A Dark Secret – Chapter 406
काजल तुरंत उठी। उसने रजिस्टर पकड़ा, बंद किया, अपनी छाती से लगाया। जैसे कोई बच्चा किसी को बचाने के लिए अपने शरीर का परदा बना ले।
"रुको!" वह चीखी। "रुको, रामदीन, मत बोलो!"
मैंने उसे हाथ से रोका — नहीं, काजल को रोका। उसने मेरी तरफ़ देखा, आँखों में वही डर। "मीरा, तुम नहीं समझी। अगर वह नाम बोलेगा, रजिस्टर तुरंत उसे ले लेगा। उसका नाम जाता रहेगा। अभी भी वक़्त है — वह डॉक्टर को बुलाए, वह भूल जाए—"
"नाम छिपाने से कोई नहीं बचता," मैंने कहा। मेरी अपनी आवाज़ सुनकर मुझे लगा जैसे यह बात मैंने नहीं, कोई और बोली हो। "चालीस साल से यही हो रहा है। सब नाम छिपा रहे हैं, सब अपने नाम से डर रहे हैं। रामदीन ने चालीस साल अपनी आवाज़ गँवाई।" मैंने काजल से रजिस्टर छीनकर फिर खोला। "अब मत छिपाओ।"
"कमला देवी," रामदीन ने फोन पर कहा। "पीतल गली। मकान नंबर पाँच। वही आवाज़ जो गली में भजन गाती थी। रोज़ सुबह। 'रघुपति राघव राजा राम'। ठीक सात बजे। मैं उस वक़्त एम्बुलेंस में बैठकर सोया रहता था और उसकी आवाज़ से उठ जाता था।"
फोन में उसकी साँस टूटी।
"और एक दिन," उसने कहा, "वह गली से गायब हो गई। और मैंने किसी से नहीं पूछा। किसी को नहीं बताया। क्योंकि मैं डर गया था। मैं डर गया था कि अगर नाम बोलूँगा तो मेरा नाम चला जाएगा। और बाबू हरनाम मेरे पास खड़े थे, वह सब सुन रहे थे, और मैंने मुँह बंद कर लिया।"
रजिस्टर खुला था, उसका पन्ना सामने था। रामदीन का नाम उस पर था। स्याही हिली नहीं, नाम बदला नहीं। पर मैंने देखा — पन्ने के किनारे पर एक नई लाइन उभर रही थी।
"कमला देवी, पीतल गली, मकान नंबर पाँच।"
के नीचे: "बोला गया।"
मैंने काजल को देखा।
"उसने बोल दिया," मैंने कहा। "चालीस साल बाद। उसने नाम बोल दिया।"
काजल की आँखें भर आईं। पर वह रोई नहीं। उसने रजिस्टर मेरी तरफ़ बढ़ाया। "अब देखो।"
मैंने देखा।
रामदीन का नाम गायब हो गया था। पूरा नाम, गली, आवाज़, तारीख़ — सब। जगह पर एक सफ़ेद लकीर ही बची थी। और उसके नीचे लिखा था:
"रामदीन सिंह चौहान — उठा लिया गया।"
मेरा दिल धक् से रह गया।
"रजिस्टर ने उसका नाम ले लिया," मैंने कहा। "यह हो गया। सब ख़त्म।"
फोन पर रामदीन हँसा। हँसी साफ़ थी, बच्चे जैसी, पुरानी और नई एक साथ।
"मीरा," उसने कहा। "मैंने चालीस साल पहले हवेली की दीवार पर चाक से अपना नाम लिख दिया था। वह दिन जब मैंने कमला का नाम सुना था और उसे छिपा लिया था — उसी रात मैं हवेली आया था। बाबू हरनाम के सामने नहीं, उनके पीछे। जब वे सो गए थे। और मैंने आँगन की उस दीवार पर, पीतल गली के उस छोर पर, अपना पूरा नाम लिख दिया था। चाक से। उस दीवार पर जो तुम्हारी दीवार है।"
मैंने पीछे मुड़कर देखा।
आँगन की पीली दीवार। जिस पर पहले "तेरा नाम" उभरा था। जिस पर सुशीला का नाम खुदा मिला था।
मैंने रिया को पकड़ा, और दीवार की तरफ़ भागी।
दीवार पर चूने के नीचे, पीली परत के अंदर, कुछ उभरा हुआ था। मैंने हाथ लगाया। ठंडा। मैंने चाक उठाया — पत्थर के पास पड़ा था, वही चाक जो काजल ने कल छोड़ा था — और पूरी दीवार पर मल दिया।
नीचे के पुराने प्लास्टर पर अक्षर उभरे।
धूल और चूने से भरे, पर साफ़। चाक से लिखा हुआ, चालीस साल पुराना।
"रामदीन सिंह चौहान।"
गली का नाम नहीं। आवाज़ नहीं। सिर्फ़ नाम। पर पूरा नाम। दीवार पर, जो रजिस्टर से बाहर थी।
"इसीलिए," सुधा ने कहा, धीरे से, जैसे खुद से बात कर रही हो, "चालीस साल से वह शहर नहीं छोड़ पाया।"
"क्यों?" भैरों ने पूछा।
"क्योंकि उसका नाम दीवार पर लिखा था," सुधा ने कहा। "और रजिस्टर उसे मिटा नहीं सकता था, क्योंकि वह नाम रजिस्टर में नहीं, ज़मीन पर लिखा था। पर रजिस्टर उसे मिटाने की कोशिश में लगा रहा। उसका नाम जब भी रजिस्टर में लिखा जाता, वह मिट जाता। इसीलिए रामदीन अपना नाम भूल गया था। जो नाम दो जगह लिखा हो, उसमें से एक जगह खाली रहती है। रजिस्टर आधा नाम लिखता, दीवार से आधा माँगता, और दोनों आधे आपस में टकराते।"
"तो अब?" मैंने पूछा।
"अब नाम दीवार पर है। पूरा। रजिस्टर ने उसे अपने पन्ने से मिटा दिया, पर दीवार पर नहीं मिटा सकता। दीवार पर लिखा नाम स्याही से नहीं, चाक से है।"
मैंने फोन उठाया।
"रामदीन," मैंने कहा। "तुमने मुझे बचा लिया।"
"नहीं," उसने कहा। "तुमने बचाया। मैंने सिर्फ़ अपना नाम लिखा था। जो अपना नाम खुद लिखता है, उसे कोई नहीं उठा सकता। यह सुशीला ने तुम्हारी माँ से सीखा था। और उसने तुम्हारे लिए कहीं लिखा था। तुम्हें उस जगह को ढूँढना है।"
"कहाँ?"
