A Dark Secret – Chapter 38
चौथे वाले का पंचर वाला पहिया… नहीं। चौथे वाले का कुछ नहीं था। वो चुप था। एकदम ठीक। मैंने उसे सुना और मन में उसे एक नंबर दे दिया — भरोसेमंद। पता नहीं क्यों, पर जो गाड़ी चुप होती है, वो मुझे हमेशा भरोसेमंद लगती है।
कतार में खड़े एक ड्राइवर ने मुझे देखा। मोटी तोंद, पसीने की सफ़ेद लकीरों वाली शर्ट।
"क्या देख रहा है भाई?" उसने पूछा।
"कुछ नहीं," मैंने कहा। "आपका पहिया है?"
"हाँ।"
"बेयरिंग बदल लो।"
वो हँसा। "तू डॉक्टर है क्या?"
"नहीं," मैंने कहा। "पर ये पहिया तीन दिन बाद तेरी बात नहीं सुनेगा।"
वो हँसता रहा, पर जब मैं आगे बढ़ गया तो मुझे पीछे से सुनाई दिया कि उसने किसी से कहा, "सुन, ये लड़का कुछ तो जानता है।"
मुझे अंदर हल्की सी गरमी फैली। छोटी सी। जैसे सर्दी में चाय का पहला घूँट।
मैं कतार के साथ-साथ चल रहा था और मेरा मन टीटू के काँपते हाथों पर अटका हुआ था। उसने कहा था — जो आदमी इन गाड़ियों के बारे में पूछता है, वो कुछ दिन बाद आना बंद कर देता है।
मुझे याद आई अपनी ही बात।
एक ही डॉक्टर।
मैंने खुद को टोक दिया। मज़ाक कर लिया, बात आगे बढ़ा दी, और अब वही मज़ाक मेरे सीने में बैठा हुआ था, जैसे किसी ने अनजाने में कंकड़ खा लिया हो।
मैंने गाड़ी तेज़ की।
और तभी, आगे, सड़क के उस मोड़ पर, मुझे वो सफ़ेद गाड़ियाँ फिर दिखीं।
सात ट्रक। एक कतार में। सब सफ़ेद। सबके पीछे के दरवाज़े पर एक ही निशान — छोटा सा नीला गोल, जैसे किसी मुहर से दबाया गया हो। न नाम, न नंबर, न कंपनी। बस वो नीला गोल।
वो जा रहे थे, और मैं उनके पीछे-पीछे चल पड़ा। पता नहीं क्यों। जब नहीं चलना चाहिए, तब भी पैर खुद चल पड़ते हैं।
पहले मैंने उन्हें दूर से सुना। फिर पास आया। फिर बिल्कुल पास।
और मैं हँस पड़ा।
क्योंकि वो सात गाड़ियाँ एक जैसी चल रही थीं। एक जैसी धूल उड़ा रही थीं। एक जैसा धुआँ छोड़ रही थीं। एक जैसी कराह रही थीं।
मैंने खिड़की से सिर निकाला और उनके पीछे चलने वाले ड्राइवर से कहा, "भाई, इन सबको एक ही डॉक्टर ने ठीक किया है क्या?"
ड्राइवर ने मेरी तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर मुस्कान नहीं आई। उसने बस सिर हिलाया, जैसे कहे — तू नया है, तुझे पता नहीं।
मेरी हँसी वहीं रुक गई।
क्योंकि तभी मैंने सुना।
मैंने एक-एक करके सुना। सातों। एक-एक को अलग किया, जैसे कोई पन्नों की गड्डी में से अपना पन्ना छाँटता है।
और मुझे कुछ नहीं मिला।
हर गाड़ी का अपना दिल होता है। एक फटफटाता है, एक गरजता है, एक जैसे गले में कुछ अटका हुआ लिए चलता है। कोई चीज़ हर गाड़ी में अलग होती है — इंजन की उम्र, ड्राइवर का हाथ, तेल की किस्म, बोरे की वज़न, हवा का रुख़।
यहाँ कुछ भी अलग नहीं था।
सात गाड़ियाँ। सात अलग इंजन। सात अलग ड्राइवर। और उन सबकी आवाज़ में एक ही घिसाई — वही पतली, धातु की, दाँतों में चुभने वाली घिसाई।
जैसे किसी एक आदमी ने सातों को एक ही तार पर बाँध दिया हो और उस तार को अपनी उँगली से खींच रहा हो।
मैंने खिड़की बंद कर दी। हवा बंद हो गई। पर आवाज़ नहीं गई। मैंने गाड़ी धीमी की, तो भी आवाज़ नहीं गई, क्योंकि वो अब मेरे अंदर थी।
उनमें से एक, जो सबसे पीछे था, अचानक रुका। ड्राइवर उतरा, बोनट उठाया और झुककर देखने लगा। उसने पानी की बोतल से कुछ छिड़का, फिर सिर खुजाया, फिर बोनट गिरा दिया और गाड़ी में चढ़ गया।
वो नहीं जानता था कि वो क्या ढूँढ रहा है।
मुझे पता था।
मुझे पता था कि उसके इंजन में कहीं एक छोटा सा पीतल का नट है, जो किसी कोने में छिपा बैठा है और हर घूमने पर वही टन-टन कर रहा है। और उस नट को किसी ने वहाँ रखा है। जान-बूझकर।
क्योंकि नट इंजन में खुद से नहीं आता। जैसे गोली आदमी के शरीर में खुद से नहीं आती।
