A Dark Secret – Chapter 42
मैं ढाबे के पीछे वाले कमरे में गया।
कमरा छोटा था। एक चारपाई, एक लोहे का बक्स, दीवार पर टँगा एक पुराना कैलेंडर जिसका कोई पन्ना नहीं फटा था, और एक खिड़की जिस पर जाली नहीं थी। कमरे में पान की महक थी और उसके नीचे कुछ और — ईंधन जैसी, भारी, मीठी।
मैंने चारपाई के नीचे देखा।
जूट में लिपटा एक डिब्बा पड़ा था। लकड़ी का, पर मज़बूत — जैसे कोई पुराना बंदूक का डिब्बा या दवा की खेप रखने वाला। उस पर प्लास्टिक की रस्सी बँधी थी, और रस्सी की गाँठ पर लाल मोहर लगी थी।
मैंने उसे खींचा।
भारी था। करीब चालीस किलो। मैंने घुटना टेका और दोनों हाथों से उसे ऊपर उठाया। मेरी कलाई पर पापा की घड़ी खिसक गई और मैंने उसे दाँत से सही किया।
और जब मैंने डिब्बे को सीने से लगाकर घुमाया, तो मेरी नज़र उस पर लगे काग़ज़ पर पड़ी।
एक टिकट। आधा फटा हुआ, एक कोने से मुड़ा हुआ, पर इतना साफ़ कि पढ़ा जा सके।
सरिता कार्गो।
मेरे हाथ रुक गए।
डिब्बा मेरी छाती पर टिका रहा और मैं वहीं जम गया।
सरिता कार्गो।
कल टोल पर, सात सफ़ेद गाड़ियों के काफ़िले में, सातवीं गाड़ी के किशोर ड्राइवर से जो बिल्टी गिरी थी, उस पर यही नाम लिखा था। सरिता कार्गो। सताईस तारीख़। दवा के सीलबंद डिब्बे। और काँच के बड़े दफ़्तर वाली इमारत का पता।
मैंने धीरे से डिब्बे को नीचे रखा और टिकट को उँगली से सीधा किया।
नाम वही। तारीख़ वही। ऊपर एक नीला गोल निशान था — मुहर जैसा, जिस पर कोई नाम नहीं था, कोई नंबर नहीं था। बस नीला गोल।
वही नीला गोल जो सातों सफ़ेद गाड़ियों के पीछे था।
और अब वो नीला गोल उस डिब्बे पर था जो बल्लू की चारपाई के नीचे पड़ा था, एक ऐसे आदमी के पास जिसकी गाड़ी पलट गई थी और जिसे कोई मीठी आवाज़ वाला बेटा कहता था।
मैंने आँख बंद की।
मेरे पीछे रुक्मा दीदी की कड़छी बज रही थी। कहीं दूर एक ट्रक का हॉर्न बजा। और कमरे में, मेरे सामने, चालीस किलो का एक सीलबंद डिब्बा पड़ा था जो अभी तक किसी के नहीं था, और जिसेमैंने आँख खोली।
कमरे में पान की महक अब भी थी, पर उसके नीचे जो ईंधन जैसी भारी महक थी, वो अब और साफ़ हो गई थी। जैसे कोई बंद डिब्बा अब खुल चुका हो। मैंने डिब्बे को दोनों हाथों से पकड़ा और उसे चारपाई पर रखा। रस्सी की गाँठ पर लगी लाल मोहर मेरे अंगूठे के नीचे दबी तो महसूस हुआ कि ये मोहर किसी मशीन से नहीं, हाथ से लगाई गई है — थोड़ी टेढ़ी, थोड़ी जल्दी में।
मैं कमरे से बाहर आया। रुक्मा दीदी चूल्हे पर कड़छी चला रही थीं। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और बिना रुके कहा, "ले गया? तो ले जा। पर सुन ले — उस डिब्बे के साथ किसी से बात मत करना। न बल्लू से, न मुझसे, न उस आदमी से जो तुझे गोदाम पर मिलेगा।"
मैंने कहा, "दीदी, तुम्हें पता है इसमें क्या है?"
वो हँसीं। पर वो हँसी ढाबे वाली हँसी नहीं थी। "मुझे ये पता है कि इसमें क्या नहीं है — मेरा हिसाब। बाकी जो है, वो तेरे काम का नहीं।"
मैंने सिर हिलाया और डिब्बा उठाकर ट्रक की तरफ़ बढ़ा। पर तभी मेरे पैर रुक गए।
मुझे याद आया — आज सुबह, जब मैं टोल के पास खड़ा था, तो मैंने तय किया था कि पहले उस जगह जाऊँगा जहाँ मोती पलटा था। दस दिन हो गए थे उस रात को। दस दिन में बारिश ने सब कुछ धो दिया था, पर मेरे कानों में वो आवाज़ अब भी ताज़ा थी — धातु की घिसाई, हवा का रिसाव, और वो तीसरी आवाज़ जो सबको सिर्फ़ शोर लगती थी।
मैंने डिब्बा वापस रुक्मा दीदी की चारपाई के नीचे रख दिया। "दीदी, आधा घंटा। बस आधा घंटा।"
उन्होंने कड़छी नीचे रखी और मेरी तरफ़ देखा। "कहाँ?"
