A Dark Secret – Chapter 39
"चाहे कुछ भी हो जाए।"
गियर दाखिल हुआ और रघुवीर आगे बढ़ा। मैंने स्टेयरिंग पर हाथ रखा, और उसके कंपन को कोहनी तक आते महसूस किया। इंजन अब भी बोल रहा था, पर आज उसकी आवाज़ में वो खाँसी नहीं थी। अब वो एक लय में चल रहा था, जैसे कोई बूढ़ा आदमी सीढ़ी चढ़ते हुए गिनती कर रहा हो — एक, दो, एक, दो।
सड़क किनारे धूल बैठी थी। सुबह के सात बजे भी ट्रांसपोर्ट नगरी में धूल सोई नहीं थी। दूर कहीं एक ट्रक का हॉर्न बजा, फिर दूसरा, फिर तीसरा — जैसे कोई तीन भाई बारी-बारी से खाँस रहे हों।
मुझे घर नहीं जाना था।
मुझे उस मोड़ पर जाना था जहाँ मोती पलटा था।
और ये बात मैंने सोची नहीं थी। ये मेरे हाथों ने तय की। जब मैं टोल से निकला, तो स्टेयरिंग खुद उस तरफ़ मुड़ गया, जिधर कंधा बस्ती नहीं थी।
रघुवीर शहर के बाहर की तरफ़ चलता रहा। दस मिनट, पंद्रह मिनट। सड़क के दोनों तरफ़ खाली मैदान, कुछ टूटी बाउंड्री, एक अधूरी इमारत जिस पर कोई काम करने वाला नहीं था। और फिर वो मोड़ आया — जहाँ सड़क अचानक दाईं तरफ़ झुकती थी, जैसे किसी ने ग़लती से खींच दी हो।
मैंने गाड़ी रोकी।
ब्रेक दबाने पर पैडल के नीचे से एक छोटी सी चीं-चीं आई। मैंने मन में निशान लगाया — कल ये ठीक करनी है।
मैं उतरा।
मोड़ के बाहर, सड़क से नीचे, वो जगह थी।
अब वहाँ भीड़ नहीं थी। अब वहाँ कुछ भी नहीं था। सिर्फ़ क्रेन के निशान थे — कीचड़ में गहरे, चौड़े, जैसे किसी बड़े जानवर ने अपने पंजे गाड़कर खींच लिए हों। मिट्टी सूख रही थी, पर नीचे अब भी गीली थी। कुछ दूर एक टूटी बाउंड्री के पास गीला कचरा पड़ा था — सड़ी सब्ज़ी के छिलके, एक प्लास्टिक की थैली, एक टूटी चप्पल।
और नाली।
हादसे वाली जगह के ठीक बगल से एक खुली नाली बह रही थी। पानी का रंग भूरा था और उसमें तेल की एक पतली परत तैर रही थी, जो सूरज की रोशनी में इंद्रधनुष जैसी दिख रही थी।
मैं वहीं खड़ा रह गया।
दो दिन पहले मैं यहाँ भीड़ में फँसा था। कोई धक्का दे रहा था, कोई चिल्ला रहा था, क्रेन की चेन चरमरा रही थी, और इंस्पेक्टर तिवारी मेरे कंधे पर हाथ रखकर कह रहे थे — काग़ज़ पर सब लिखा है बेटा।
आज यहाँ एक मक्खी भी नहीं थी।
बस नाली बह रही थी, और उसका बहना एक ही सुर में था — लगातार, बिना रुके, जैसे कोई बूढ़ी औरत गुनगुना रही हो।
मैंने जेब से रुमाल निकाला। वो तेल में डूबा हुआ रुमाल, जो चाचा ने मुझे फेंकने को दिया था और मैंने नहीं फेंका। मैंने उसे खोला, और उसमें से छोटा पीतल का नट निकालकर जेब में रख लिया, क्योंकि रुमाल अब किसी और चीज़ के लिए चाहिए था।
फिर मैं घुटनों के बल बैठा।
कीचड़ ठंडा था। मेरी उँगलियाँ उसमें धँसीं और मुझे वो पुरानी आदत याद आई — पापा कहते थे, अर्जुन, गाड़ी के नीचे कभी आँख से मत देख। हाथ से देख। आँख धोखा देती है, उँगली नहीं।
मैंने हाथ घुमाया। मिट्टी, कंकड़, एक टूटा हुआ प्लास्टिक का ढक्कन, किसी ट्रक के टायर का एक टुकड़ा।
फिर मेरी उँगली किसी चीज़ पर रुकी।
वो मोटी थी। रबर की। और जब मैंने उसे खींचा, तो वो आसानी से नहीं आई। वो मिट्टी में दबी हुई थी, जैसे किसी ने उसे वहाँ जान-बूझकर गाड़ा हो।
मैंने दोनों हाथों से खींचा और वो निकल आई।
केबल का टुकड़ा।
मेरे हाथ में मुड़ा हुआ, काले रबर में लिपटा, एक हाथ से बड़ा। मैंने उसे रुमाल पर रखकर साफ़ किया।
और तब मैंने वो देखा जो मुझे देखना था।
वो बीच से कटा हुआ था।
पर टूटा हुआ नहीं था। कटा हुआ। फटा नहीं, खिंचा नहीं, घिसा नहीं। कट।
और कट इतना सीधा था कि मेरा हाथ रुक गया।
मैंने उसे करीब लाकर देखा। कोई भी केबल जब खिंचाव से टूटती है, तो उसके अंदर के तार बाहर निकल आते हैं, फैल जाते हैं, कुंडली की तरह मुड़ जाते हैं। पर ये नहीं। यहाँ अंदर के तार भी सीधे कटे थे, एक ही कोण पर, एक ही गहराई तक। जैसे किसी ने आराम से बैठकर, दोनों हाथों से प्लायर पकड़कर, एक ज़ोर में दबाया हो।
