A Dark Secret – Chapter 37
ऊपर कोने में वो नीला निशान — दो लकीरें और नीचे एक सीधी लकीर।
नीचे लिखा था — सरिता कार्गो। तारीख़ — सताईस। गाड़ी का नंबर, बोरे, वज़न।
और माल के खाने में लिखा था — दवा, सीलबंद डिब्बे, संभालकर।
मैंने उसे देखा।
फिर नीचे और लिखा था — पता — उसी इलाक़े का, जहाँ काँच के बड़े दफ़्तर वाली इमारत है।
लड़के ने मेरे हाथ से रसीद खींच ली।
"भाई, ये मेरे काम का नहीं है," वो जल्दी से बोला। "ये मालिक को देनी है वरना…"
"वरना?"
वो रुक गया। उसकी आवाज़ में वो कंपन आई जो मैं पहचानता हूँ। पर उसका डर बुरा नहीं था। उसका डर वैसा था जैसे कोई लड़का घर से दूर आया हो और उससे कहा गया हो कि एक काग़ज़ गुम होने पर उसकी नौकरी जाएगी और इसकी ख़बर उसके गाँव तक पहुँचेगी।
"ये गाड़ियाँ किसकी हैं?" मैंने पूछा।
"मालिक की।"
"मालिक कौन?"
"वो… बड़े साहब हैं।"
"नाम?"
लड़का मेरी तरफ़ देखने लगा। मैंने देखा कि उसका गला सूख रहा है और वो सच में नहीं बता सकता, क्योंकि उसे खुद नहीं पता। उसे सिर्फ़ इतना पता है कि मालिक बड़ा है और उसकी तनख्वाह उसी के हाथ से आती है।
"भाई साहब," उसने कहा, "हमें तो बस बताया जाता है। सात गाड़ियाँ, सुबह सात बजे, यही रास्ता। माल उतारो, रसीद लो, वापस आओ। हम किसी से नहीं मिलते।"
"तुझे कभी कोई नहीं मिला?"
वो एक पल चुप रहा। फिर उसने धीरे से कहा, "एक बार एक आदमी आया था। सफ़ेद गाड़ी में। उसने कहा था कि मैं इस काम में कुछ ज़्यादा दिन नहीं चलूँगा।"
"क्यों?"
"मैंने नहीं पूछा।"
कतार आगे बढ़ी।
लड़का अपनी गाड़ी की तरफ़ भागा। दरवाज़ा खोला, चढ़ा, क्लच छोड़ा।
सातवीं गाड़ी के इंजन में वही चीख निकली और वो आगे बढ़ गया।
मैं वहीं खड़ा रहा। टोल के काउंटर के पास, धूल में, हाथ में चाबी और पैरों के नीचे सात गाड़ियों का छोड़ा हुआ एक जैसा निशान।
टीटू ने झाँका। मैंने उसे देखा। उसने तुरंत आँख चुरा ली।
"टीटू," मैंने कहा।
वो काँप गया।
"ये गाड़ियाँ रोज़ आती हैं?"
"रोज़ नहीं।" उसकी आवाज़ दबी हुई थी। "जब आती हैं, तब काउंटर का काग़ज़ मुझे छूने नहीं देते। अपना आदमी लगा देते हैं।"
"क्यों?"
"मैं नहीं जानता।" उसने काग़ज़ों की तरफ़ देखा। "मुझे सिर्फ़ मेरी दस बजे वाली नौकरी चाहिए, भाई साहब। मेरे घर में कोई कमाने वाला नहीं है।"
"मैं तुझसे कुछ नहीं पूछ रहा, टीटू।"
"फिर भी आप पूछ रहे हो।" उसने काग़ज़ समेटे। "जो आदमी इन गाड़ियों के बारे में पूछता है, वो कुछ दिन बाद आना बंद कर देता है। मुझे नहीं लगता ये कहने की ज़रूरत है कि क्यों।"
वो अंदर चला गया। काँच की खिड़की बंद कर दी।
फिर वो खिड़की फिर से खोलकर बाहर निकला।
"सुनो।" उसका चेहरा पसीने में था। "एक बात। आज तुमने मेरे सामने उन गाड़ियों को नाम से नहीं पुकारा, ये अच्छा किया। उनके सामने उनकी कमज़ोरी बोलो और वो तुम्हें तीन दिन में मिटा देंगे।"
"मैंने उनकी कमज़ोरी नहीं बोली, टीटू।"
"फिर क्या बोला?"