"उसी जगह। जहाँ मोती पलटा था।"
रुक्मा दीदी की आँखें थोड़ी सिकुड़ीं। "वहाँ अब कुछ नहीं है, अर्जुन। पुलिस ने सब समेट लिया।"
"पुलिस नहीं समेटती, दीदी। पुलिस सिर्फ़ वो समेटती है जो उसे दिखे।"
वो कुछ नहीं बोलीं। बस हाथ बढ़ाकर मेरे कंधे पर रखा और हल्का दबाया। जैसे कह रही हों — जा, पर लौटकर आ।
मैं निकल पड़ा।
बाईस नंबर टोल से आगे, उस मोड़ से पहले जहाँ सड़क दो हिस्सों में बँट जाती है, वहाँ एक खाली पड़ी ज़मीन है। नीचे नाली बहती है और ऊपर क्रेन के पहियों ने जो निशान छोड़े थे, वो अब भी मिट्टी में धँसे हुए थे। मैंने देखा — गीला कचरा, फटे पोस्टर, एक टूटी चप्पल, और बीच में कुछ ऐसा जो दस दिन पहले यहाँ नहीं था।
एक झाड़ू के निशान।
मिट्टी को समतल किया गया था। जैसे किसी ने रात में आकर सब कुछ बराबर कर दिया हो — न कोई गड्ढा, न कोई निशान, बस सपाट ज़मीन। पर झाड़ू की लकीरें अब भी हल्की दिख रही थीं, जैसे किसी ने जल्दी में काम किया हो।
मैं घुटनों के बल बैठ गया।
नाली का पानी बह रहा था — धीमा, गंदा, पर बहता हुआ। मैंने हाथ कीचड़ में डाला। ठंडा था, और उसमें वो महक थी जो सिर्फ़ ट्रांसपोर्ट नगरी की मिट्टी में होती है — डीज़ल, तेल और सड़े पानी की।
मेरी उँगलियाँ कुछ मोटी चीज़ से टकराईं।
मैंने उसे खींचा।
रबर। मोटा रबर, काले रंग का, बीच से कटा हुआ। केबल का टुकड़ा — करीब आठ इंच लंबा। मैंने उसे नाली के पानी में धोया और ऊपर उठाकर देखा।
कट बहुत साफ़ था।
इतना साफ़ कि मुझे लगा किसी ने बैठकर, आराम से, बिना जल्दी के प्लायर चलाया हो। कट के किनारे पीतल की बारीक छीलन चिपकी थी — बाल जितनी पतली, चमकदार। मैंने उसे नाखून से खुरचा। छीलन मेरे नाखून के नीचे आ गई।
मैंने केबल के टुकड़े को अपने तेल में डूबे रुमाल में लपेटा और जेब में रख लिया।
पीछे से पतली आवाज़ आई, "मिल गया?"
मैं पलटा। जुगनू खड़ा था, नंगे पाँव, घुटने पर पुरानी चोट का निशान अब भी वैसा ही। उसने मेरी जेब की तरफ़ देखा, फिर मेरे चेहरे की तरफ़।
"मिल गया," मैंने कहा। "तू यहाँ कैसे?"
"मैं रोज़ आता हूँ।" उसने कंधे उचकाए। "टोल पर गाड़ियाँ गिनता हूँ, फिर यहाँ आकर बैठता हूँ। कल रात भी आया था।"
"कल रात?"
"हाँ। पर यहाँ कोई था।" उसने उस जगह इशारा किया जहाँ झाड़ू के निशान थे। "एक आदमी झाड़ू लेकर आया था। मिट्टी समतल कर रहा था। मैंने पूछा, क्या कर रहे हो? तो वो बोला, कुछ नहीं, सफ़ाई।"
"कौन था?"
"पहचाना नहीं। काला धागा था गले में, पर मुँह नहीं दिखा। मैं जल्दी में था, तो चला आया।"
मैंने जुगनू को देखा। उसकी आवाज़ में कोई डर नहीं था। बस वो तथ्य बता रहा था, जैसे कोई समाचार पढ़ रहा हो।
"जुगनू, तूने उस आदमी की आवाज़ सुनी?"
"हाँ। मीठी थी। जैसे कोई फ़िल्म में बोलता है।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए। मीठी आवाज़। काला धागा।
मैंने जुगनू के सिर पर हाथ रखा। "तू ठीक है। अब जा, ढाबे पर बैठ। मुझे बल्लू से मिलना है।"
जुगनू भाग गया। मैंने एक बार फिर उस जगह को देखा। झाड़ू के निशान, समतल मिट्टी, और नाली में बहता पानी। किसी ने यहाँ आकर सब कुछ मिटाने की कोशिश की थी। पर केबल का टुकड़ा रह गया। शायद वो इसे ढूँढ ही नहीं पाए।
मैं ढाबे के पीछे पहुँचा। बल्लू चारपाई पर बैठा था, एक पैर पर पट्टी बँधी थी, और सामने चाय का गिलास ठंडा पड़ा था। उसने मुझे देखा और आँखें चुरा लीं।
"क्या लाया?"
मैंने रुमाल खोला और केबल का टुकड़ा उसके सामने रख दिया।
बल्लू ने एक नज़र देखा और मुँह फेर लिया। "ये मेरी मोती का नहीं है। किसी और गाड़ी का होगा।"
"बल्लू भाई—"
"मैंने कहा नहीं है।" उसकी आवाज़ पतली हो गई। जैसे किसी ने गले में उँगली रखकर दबा दी हो।
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