"वह जगह," रामदीन ने कहा, "जहाँ से सब शुरू हुआ था।"
फोन कट गया।
मैंने दीवार से हाथ हटाया। चाक की धूल मेरी उँगली पर थी, सफ़ेद, ठंडी, सूखी। रजिस्टर पास में खुला पड़ा था। आख़िरी पन्ने पर खाली जगह में अब भी स्याही हिल रही थी, जैसे किसी ने नाम लिखना चाहा हो और फिर हाथ रोक लिया हो।
"अब क्या?" रिया ने पूछा। उसकी आवाज़ में डर नहीं था। थकान थी, पर वह थकान जो डर को दबा देती है।
"अब," मैंने रजिस्टर उठाया, "हमें वह जगह ढूँढनी है जहाँ से सब शुरू हुआ। और अंदाज़ा है मुझे।"
"कहाँ?" काजल ने पूछा।
"कब्रिस्तान," मैंने कहा। "जहाँ से हवेली बनी थी।"
काजल ने मेरी तरफ़ देखा, और पहली बार उसकी आँखों में कुछ और था। डर नहीं था — कुछ और। जैसे किसी ने उसे ऐसी जगह का नाम बता दिया हो जिसे वह बरसों से भूली हुई थी।
"मैं जानती हूँ वह जगह," उसने कहा। "मेरे दादा मुझे बचपन में वहाँ ले जाते थे। एक क़ब्र के पास खड़े होते थे, जिस पर कोई नाम नहीं था, और कहते थे — यहाँ से सब शुरू हुआ था।"
"आज रात," मैंने कहा। "आधी रात से पहले।"
भैरों ने गाड़ी की चाबी जेब से निकाली। रिया ने रजिस्टर अपनी बगल में दबाया। सुधा ने दीया बुझाया, और उसकी लौ से एक धुआँ उठा जो सीधा ऊपर गया, जैसे किसी ने उसे रोका नहीं था।
हम आँगन से बाहर निकले।
दीवार पर चाक से लिखा रामदीन का नाम, अँधेरे में, चाँदनी में, साफ़ दिख रहा था।
और हवेली के ऊपर की मंज़िल पर, खिड़की के पर्दे के पीछे, कोई खड़ा था। मुझे नहीं पता कौन, पर उसके हाथ में कुछ था जो चमक रहा था। पीतल की कलम।
काजल ने भी देखा। उसने मेरा हाथ पकड़ा।
"मीरा," उसने फुसफुसाया, "वह पतली औरत है। वही जो तस्वीर में थी।"
मैंने आँखें झुकाईं। खिड़की खाली थी।
"चलो," मैंने कहा।
हम गाड़ी में बैठे और भैरों ने गाड़ी आगे बढ़ाई। पीछे हवेली की पीली दीवार छोटी होती गई, और उस पर लिखा नाम, जो चालीस साल से छिपा था, अब पहली बार किसी ने पढ़ा था।
रिया ने गाड़ी की खिड़की से बाहर देखा।
"माँ," उसने कहा। "अगर रामदीन का नाम अब भी दीवार पर है, तो उसका नाम कोई नहीं उठा सकता। ना?"
"ना," मैंने कहा।
"तो रजिस्टर ने उसे क्यों उठा दिया?"
मैंने गाड़ी धीमी की। "क्योंकि रजिस्टर उसू दीवार को नहीं जानता," मैंने कहा। "वह सिर्फ़ अपने पन्ने जानता है। और उसने अपने पन्ने से नाम मिटा दिया। पर जिसका नाम दीवार पर है, वह ज़िंदा है।"
"तो उसे उठाया गया या नहीं?"
भैरों ने पीछे से कहा, बिना मुड़े, "दीवार पर लिखा नाम अभी भी है। जब तक दीवार खड़ी है, रामदीन खड़ा है।"
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