A Dark Secret – Chapter 407
मैंने रिया के हाथ से रजिस्टर लिया। पन्ना पलटा। रामदीन का नाम तो चला गया था, पर उसके नीचे जो पहले रामदीन का पूरा नाम था, वहाँ अब एक लाइन उभरी थी, धुँधली, मिटती हुई, पर पढ़ी जा सकती थी।
"उठाया नहीं जा सकता — दीवार पर लिखा है।"
मैंने रजिस्टर बंद किया, और गाड़ी की सीट पर पीछे सिर टिका दिया। बाहर से शहर के पुराने बाज़ार की बत्तियाँ गुज़र रही थीं, पीली, कम, हाथ से पकड़ी हुई।
"रामदीन ने कमला देवी का नाम बोला," सुधा ने कहा, पीछे से। "अब वह नाम रजिस्टर में है? या नहीं?"
"रजिस्टर में कमला देवी का नाम है," मैंने कहा। "पर रजिस्टर ने उसे अभी तक नहीं उठाया। क्योंकि जो नाम अभी-अभी बोला गया हो, वह उठाने से पहले रजिस्टर को रुकना पड़ता है।"
"क्यों?"
"क्योंकि," मैंने कहा, "जो नाम बोलने वाला नाम के साथ खड़ा हो, वह नाम अभी पूरा नहीं होता। रजिस्टर नाम उठाने से पहले देखता है कि नाम के साथ कौन है।"
मैंने काजल की तरफ़ देखा। "तुम्हें रजिस्टर के बारे में कितना पता है?"
काजल ने मेरी तरफ़ देखा। "जितना मेरे दादा ने लिखा।"
"और वह तुमने मुझसे छिपाया?" मेरी आवाज़ में शिकायत नहीं थी। बस सवाल था। "तुम नाम बोल रहे हो। तुमने अपना नाम खुद वापस लिया, काजल। तुम ने कमला देवी का नाम सुनकर रजिस्टर नहीं छीना। यह अब मेरी लड़ाई नहीं है।"
काजल ने कुछ देर सोचा। "मैं इसलिए नहीं रोक रही थी कि मैं चाहती हूँ कि रजिस्टर तुम्हारा नाम ले," उसने कहा। "मैं इसलिए रोक रही थी कि रजिस्टर को कमला देवी का नाम देना बहुत बड़ी चीज़ है। उसका मतलब है कि मेरे दादा के काग़ज़ों में एक और नाम जुड़ गया है।"
"क्या मतलब?"
"मैंने आज तक वह काग़ज़ किसी को नहीं दिया," काजल ने कहा। "अभी तक नहीं दिया। पर आज रात जब हम कब्रिस्तान जा रहे हैं, मुझे देना पड़ेगा।"
"कौन सा काग़ज़?"
काजल ने अपनी जेब से एक तह किया हुआ पन्ना निकाला। काला काग़ज़, जैसे बहुत पुराना कीमती हो। उस पर हाथ से लिखी एक लाइन थी, काजल की लिखाई में, फीकी स्याही में।
"यह मेरी माँ की है," काजल ने कहा। "उन्होंने अपनी मरने से पहले लिखी थी। मुझे दिया था। कहा था — जब रजिस्टर तोड़ने की बात हो, तब खोलना। और मैंने चालीस साल से इसे खोला नहीं। डरती थी।"
"पर तुम इसे अभी अपने पास रखे हुए हो?"
"कल से," काजल ने कहा। "कल रात, जब रजिस्टर ने रामदीन का नाम लिया, मैंने इसे खोला। और जो अंदर था, उसने मुझे हिला दिया।"
"क्या लिखा है?"
काजल ने पन्ना मेरी तरफ़ बढ़ाया।
एक लाइन थी।
"रजिस्टर एक नाम खुद पढ़ता है — जो सबसे पहले लिखा गया।"
मैंने काजल को देखा। "मतलब?"
"मतलब, रजिस्टर को तोड़ने के लिए हमें जानना होगा कि उसका पहला नाम क्या है। वह नाम जो किसी ने सौदे में सबसे पहला लिखा।"
मैंने रजिस्टर उठाया। आख़िरी पन्ने पर, नीचे कोने में, जहाँ धुँधले निशान थे, मैंने अपनी उँगली फेरी।
स्याही की एक डिबिया उभरी।
"इस पर तारीख़ नहीं," मैंने कहा। "सिर्फ़ एक आदमी का हाथ है।"
"वही बाबू हरनाम सिंह है," सुधा ने कहा, आगे झुककर। "उनका हाथ। मैंने हवेली में उनके काग़ज़ों पर यही हाथ देखा है।"
"तो पहला नाम खोजना होगा," मैंने कहा। "कब्रिस्तान में, आज रात।"
गाड़ी शहर के किनारे की तरफ़ मुड़ गई। सामने पुराना कब्रिस्तान। चारदीवारी, टूटी हुई, ऊपर लोहे के फाटक। और फाटक की दूसरी तरफ़, चौकीदार का छोटा कमरा, जिसमें ट्यूबलाइट जल-बुझ रही थी।
पर आज कुछ अलग था।
कमरे की ट्यूबलाइट नहीं जल रही थी।
कमरा खाली था।
फाटक के बाहर, ज़मीन पर, काग़ज़ पड़ा था — वही पीला, हवेली जैसा।
मैंने गाड़ी रोकी। भैरों उतरा, काग़ज़ उठाया, मेरी तरफ़ बढ़ाया।
पन्ने पर, मनोहर की लिखाई में, एक लाइन थी।
"पहला नाम क़ब्र के नीचे है। पर क़ब्र वह नहीं जो तुम ढूँढ रहे हो।"
मैंने पन्ना पलटा। पीछे एक छोटी लाइन थी, बहुत छोटी, बहुत ठंडी।
"आज रात वह आएगी।"
रिया ने मेरी तरफ़ देखा। "कौन?"