मैंने गाड़ी किनारे लगाई। ब्रेक दबाया। रघुवीर झटके से रुका और उसकी छाती में कुछ एक बार हिचका, जैसे किसी को रोक कर बैठा दिया गया हो।
मैं उतरा।
सड़क पर धूल थी, और वो मेरी नाक में गई, और मैंने उसे साफ़ नहीं किया। मैं सड़क के बीच की तरफ़ चला, दो कदम, तीन। एक टेम्पो आया और उसने हॉर्न मारा, लंबा और चिढ़ा हुआ। मैंने हाथ उठाकर माफ़ी माँगी और वहीं खड़ा रह गया।
सात सफ़ेद ट्रक दूर जा रहे थे। मोड़ पर उन्होंने अपनी कतार थोड़ी सी मोड़ी और उनकी छतें एक लय में बदलीं, जैसे कोई एक सांप सात जगह से हिल रहा हो।
धूल उनके पीछे एक लंबी, पीली रस्सी की तरह खिंची जा रही थी।
और मैं वहीं खड़ा था। मेरी जेब में एक सौ सत्तर रुपये थे, एक पीतल का पत्ता था, दोनों रुमाल थे, एक छोटा नट था, टोल की रसीद थी, मिल की पर्ची थी और एक घड़ी थी जो पाँच मिनट आगे चलती थी।
मेरे पास कुछ भी नहीं था।
और मुझे लगा कि मेरे पास सब कुछ है।
क्योंकि मैंने अब तक अपने कानों को एक काम पर लगाया था — मोती, रघुवीर, टोल, सलीम की चाय, जुगनू की गिनती, टीटू का डरा हुआ हाथ। पर आज जो मैंने सुना, वो किसी एक गाड़ी का सच नहीं था।
वो शहर का सच था।
हादसा कोई एक दिन की बात नहीं होती। हादसा रोज़ होता है, पर उसे हादसा कहने वाला कोई एक आदमी होता है। उस आदमी के पास एक फ़ाइल होती है, एक कलम होती है, और एक तारीख़ छपी हुई पहले से आती है। बस नाम भरना होता है।
मैंने सातों गाड़ियों को उनके मोड़ पर मुड़ते देखा।
उनके भीतर वही नट था। वही घिसाई थी।
और मुझे समझ आया कि ये शहर हादसों से नहीं डरता।
ये इन्हीं से चलता है।
मैंने अपनी गाड़ी की तरफ़ देखा। रघुवीर सड़क किनारे खड़ा था, इंजन बंद, पर बोनट से गरमी उठ रही थी, जैसे वो भी मेरे साथ उन सात गाड़ियों को देख रहा हो।
मैं वापस जाने ही वाला था कि पीछे से एक और ट्रक आया और मेरे पास से गुज़रा। उसका ड्राइवर बाहर हाथ निकालकर चिल्लाया, "ओ भाई, गाड़ी हटा! सड़क तेरी बाप की है?"
मैंने हाथ उठाया। "हटा रहा हूँ, भाई।"
वो चला गया और उसका शोर कुछ दूर तक मेरे पीछे चला। फिर सिर्फ़ धूल रह गई।
मैंने अपनी जेब से नट निकाला और रुमाल खोलकर उसे एक बार फिर देखा।
वो चुप बैठा था, छोटा सा, बेज़ुबान। पर वो जानता था।
मुझे याद आया — जब मैं बच्चा था, पापा मुझे गैराज ले जाते थे और कहते थे, अर्जुन, गाड़ी शोर नहीं करती, गाड़ी बोलती है। शोर वो होता है जो तेरे कान में जाता है, आवाज़ वो होती है जिसे तेरा दिमाग़ सुनता है। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है — कि तुझे सुनना आता है या नहीं।
तब मैं हँसता था। पापा के हाथ में हर समय तेल लगा रहता था और मुझे लगता था कि वो बस बड़ी बातें बोलते हैं।
आज मुझे लगा कि वो सबसे सच्ची बात बोलते थे।
मैंने नट वापस रुमाल में लपेटा। जेब में रखा। फिर रघुवीर की तरफ़ लौटा।
मैंने दरवाज़ा खोला, पर चढ़ा नहीं। मैं खुले दरवाज़े के सहारे खड़ा रहा और उस दूर मोड़ की तरफ़ देखता रहा, जहाँ से सातों सफ़ेद गाड़ियाँ अब पूरी तरह ग़ायब हो चुकी थीं।
फिर मैंने धीरे से कहा, इतना धीरे कि सिर्फ़ मैंने सुना और शायद रघुवीर ने।
"ये शहर हादसों से नहीं चलता। ये हादसों से कमाता है।"
हवा ने धूल का एक बादल उड़ाया और उसे मेरे चेहरे पर दे मारा। मैंने आँख नहीं मूँदी।
"और अब मुझे ये आवाज़ पहचाननी है।"
मैं चढ़ गया। दरवाज़ा बंद किया। चाबी घुमाई।
रघुवीर ने इस बार नहीं खाँसा।
और सड़क पर, ट्रांसपोर्ट नगरी के उस धूल भरे मोड़ पर, जहाँ सड़कें एक-दूसरे को गले लगाकर आगे निकल जाती हैं, मैंने गियर डाला।
"चाहे कुछ भी हो जाए।"
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