मैंने उसकी बंद होती खिड़की को देखा।
"मैंने बस कहा कि सबको एक ही डॉक्टर ने ठीक किया है।"
टीटू हँसा नहीं। उसने सिर हिलाया, जैसे कोई अपने ही दिल को समझा रहा हो कि ये आदमी पागल है, और खिड़की बंद कर दी।
मैं अपनी गाड़ी तक लौटा। वो सड़क किनारे खड़ी थी, ढलान पर, इंजन बंद।
मैंने हाथ से उसका बोनट टटोला। गरम था।
फिर मैं सड़क के किनारे खड़ा हो गया और उस तरफ़ देखने लगा जिधर सात सफ़ेद गाड़ियाँ गई थीं। वो अब दूर थीं — सिर्फ़ धूल और सात छोटी सफ़ेद बत्तियाँ, एक कतार में, फिर धुंध उन्हें खा गई।
और मैंने उन्हें जाते हुए सुना।
सात आवाज़ें। एक जैसी। एक ही दुखती हुई चीख। एक ही घिसाई।
मैंने अपनी जेब से पीतल का छोटा नट निकाला। रुमाल में लिपटा हुआ। मैंने उसे हमैंने उसे हथेली पर रखा।
छोटा सा पीतल का नट। किनारे घिसे हुए, अंदर की तरफ़ काली तेल की लकीर, जैसे किसी ने उसे बहुत दिन तक ऐसे ही घुमाया हो।
मैंने उसे नाखून से खटखटाया।
टन।
पतली, साफ़ आवाज़। जैसे किसी छोटी घंटी को अंदर से किसी ने दबा दिया हो।
मैंने फिर खटखटाया।
टन… टन।
यही थी। बिल्कुल यही नहीं, पर इसी खानदान की। आज सुबह जब ये रघुवीर के इंजन के अंदर से निकला था, तब भी यही टन-टन थी। और उससे पहले, मोती के नीचे कीचड़ में, जब मैंने कान लगाया था, तब तीसरी आवाज़ भी कुछ ऐसी ही थी।
तीन आवाज़ें। धातु की घिसाई, हवा का रिसाव, और ये।
ये तीसरी।
मैंने नट को उँगलियों में घुमाया। उसके किनारे पर एक जगह हल्का सा दाँत बना हुआ था, जैसे किसी ने उसे ज़बरदस्ती किसी जगह ठोका हो। इंजन के अंदर छिपाया हुआ नट होता तो अचानक बाहर नहीं कूदता। वो अंदर ही रहता। घूमता रहता। धातु से धातु रगड़ता रहता। और हर घूमने पर वही टन-टन।
पर सवाल ये नहीं था कि नट अंदर कैसे आया।
सवाल ये था कि सात सफ़ेद ट्रकों की चीख में वही टन-टन क्यों थी।
मैंने रुमाल खोला, नट को उसमें लपेटा और जेब में रखा। रुमाल में धीरे से कहा, जैसे किसी बीमार को बिस्तर पर लिटा रहा होऊँ, "तू अभी चुप रह। तेरी बारी बाद में आएगी।"
टोल काउंटर के काँच में टीटू का चेहरा अब भी दिख रहा था। वो अपने काग़ज़ों के ऊपर झुका था, पर लिख नहीं रहा था। हाथ रुका हुआ था। कलम की नोक काग़ज़ पर टिकी थी और स्याही फैल रही थी, एक छोटा काला धब्बा।
मैं अपनी गाड़ी तक गया। बोनट पर हाथ रखा। गरम था, पर डरावना गरम नहीं — जैसे सुबह उठकर किसी बूढ़े का हाथ। मैंने दरवाज़ा खोला और अंदर चढ़ा।
केबिन में वही गंध थी जो पिछले तीन दिन से थी — डीज़ल, बोरे की जूट, पुराने कपड़े की धूल और थोड़ा सा उनका पसीना जो इस सीट पर बैठे थे।
मैंने चाबी घुमाई।
रघुवीर ने पहले खाँसा। एक छोटी, गले वाली खाँसी, जैसे कोई सत्तर साल का आदमी सुबह उठकर पहले गला साफ़ करता है। फिर उसने दूसरी बार खाँसा, और फिर उसकी आवाज़ बैठ गई — बैठकर सीधी, गोल, बिना किसी झटके के।
मैंने डैशबोर्ड पर हाथ रखा।
"सुन," मैंने कहा, "आज हम पहली बार अकेले जा रहे हैं।"
इंजन बोला नहीं। बस एक हल्की गुनगुनाहट बदली, जैसे किसी ने नींद में करवट ली हो।
"मुझे डर लग रहा है," मैंने कहा। "तू किसी को मत बताना।"
और फिर मैं खुद अपनी बात पर हँस पड़ा। सुबह के नौ बजे, टोल नाके के पास, एक ट्रक में अकेला बैठा आदमी अपनी ही गाड़ी से डर की बात कर रहा था।
मैंने गियर डाला और रघुवीर आगे बढ़ा।
बाईस नंबर टोल दिन में बिल्कुल औरत जैसा लगता है। रात में वो चीखता है, गालियाँ देता है, रसीदें फाड़ता है। दिन में वो बस एक लंबी कतार है — धूल में खड़ी, इंतज़ार करती, हरकत न करती।
मैंने गाड़ी धीरे की और कतार के साथ-साथ चलने लगा।
और मैं सुनने लगा।
आगे एक लाल ट्रक था। उसका पहिया घूमते वक़्त हल्की सी सीटी बजा रहा था — जैसे चाय की केतली बाहर निकलने से पहले करती है। बेयरिंग सूख रही थी। दो-तीन दिन का काम है, फिर वो चीखेगी।
उसके पीछे एक नीला ट्रक खड़ा था जिसका साइलेंसर ढीला था। उसकी आवाज़ में वो फटी हुई घरघराहट थी जो सिर्फ़ उसी जगह से आती है जहाँ पाइप गैसकेट से मुँह चुरा रहा हो।
तीसरे की बेल्ट चरमरा रही थी। एक लगातार, ऊँगली नाखून बरामदे की स्लेट पर रगड़ने जैसी आवाज़।
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