मैंने पन्ना जेब में रखा और फाटक की तरफ़ बढ़ी।
"वही," मैंने कहा, "जिसका नाम किसी ने नहीं लिखा।"
पीछे, गाड़ी के अंदर, रजिस्टर खुद खुल गया। और उसके पहले पन्ने पर एक नाम उभरा, जो कोई नहीं पढ़ सका, क्योंकि वह नाम लिखा ही नहीं गया था। सिर्फ़ उसकी जगह खाली थी, और उस खाली जगह पर एक उँगली का निशान था।
॥
गाड़ी से उतरकर मैं सीधे हवेली के आँगन में गई। रास्ते में कुछ नहीं बोला, क्योंकि जो काग़ज़ भैरों ने फाटक पर उठाया था, वह मेरी जेब में था और मैं उसकी ठंडक महसूस कर रही थी। आँगन में पीली दीवार थी, जिस पर कल रात स्याही से चेतावनी उभरी थी। पर आज वहाँ कुछ और था।
दीवार के कोने पर, ज़मीन से तीन हाथ ऊपर, चाक से लिखा हुआ एक नाम था। फीका, धूल में मिला, पर पढ़ा जा सकता था — रामदीन सिंह चौहान।
मैंने उँगली फेरी। चाक की धूल उँगली पर लगी, स्याही नहीं। यह चालीस साल पुराना निशान था।
"यह मैंने नहीं देखा था," मैंने कहा। "कल भी नहीं।"
सुधा दीवार के पास आई, झुकी, और चाक को गौर से देखा। "क्योंकि कल तक यह स्याही की दीवार के नीचे दबा था," उसने कहा। "रजिस्टर की स्याही जब उभरी, वह चाक को ढक गई। जो चीज़ दबी होती है, वह रजिस्टर के सामने नहीं आती। जो चाक से लिखी होती है, वह कभी नहीं आती।"
"क्यों?"
काजल मेरे पीछे खड़ी थी। "क्योंकि रजिस्टर स्याही पढ़ता है," उसने कहा। "चाक को नहीं। दादा जी ने मुझे बचपन में बताया था — चाक दीवार का नहीं होता, ज़मीन का होता है। वह मिट जाता है। इसीलिए हमारे घर में चाक रखना मना था।"
"तो रामदीन ने खुद यह लिखा था?"
"चालीस साल पहले," सुधा ने कहा। "जिस रात उसने सुनीता का नाम पढ़ा था और बोल नहीं पाया था, उस रात उसने अपना पूरा नाम यहाँ चाक से लिख दिया। सोचा, अगर रजिस्टर मुझे भुला भी दे, यह दीवार याद रखेगी।"
"और यह काम कर गया," मैंने कहा। "रजिस्टर ने उसका नाम उठाया, पर दीवार पर लिखा नाम नहीं उठा सका।"
"जो अपना नाम खुद लिखता है, वह रजिस्टर के बाहर चला जाता है," सुधा ने कहा। "यही सुशीला का तरीक़ा था। वह जानती थी कि रजिस्टर उसका नाम कभी नहीं छोड़ेगा, इसलिए उसने अपना नाम तुम्हारे पास छोड़ दिया। तुम्हारे सपने में। तुम्हारी उँगली पर।"
रजिस्टर मेरे हाथ में गरम था। मैंने उसे खोला। पहले पन्ने पर वही खाली जगह थी, वही उँगली का निशान। कुछ नहीं बदला था।
"तो अब क्या?" काजल ने पूछा। "खरीदार ने कहा था — आज रात कोई आएगी। आधी रात से पहले रजिस्टर जलाना है। और पहला नाम क़ब्र के नीचे है, पर क़ब्र वह नहीं जो हम ढूँढ रहे हैं।"
"सोच रही हूँ," मैंने कहा।
रिया आँगन के दरवाज़े पर खड़ी थी। "माँ," उसने कहा, "अगर चाक से लिखा नाम रजिस्टर नहीं पढ़ता, तो चाक किसने बनाया?"
हम सब रुके।
"क्या मतलब?" मैंने पूछा।
"मतलब, चाक भी तो किसी ने बनाया होगा। किसी कारख़ाने में। आम आदमी के हाथ से चाक दीवार पर लिखा जाता है, तो रजिस्टर उसे नहीं पढ़ता। पर अगर रजिस्टर को हर नाम पढ़ना है, तो उसने चाक को क्यों छोड़ा? क्योंकि चाक का कोई मालिक नहीं होता?"
काजल ने रिया को देखा, जैसे पहली बार देख रही हो। "तुम्हारी बेटी," उसने मुझसे कहा, "मुझसे ज़्यादा सोचती है।"
"तो जवाब दो," रिया ने कहा।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno