A Dark Secret – Chapter 405
"और अगर जला दिया, तो?"
"तो मेरी आवाज़ लौट आएगी. और जो नाम चालीस साल से अटका है, वह आज़ाद हो जाएगा." उसने मेरी तरफ़ देखा. "सरोज. उसका नाम सरोज है. सरोज बाई. पड़ाव गली की। पिछली गली। वह मेरी…"
तभी मशीन ज़ोर से बजी. डॉक्टर और नर्स दौड़कर अंदर आए. "बाहर जाइए," डॉक्टर ने कहा. "अभी."
हम बाहर आए. रिया का हाथ मेरे हाथ में था. भैरों दीवार से टिका खड़ा था. "सरोज बाई," उसने धीमे से दोहराया. "पड़ाव गली की पिछली गली. वह तो… वह तो वही गली है जहाँ काजल के दादा की हवेली है."
मैंने रिया को देखा. "रजिस्टर कहाँ है?"
"गाड़ी में. पिछली सीट पर."
"जल्दी चल."
हम नीचे भागे. गाड़ी का दरवाज़ा खोला तो रजिस्टर वहीं पड़ा था. पर कुछ गड़बड़ थी. वह खुला था, और उसके पन्ने हवा में फड़फड़ा रहे थे, हालाँकि गाड़ी के अंदर हवा नहीं थी.
रिया ने हाथ बढ़ाया. "माँ, इसे मत छू."
"क्यों?"
"क्योंकि यह अब वैसा नहीं है." उसने पन्नों को देखा. "यह खुद बदल रहा है. देख — पहले पन्ने पर जो लिखा था, वह मिट गया है."
मैंने झुककर देखा. सच में, पहले पन्ने पर सिर्फ़ धुँधला निशान बचा था, जैसे स्याही उड़ गई हो. और आख़िरी पन्ना — वही जो अभी रामदीन का नाम दिखा रहा था — अब खाली था.
"यह नाम कहाँ गया?" रिया ने पूछा.
"इसने अपना नाम वापस ले लिया," मैंने कहा. "क्योंकि असली रामदीन जाग गया है. और अब रजिस्टर को नया नाम चाहिए. नया शिकार."
रिया ने रजिस्टर के आख़िरी पन्ने को छुआ. उसकी उँगली स्याही में डूबी. और तभी वह पन्ना फड़फड़ाया — ज़ोर से, जैसे किसी चिड़िया के पंख. और उस पर एक नाम उभरने लगा.
रिया ने पढ़ा, और उसकी आवाज़ रुक गई.
"माँ…"
"क्या?"
"यह तेरा नाम नहीं है." उसने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में पानी था. "और मेरा भी नहीं."
"तो किसका है?"
"रामदीन का," उसने कहा. "यह रजिस्टर मेरा नाम नहीं माँग रहा. यह रामदीन का नाम माँग रहा है. पूरा. रामदीन सिंह चौहान. गली छह, पड़ाव गली." उसने पन्ने को मेरी तरफ़ घुमाया. "और नीचे एक लाइन है — 'आवाज़ लौटाने का वक़्त आ गया है.'"
मैंने पन्ना अपने हाथ में लिया। स्याही अभी गीली थी, और उँगली पर लग रही थी. और तभी मुझे महसूस हुआ — रजिस्टर ठंडा नहीं था. वह गरम था. जैसे किसी ने अभी-अभी उसे आँच पर रखा हो.
"अब क्या?" भैरों ने पूछा.
मैंने रजिस्टर बंद किया, और अपनी जेब से वह आधा जला पन्ना निकाला. दोनों को साथ रखा.
"अब हम सरोज बाई को ढूँढेंगे," मैंने कहा. "आधी रात से पहले. क्योंकि अगर रजिस्टर को रामदीन का नाम चाहिए, तो सरोज ही बता सकती है कि वह नाम कैसे पूरा होगा. और क्यों रामदीन ने चालीस साल तक उसे भीतर क़ैद रखा."
रिया ने मेरा हाथ पकड़ा. "माँ, और अगर सरोज बाई मर चुकी हो?"
मैंने आधा जला पन्ना देखा. "तो यह पन्ना जलता क्यों? जो मर गया, उसका नाम आग में नहीं जलता."
हम गाड़ी में बैठे. भैरों ने गाड़ी आगे बढ़ाई. और पीछे, अस्पताल की खिड़की से, किसी ने पर्दा हटाया — मैंने देखा, तीसरी मंज़िल की खिड़की पर रामदीन खड़ा था, अपने पलंग से उठकर, और उसके होंठ हिल रहे थे. मेरा नाम.
या शायद सरोज का.
