A Dark Secret – Chapter 408
"जवाब यह है," सुधा ने कहा, "कि रजिस्टर को खुद बाबू हरनाम ने बनाया था। उसने अपनी स्याही बनाई, अपना काग़ज़ बनाया, अपने नियम लिखे। पर चाक उसने नहीं बनाया। चाक बाहर से आया। और जो चीज़ सौदे के बाहर से आई, वह रजिस्टर की किताब में नहीं है।"
"यह माँ ने मुझे पहले क्यों नहीं बताया?" मैंने कहा। आवाज़ मेरी तेज़ निकली, और मुझे खुद पर हैरानी हुई।
"क्योंकि तुम्हारी माँ को भी यह बाद में पता चला," सुधा ने कहा। "पहले उसे लगा कि काग़ज़ पर नाम लिखवाना ही सब कुछ है। जब वह सुधा से मिली, तब उसे पता चला कि स्याही से लिखे नाम को चाक से लिखा नाम काटता है। और तब उसने अपना नाम तुम्हारे पास रख दिया, दीवार पर नहीं।"
मैंने दीवार को देखा। चाक का नाम फीका था, धूल में। पर वह था। बाबू हरनाम की तीन पीढ़ियों की तस्वीरें इसी हवेली में टँगी थीं, रजिस्टर की तिजोरी उसी कमरे में थी, और यह चाक का नाम, इस कोने में, चालीस साल से खड़ा था, किसी की नज़र में नहीं आया।
तभी हवेली के सामने वाले गेट पर दस्तक हुई।
भैरों गेट की तरफ़ बढ़ा, पर मैंने हाथ से रोक दिया। "मैं देखती हूँ।"
गेट खोला। सामने मेरे पिता खड़े थे। प्रकाश जोशी। हाथ में छोटा बैग, कंधे पर वही पुरानी जैकेट, जो उन्होंने शायद दस साल पहले पहनी थी। चेहरे पर थकान, और उसके पीछे कुछ और — जो मैंने पहले कभी नहीं देखा था।
"पापा?"
"मुझे किसी ने फोन किया," उन्होंने कहा। आवाज़ सूखी थी। "कहा कि तेरी तबीयत ठीक नहीं है।"
"किसने फोन किया?"
"पता नहीं। नंबर नहीं दिखा।"
मैंने उन्हें अंदर आने दिया। वे आँगन में आए, और जैसे ही उनकी नज़र चाक के नाम पर पड़ी, वे रुक गए।
"यह क्या है?" उन्होंने पूछा।
"रामदीन का नाम," मैंने कहा। "चाक से लिखा हुआ।"
"रामदीन?" उन्होंने भौंहें चढ़ाईं। "वही पागल बूढ़ा?"
मेरी जेब से रजिस्टर की गरमी बढ़ गई। "वह पागल नहीं है," मैंने कहा। "वह चालीस साल से इस शहर में बंधा हुआ है।"
"बंधा हुआ?" पापा ने कहा। "मीरा, तू क्या बोल रही है? तू रात-रात भर गाड़ी चलाती है, नींद पूरी नहीं करती, और अब तुझे भूत-प्रेत दिखने लगे हैं?"
"पापा—"
"मैं तुझे लेने आया हूँ," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वही जल्दबाज़ी थी जो माँ की थी। "सामान बाँध, रिया को ले, और चल। मेरे पास कमरा खाली है। तीन दिन में सब ठीक हो जाएगा।"
"मैं नहीं जा रही।"
"मीरा—"
"मैं नहीं जा रही," मैंने कहा। "और रिया भी नहीं जा रही।"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा, फिर रिया की तरफ़, जो दरवाज़े पर खड़ी थी। उनका चेहरा बदला।
"रिया," उन्होंने कहा, "बेटा, तू अंदर जा।"
"मैं यहीं हूँ, नाना," रिया ने कहा। "माँ को जो बोलना है, मेरे सामने बोले।"
पापा रुके। उन्होंने बैग ज़मीन पर रखा और मेरी तरफ़ बढ़े। "यह मकान बेच दे," उन्होंने धीरे से कहा, पर आवाज़ में ज़ोर था। "जो पैसा लगे, मैं दूँगा। तुझे नया घर दिला दूँगा। नई कॉलोनी में। दूर। जहाँ कोई नहीं जानता तू कौन है।"
"यह मकान नहीं है, पापा," मैंने कहा।
"तो क्या है?"
"यह मेरी माँ का नाम है।"
और मैंने पहली बार अपनी आवाज़ उन पर ऊँची की। पूरे आँगन में गूँजी। काजल ने पीछे कदम हटाया, सुधा ने आँखें नीची कीं, भैरों गेट के पास खड़ा रह गया।
"माँ ने यह मकान खरीदते वक़्त मेरा नाम काग़ज़ पर लिखवाया था," मैंने कहा। "यह सोचकर कि इससे मुझे जगह मिलेगी। उसे नहीं पता था कि वह मेरा नाम एक किताब में लिख रही है जो उसे एक दिन खा जाएगी। तुम्हें पता था?"
