जाता है, वो कभी नहीं मिलता। वो कीचड़ का हो जाता है।"
उन्होंने मेरी तरफ़ नहीं देखा। पर उनकी आवाज़ में वो बात थी, जो लोग बहुत सोचकर बोलते हैं।
"बैठ," उन्होंने कहा।
मैं बैठा। उन्होंने चाय का मिट्टी का कटोरा रखा — ठंडी चाय नहीं, गरम, और उसमें अदरक इतनी कि गला जल जाए।
मैंने जेब में हाथ डाला।
"पैसे रख," उन्होंने कड़छी हवा में रोक दी। "रघुवीर का बेटा मेरे ढाबे पर चाय के पैसे देगा, तो मेरा चूल्हा शर्मिंदा हो जाएगा।"
"दीदी, मैं—"
"जब तेरा अपना ढाबा हो जाए, तब ले लूँगी।" उन्होंने आँख उठाकर देखा। "उस दिन सबको मुफ़्त चाय पिलाना, मेरे हिसाब से।"
मैं हँसा। "और मेरा हिसाब क्या कहेगा?"
"तेरा हिसाब तेरे पापा ने पहले ही बिगाड़ दिया है। तू सिर्फ़ उसे सीधा कर रहा है।"
फिर वो चूल्हे पर झुक गईं और उन्होंने आगे कुछ नहीं पूछा। मुझे लगा कि वो जानती हैं। मुझे लगा कि जब मैं ढाबे के पीछे की तरफ़ गया, तो उन्होंने मेरी पीठ देखी और कुछ नहीं कहा, सिर्फ़ कड़छी थोड़ी ज़ोर से बजाई।
बल्लू पीछे वाली चारपाई पर लेटा था।
बल्लू? नहीं, वो नहीं लेटा था। वो बैठा था, और बैठा भी टेढ़ा था। दाईं टाँग सीधी करके, बाईं टाँग मोड़कर, और बाईं एड़ी पर पुरानी सफ़ेद पट्टी बँधी हुई थी, जिस पर अब पीले धब्बे पड़ चुके थे। मुँह में पान था। पास में एक टिन का डिब्बा रखा था जिसमें थूकने की जगह थी, पर उसने उसमें नहीं थूका। वो बस पान चबा रहा था, धीरे-धीरे, जैसे वक़्त काट रहा हो।
उसने मुझे देखा और कुछ नहीं कहा।
"बल्लू भाई।"
"बैठ जा।"
मैं उसके सामने वाले स्टूल पर बैठा।
"पैर कैसा है?"
"पैर ठीक है।" उसने पान की तरफ़ देखा। "अंदर की हड्डी टूटी है, वो अलग बात है।"
हम दोनों चुप बैठे रहे। पीछे रुक्मा दीदी की कड़छी बज रही थी, और दूर टोल पर एक ट्रक लगातार हॉर्न बजा रहा था, जैसे किसी को बुला रहा हो जो कभी नहीं आएगा।
फिर मैंने रुमाल निकाला।
मैंने उसे उसके सामने चारपाई पर रखा और रुमाल खोला।
बल्लू ने देखा।
और एक पल में उसका चेहरा बदल गया।
उसने मुँह फेर लिया। पहले उसने पान चबाना रोका, फिर उसने टिन के डिब्बे की तरफ़ हाथ बढ़ाया, फिर हाथ रोक दिया।
"ये किसी और गाड़ी का है," उसने कहा।
मैंने कुछ नहीं कहा।
"मेरी मोती का नहीं है। मोती की केबल मोटी थी। ये पतली है। ये किसी छोटी गाड़ी का है, किसी पिकअप का।"
उसकी आवाज़ पतली हो गई थी।
मैंने आँख बंद की और सुना।
अगर कोई झूठ बोलता है, तो उसकी आवाज़ में एक हल्की सी कंपन आती है, जैसे तार पर हवा चल रही हो। बल्लू की आवाज़ में वो कंपन नहीं थी।
उसकी आवाज़ में सिर्फ़ डर था। और डर की आवाज़ झूठ से अलग होती है — डर में आदमी शब्द कम कर देता है, वाक्य छोटे कर देता है, और साँस बीच में लेता है।
"बल्लू भाई," मैंने कहा, "तुम्हारी आवाज़ कह रही है कि तुम डर रहे हो। झूठ नहीं बोल रहे। इसलिए मैं आज कुछ नहीं पूछूँगा।"
उसने मेरी तरफ़ देखा। तीन दिन में पहली बार उसने मुझे पूरा देखा, आँख से आँख।
"तू सच में सुनता है?"
"हाँ।"
"क्या सुनता है?"
"जो बोला जाता है। और थोड़ा सा जो नहीं बोला जाता।"
वो बैठा रहा। फिर उसने टिन का ढक्कन खोला, उसमें थूका, ढक्कन बंद किया, और अपने हाथ अपने घुटनों पर रख दिए।
"मेरी मोती," उसने कहा, "मेरे पास है या नहीं, मुझे भी नहीं पता। काग़ज़ पर है। देवा के काग़ज़ में।" उसने रुककर साँस ली। "मोती के बिना मैं आदमी नहीं रहा। सिर्फ़ काग़ज़ रह गया हूँ। और जो सिर्फ़ काग़ज़ रह जाए, उससे कोई नहीं डरता। इसलिए उन्होंने मेरी गाड़ी पलट दी और मुझे बैठाकर ये काग़ज़ थमा दिया — जो देखा, भूल ज।"
"और तुम भूल गए?"
"मैं भूलने की कोशिश कर रहा हूँ। पर ये फ़ोन… ये फ़ोन मेरे साथ भूलता नहीं।" उसने सिर हिलाया। "जब भी लिफ़ाफ़ा खोलता हूँ, मुझे लगता है कि मैंने किसी की जान बचाई थी कि मैंने किसी से जान छुड़ाई थी। समझ में नहीं आता।"
मैंने कुछ नहीं कहा। मैंने वो लिफ़ाफ़ा याद किया — भूरा, पाँच हज़ार पुराने नोट, और पर्ची — जो देखा, भूल ज।
"मैंने तुमसे कहा था," मैंने धीरे से कहा, "उसे अपनी जेब में ढाल बनाकर रखो।"
"मैंने रख लिया है।" उसने एक छोटी सी मुस्कान दी जो दुख जैसी दिखी। "अजीब ढाल है। नोटों की।"
"सबसे काम की ढाल होती है।"
वो थोड़ा हँसा। फिर उसकी हँसी मुरझा गई।
"अर्जुन, मैं तुझे कुछ कहना चाहता हूँ।"
"कहो।"
"मेरी बहन नहीं है। छोटी बहन मर गई, दस साल पहले। पर उसका एक लड़का है। मेरा भांजा। सत्रह बरस का।" उसने उँगली उठाई। "वो मेरे पास रहता है। मैं उसे पढ़ा नहीं पाया, तो उसने गाड़ी चलाना सीख लिया। छोटी गाड़ी है, माल ढोता है। उसके पापा जबसे गए, ये लड़का रात भर सोता नहीं, रात भर सड़क पर रहता है। मुझे लगता है वो मुझसे ज़्यादा डरता है। और इसी डर में उसने गाड़ी की ब्रेक और क्लच ऐसे कर ली हैं कि आज नहीं तो कल वो किसी खड्डे में मिलेगा।"
मैं सीधा हो गया। "कहाँ है?"
"गाड़ी महल के पीछे, पुराने टायर वाली जगह के बगल में खड़ी है। लाल रंग की, छोटी, पीछे लोहे का फ्रेम लगा है।"
"और मुझे क्या करना है?"
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