॥
गाड़ी हवेली की गली में घुसी तो पिछला दरवाज़ा खुला था। मैंने गाड़ी रोकी और तीनों उतरे। भैरों पहले आगे गया, फिर हाथ से इशारा किया कि कोई नहीं है। हम अंदर आए। काजल पहले से आँगन में खड़ी थी, हाथ में एक तेल का दीया, जो उसने सुधा को पकड़ा दिया।
"सरोज बाई मिली?" मैंने पूछा।
"नहीं," काजल ने कहा। "पिछली गली में सिर्फ़ बंद मकान हैं। जिनमें ताले लगे हैं, वहाँ कुछ नहीं। जिनमें ताले नहीं, वहाँ भी कुछ नहीं। कोई दरवाज़ा नहीं खुला।"
"तो सरोज बाई नहीं हैं।"
"मैं यह नहीं कह रही," काजल ने कहा। "मैं यह कह रही हूँ कि मुझे याद नहीं आ रहा। और मुझे याद नहीं आ रहा, इसका मतलब है कि रजिस्टर मुझे कुछ और भुला रहा है।"
सुधा दीये के साथ आँगन के बीच रखे पत्थर के पास बैठ गई। "रजिस्टर दिखाओ," उसने कहा।
रिया ने रजिस्टर मेरी तरफ़ बढ़ाया। मैंने उसे पत्थर पर रखा, पर मेरा हाथ उस पर ठहरा नहीं। वह गरम था, बहुत गरम। जैसे कोई चूल्हे पर रखकर भूल गया हो।
"इसे खोलो," सुधा ने कहा।
मैंने खोला। पन्ने अपने आप पलटे — पहले पन्ने पर धुँधला निशान, दूसरे पर खाली, तीसरे पर हल्की स्याही की लकीरें, जैसे किसी ने भागते-भागते लिखा हो और फिर उसी को मिटा दिया हो। और फिर पन्ने रुके। एक पन्ने पर साफ़ नाम लिखा था।
रामदीन सिंह चौहान।
गली छह, पड़ाव गली।
नेवला बाज़ार वाली आवाज़।
"यह पूरा नाम है," रिया ने धीरे से कहा। "माँ, यह पूरा नाम है। पहले पूरा नहीं था। पहले सिर्फ़ रामदीन था, गली भी आधी थी।"
मैंने नाम के नीचे देखा। तारीख़।
आज की तारीख़।
"यह क्या है?" मैंने काजल की तरफ़ देखा। "यह क्या हो रहा है?"
काजल पत्थर के पास झुकी, नाम पढ़ा। उसका चेहरा बदला — नहीं, बदला नहीं, सिकुड़ा। जैसे किसी ने उसके चेहरे पर स्याही फेर दी हो।
"यह उठाने की तैयारी है," उसने कहा। "रामदीन का नाम आज का दिन। रजिस्टर उसे उठाएगा। आज रात।"
"क्यों?" भैरों ने पूछा। उसने पहली बार सवाल किया था।
क्योंकि उसने अपना नाम वापस ले लिया," सुधा ने कहा। "जो अपना नाम वापस ले, रजिस्टर उसे बर्दाश्त नहीं करता। जो नाम लौटकर आता है, वह नाम रजिस्टर के लिए ख़तरनाक है। तो वह उसे उठा देता है। पूरा। हमेशा के लिए।"
मैंने रजिस्टर बंद किया। मेरी उँगली पर स्याही लगी — काली, ठंडी, गोंद जैसी महक वाली। मैंने उसे पोंछा। निशान नहीं गया।
"रामदीन कहाँ है?"
"अस्पताल में," भैरों ने कहा। "अभी खिड़की पर खड़ा था।"
"तो कोई उसे वहाँ से निकालेगा कैसे? डॉक्टर ने तो सबको बाहर किया।"
कोई जवाब नहीं दिया। आँगन में पीपल का पेड़ था, बड़ा, पुराना, जिसकी जड़ें पत्थर की दीवार तोड़कर बाहर आ रही थीं। उसकी पत्तियाँ हिल रही थीं, हालाँकि हवा नहीं थी।
तभी फोन बजा।
मेरे जेब में। रामदीन का नंबर। मैंने उठाया।
"मीरा।" उसकी आवाज़ आई। साफ़ थी, पहली बार साफ़। "खिड़की से देखा तुम्हें। गाड़ी में।"
"तुम ठीक हो?"
"मैं ठीक हूँ।" वह रुका, साँस ली, फिर बोला। "पर मैं जानता हूँ कि रजिस्टर ने मेरा नाम पूरा कर दिया है। मुझे नाम में पूरी तारीख़ दिख रही है। मेरी नज़र के सामने आज की तारीख़ लिखी है। यह मतलब है कि आज रात मेरा नाम उठेगा।"
"हम तुम्हें बचाएँगे।"
"सुनो," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वही चालीस साल पुरानी सुस्ती लौटी। "मैं मरने से नहीं डरता। पर एक बात है जो चालीस साल से मेरे भीतर अटकी है। वह औरत। जिसका नाम मैं बोलना चाहता था। जिसे देखकर मैंने एक बार चाक से अस्पताल की दीवार पर लिख दिया था, और फिर पूरा नाम बोलने से डर गया।"
"रामदीन, अभी मत—"
"मैं नाम बोलूँगा।" उसकी आवाज़ में कोई काँप नहीं थी। "आज। अभी। तुम्हारे सामने। तुम वहाँ हो, हवेली में, रजिस्टर तुम्हारे सामने है। सुन रही हो?"
"सुन रही हूँ।" मेरी आवाज़ कहीं से आई।
"तो सुनो।" वह रुका। अस्पताल की मशीन पीछे कुछ कह रही थी, दूर, धीमी। "वह औरत…" वह फिर रुका। इस बार ज़्यादा देर। "…कमला देवी थी।"
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