पापा ने आँखें चुराईं। "मुझे नहीं पता था कि—"
"तुम्हें पता था," मैंने कहा। "तुमने उस काग़ज़ पर हस्ताक्षर किए थे। मैंने देखा है। नीचे तुम्हारा नाम है।"
पापा कुछ नहीं बोले। रिया ने धीरे से कहा, "नाना, आपने क्यों किया?"
"मैंने कुछ नहीं किया," पापा ने कहा। पर आवाज़ काँप रही थी।
"आपने हस्ताक्षर किए," मैंने कहा। "उस काग़ज़ पर, जिस पर लिखा था — होने वाली बच्ची का नाम। तुमने मेरा हाथ नहीं पकड़ा, पापा। तुमने मेरा नाम पकड़ा और उसे एक किताब में डाल दिया जिसे तुमने कभी पढ़ा नहीं।"
पापा ने आँखें बंद कर लीं। "सुशीला ने कहा था कि यह सिर्फ़ काग़ज़ी काम है," उन्होंने धीरे से कहा। "बस एक फॉर्म है। मकान के काग़ज़ात के लिए ज़रूरी है। मैंने सोचा—"
"तुमने सोचा कि माँ जो कहती है वह सही होगा," मैंने कहा। "जैसे तुम हमेशा सोचते थे।"
पापा ने आँखें खोलीं। उनमें कुछ था जो मैंने चालीस साल में नहीं देखा था — शर्म।
"तू मुझे क्या समझती है?" उन्होंने कहा। "मैंने तुझे पाला है। मैंने तेरी पढ़ाई के पैसे भरे हैं। मैंने—"
"तुमने हर महीने पैसे भेजे," मैंने कहा। "पर तुमने एक बार भी नहीं पूछा कि मैं क्या कर रही हूँ। तुमने एक बार भी नहीं पूछा कि रिया का नाम कहाँ-कहाँ लिखा है। तुम सिर्फ़ पैसे भेजते रहे और दूर रहे।"
पापा की आँखें भर आईं, पर वे रोए नहीं।
"तू माँ जैसी है," उन्होंने कहा। "बिल्कुल वैसी।"
"तो अच्छा है," मैंने कहा। "कम से कम एक चीज़ तो माँ से मिली।"
पापा ने रिया की तरफ़ देखा। वह अब भी दरवाज़े पर खड़ी थी, आँखें सूखी, चेहरा शांत। "तू भी ऐसी ही होगी," उन्होंने धीरे से कहा।
"मैं नानी जैसी हूँ," रिया ने कहा। "माँ ने बताया कि नानी हर चीज़ आज ही करती थीं।"
पापा ने बैग उठाया। धीरे से, जैसे उसमें पत्थर भरे हों।
"मैं जा रहा हूँ," उन्होंने कहा। "मैं तुझे मजबूर नहीं करूँगा। पर एक बात सुन ले।"
वे दरवाज़े की तरफ़ बढ़े, फिर रुके। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आवाज़ में वह सख़्ती लौट आई थी जो बैंक में आवेदकों को डाँटते वक़्त आती थी।
"तेरी माँ ने भी यही ज़िद की थी," उन्होंने कहा। "सुशीला ने भी कहा था — नाम लिखवाओ या गुम हो जाओ, पर मैं अपनी बेटी का नाम खुद लिखूँगी। और उसकी क़ीमत मैंने चुकाई थी।"
"क्या मतलब?" मैंने कहा।
"मतलब, जिस रात उसने नाम लिखवाया, उस रात मुझे हवेली बुलाया गया था," पापा ने कहा। "बाबू हरनाम ने मुझसे कहा था — बेटी का नाम दोगे तो शहर में जगह पाओगे, वरना सड़क पर रहोगे। मैंने हस्ताक्षर कर दिए। और उसके बदले मुझसे कहा गया कि मैं शहर से बाहर रहूँगा। हमेशा। जब वह बोला, तब आऊँगा। एक बार जब मैं अपने आप आ गया, उस रात—"
वे रुके।
"उस रात क्या हुआ?" मैंने पूछा।
"उस रात चाक से लिखा नाम मिट गया था," उन्होंने कहा। "सुशीला के हाथ से। क्योंकि उसने कहा था कि अगर मेरा नाम चाक से लिखा रहेगा, तो रजिस्टर उसे उठा लेगा। और उस रात से मैं शहर से बाहर हूँ। सिर्फ़ फोन पर।"
मैंने पापा की तरफ़ देखा। चालीस साल से मैं उन्हें सिर्फ़ फोन पर जानती थी। दो लाइनें — सब ठीक और पैसे भेज दूँ। और यह वजह थी। वह शहर से दूर थे क्योंकि उन्होंने हस्ताक्षर किए थे।
"तो तुम बंधक हो," मैंने कहा।
"मैं शहर से बाहर हूँ," उन्होंने कहा। "बंधक वह होता है जिसे कुछ याद रहता हो।"
वे गेट से बाहर निकले। भैरों ने गेट खुला रखा। पापा ने एक कदम बाहर रखा, फिर रुके, बिना पलटे।
"मीरा," उन्होंने कहा, "एक बात और। उस रात हवेली में एक और आदमी था। बाबू हरनाम के साथ बैठा था। मैंने उसे बाद में देखा — अस्पताल में, किसी की चारपाई के पास। वह मुझे देखकर मुस्कुराया था, जैसे मुझे जानता हो।"
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