एक ज़ोर में।
न कोई जल्दी, न कोई घबराहट।
मेरे पीछे नाली बहती रही। मैंने साँस रोकी और कट के किनारे को नाखून से खुरचा।
और वहाँ, कट के ठीक किनारे पर, रबर की काली परत में कुछ चमकीला चिपका हुआ था।
पीतल।
बारीक छीलन, जैसे किसी पुराने प्लायर का जबड़ा जब बहुत ज़ोर से बंद होता है तो अपनी धातु से थोड़ा बुरादा छोड़ देता है। मैंने उसे नाखून पर लिया और आँख के सामने किया। सूरज की रोशनी में वो सुनहरी दिखी।
मैंने आँख बंद की।
और उन तीन चीज़ों को मन में गिना जो मैं हर बार गिनता हूँ। धातु की घिसाई। हवा का रिसाव। और आवाज़ का वो हिस्सा जो बाकी सबको सिर्फ़ शोर लगता है।
धातु की घिसाई — पीतल की छीलन।
हवा का रिसाव — केबल कटी थी, तो ब्रेक में हवा का दबाव बना ही नहीं। ब्रेक फेल नहीं हुआ। ब्रेक को फेल होने के लिए छोड़ दिया गया।
और तीसरी चीज़ — वो चीज़ जिसका नाम मैंने अभी तक नहीं रखा था। वो आवाज़ जो मैंने उस दिन भीड़ में सुनी थी और जिसे मैंने अनसुना कर दिया था। ठक। ठक।
कालू का लाल प्लायर।
मैं उठा। मेरे घुटनों पर कीचड़ लगा था। मेरी उँगलियाँ काँप रही थीं, और मैं ये नहीं कहूँगा कि डर से। गुस्से से भी नहीं। काँप रही थीं, बस।
मैंने टुकड़े को रुमाल में लपेटा। चारों तरफ़ से लपेटा, दो बार मोड़ा, और जेब में रखा। मेरी जेब अब भारी हो गई थी और मुझे लगा कि ये भार मुझे कुछ दिन तक अच्छा लगेगा।
तभी पीछे से आवाज़ आई।
"अरे, तू फिर आ गया?"
मैं पलटा।
जुगनू।
नंगे पाँव, घुटने पर पुराना निशान, एक हाथ में आधी फटी प्लास्टिक की थैली, और मुँह में कुछ ऐसा जो वो चबा रहा था और जिसकी आवाज़ दूर तक जाती थी।
"तू यहाँ क्या कर रहा है?" मैंने पूछा।
"मैं यहाँ रोज़ आता हूँ।" उसने थैली ज़मीन पर रखी। "नाली में कुछ मिल जाता है। कल एक चम्मच मिली थी। आज कुछ नहीं मिला, तू आ गया।"
"तो आज मैं मिल गया।"
वो हँसा। उसकी हँसी पतली थी पर इतनी तेज़ कि दूर का कौआ उड़ गया।
"तू रोज़ नहीं आता। फिर आज क्यों आया?"
मैंने जेब पर हाथ रखा। "कुछ ढूँढने।"
"क्या?"
"पता नहीं। जो मिल जाए।"
वो मेरे पास आकर बैठ गया, बिल्कुल जैसे ये जगह उसकी हो और मैं मेहमान। "कल रात यहाँ कोई आया था।"
मैं सीधा हो गया। "कौन?"
"नहीं देखा। मैं टोल के पास बैठा था, गिन रहा था। ग्यारह बजे के बाद यहाँ एक टॉर्च की रोशनी दिखी। फिर झाड़ू की आवाज़ आई।"
"झाड़ू?"
"हाँ। कोई मिट्टी समतल कर रहा था।" उसने हाथ से इशारा किया। "इस तरफ़ से उस तरफ़। जैसे कोई ग़लती मिटा रहा हो।"
मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।
"और कुछ सुना?"
वो चबाना भूल गया। "एक आवाज़ आई थी। दो बार। ठक। ठक। जैसे कोई छोटा लोहा जेब में बजता हो।"
मैंने आँखें बंद कर लीं।
मुझे वो आवाज़ याद थी। मुझे वो आवाज़ उस दिन से याद थी जिस दिन पहली बार गाड़ी महल में वो आदमी चला था, गले में काला धागा, भौंह पर कटा निशान, और हाथ में वो लाल प्लायर जो चलते-चलते बजता रहता था।
"जुगनू," मैंने धीरे से कहा। "ये बात किसी को नहीं बतानी।"
"क्यों?"
"क्योंकि अगर तू बताएगा, तो अगली बार तू यहाँ नहीं मिलेगा।"
वो एक पल मेरी तरफ़ देखता रहा। उसकी आँखों में डर नहीं था। गिनती थी। जैसे वो मन में कुछ जोड़ रहा हो।
"ठीक है," उसने कहा। "पर मुझे भी एक बात बतानी है।"
"बोल।"
"मैंने वो रसीद संभालकर रखी है। जो तूने मुझे दी थी। मेरे डिब्बे में, ढोल के अंदर। मेरी माँ उसे कभी नहीं छूएगी, क्योंकि उसे लगता है ढोल के अंदर साँप रहता है।"
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