A Dark Secret – Chapter 404
काजल ने कहा, "मैं… मैं कोशिश करूँगी।"
"कोशिश नहीं। करना है।"
वह चली गई हवेली के अंदर, और भैरों उसके पीछे चला। मैंने रिया को गले लगाया।
"माँ," रिया ने कहा, "तेरी आवाज़ रजिस्टर माँग रहा है?"
"नहीं। रामदीन की।"
"तो अगर रामदीन अपनी आवाज़ देगा, तो वह…"
"वह नाम बोल पाएगा। और नाम बोलना ही आवाज़ देना है।" मैंने उसे छोड़ा। "अब सुन, तेरी उँगली पर जो स्याही का निशान था, वह सपने में आता था। अब मुझे सपना आता है। कल रात छोड़कर।"
"क्यों?"
"क्योंकि रजिस्टर ने अपनी दिशा बदल दी है। पहले वह मुझे बुलाता था, अब तुझे।"
रिया ने अपनी ओर देखा। "मेरे सपने में दीवार खाली है।"
"अभी। पर आज रात आधी रात को वह भर जाएगी।"
हवेली के अंदर से एक आवाज़ आई — काजल की। "मैंने एक चीज़ याद कर ली!"
हम दौड़कर अंदर गए। काजल पहले कमरे में खड़ी थी और सामने दीवार पर टँगी बाबू हरनाम की तस्वीर के नीचे एक पुराना लकड़ी का बक्सा था, जो खुला पड़ा था।
"इसमें काग़ज़ थे," काजल बोली। "मैंने इन्हें जलाया नहीं था। मैंने इन्हें छिपाया था। पर आज मुझे याद आया कि मैंने इन्हें कहाँ छिपाया था।"
उसने बक्से से एक काग़ज़ निकाला। पुराना, मुड़ा हुआ, जिस पर बाबू हरनाम की लिखाई थी। मैंने पढ़ा और मेरी साँस रुक गई।
"यह तो मेरी माँ की लिखाई है," मैंने कहा।
काजल ने देखा। "नहीं। यह सुशीला ने नहीं लिखा। यह मेरे दादा ने लिखा था, पर लिखवाया सुशीला से था। यह उसकी आवाज़ में है।"
मैंने पढ़ा। काग़ज़ पर एक लाइन थी — "मेरी बेटी का नाम मीरा सुशीला जोशी नहीं है। मेरी बेटी का नाम रिया है। यह नाम रजिस्टर में नहीं है। इसे कभी नहीं लिखना।"
मैंने काग़ज़ को मोड़कर जेब में रखा। मेरे हाथ काँप रहे थे।
रिया ने पूछा, "अब?"
मैंने कहा, "अब हम रात का इंतज़ार नहीं करेंगे। अब हम अभी से तैयारी करेंगे। जो नाम चाहिए, सब इकट्ठे करेंगे। एक-एक। माँ से लेकर उस आख़िरी औरत तक, जिसका नाम रामदीन चालीस साल से याद रखना चाहता था।"
तभी आँगन से सुधा की आवाज़ आई। "मीरा! जल्दी आ! रजिस्टर!"
हम भागकर बाहर गए। रजिस्टर आँगन की दीवार के साथ पड़ा था, और उसके पन्ने अपने आप उलट रहे थे — तेज़, तेज़, तेज़, जैसे कोई हवा उन्हें पलट रही हो।
फिर पन्ने रुके। और आख़िरी पन्ने पर, गीली स्याही में, एक नाम उभरा।
रिया ने आगे झुककर पढ़ा, और उसकी आवाज़ धीमी हो गई।
"माँ… यह तेरा नाम नहीं है।"
मैंने पूछा, "किसका है?"
"रामदीन का।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "पूरा नाम। रामदीन सिंह चौहान। गली छह, पड़ाव गली। और नीचे एक लाइन — 'आवाज़ लौटाने का वक़्त आ गया है।'"
मेरे पीछे, हवेली के दरवाज़े पर, भैरों की आवाज़ आई। "मीरा," उसने धीमे से कहा। "अस्पताल से फोन आया है। रामदीन…"
मैं मुड़ी।
"वह बोल रहा है," भैरों ने कहा। "अभी। फोन पर। पर… वह अपनी आवाज़ में बोल रहा है, और उसकी आवाज़ किसी और की आवाज़ है।"
मैंने रिया का हाथ पकड़ा और गाड़ी की तरफ़ भागी। मेरी जेब में पन्ना था, और उस पर सिर्फ़ आधा नाम — "सरो…" — अब भी बचा हुआ था।
गाड़ी में बैठते ही रिया ने कहा, "माँ, वह पन्ना जेब से निकाल."
मैंने निकाला. सरो… बस इतना. बाकी जगह जली हुई, काली, मुड़ी हुई. जैसे किसी ने माचिस से आग लगाई हो और बीच में से बचा लिया हो.
रिया ने पन्ने को देखा और बोली, "सरोज?"
"हो सकता है."
"या सरोजिनी? या सरोजा?"
"पता नहीं. पर रामदीन चालीस साल से जिसका नाम याद रखना चाहता था, वह कोई औरत है. और वह औरत इस गली में रहती थी. या रहती है."
भैरों ने गाड़ी तेज़ की. सड़क पर पत्थर थे, गाड़ी उछल रही थी. मेरे हाथ में पन्ना काँप रहा था, या मेरे हाथ काँप रहे थे, यह मैं नहीं जानती.
अस्पताल पहुँचे तो रिसेप्शन पर एक नर्स बैठी थी. भैरों ने कहा, "रामदीन सिंह चौहान. कमरा नंबर…"
"तीसरा," नर्स ने कहा. "पर अभी कोई नहीं जा सकता. डॉक्टर अंदर हैं."
"हमें जाना है," मैंने कहा.
"मैडम, नियम है."
मैंने उसकी आँखों में देखा. "उस आदमी ने चालीस साल से एक भी शब्द नहीं बोला है. आज उसने बोला है. और वह मेरा नाम ले रहा है. नियम बाद में देखेंगे."
नर्स मेरी तरफ़ देखती रही. फिर उसने काग़ज़ पर कुछ लिखा और कहा, "पहली मंज़िल, दायीं तरफ़ आख़िरी कमरा. पाँच मिनट."
हम सीढ़ियाँ चढ़े. भैरों पीछे था, रिया मेरे साथ. कमरे के बाहर डॉक्टर खड़े थे, और वे किसी से फोन पर बात कर रहे थे.
"डॉक्टर साहब," मैंने कहा.
उन्होंने फोन रखा. "आप कौन?"
"मीरा जोशी. यह हवेली वाली मीरा हूँ."
उनका चेहरा बदला. "मरीज़ सिर्फ़ आपका नाम ले रहा है. बार-बार. हमें समझ नहीं आ रहा. उसके ब्रेन में जो गड़बड़ी थी, वह…"
"वह ठीक हो रहा है," मैंने कहा. "भीतर जा सकती हूँ?"
"एक मिनट," उन्होंने कहा. "पर एक बात. उसकी आवाज़… वह अपनी आवाज़ में नहीं बोल रहा. जैसे कोई और बोल रहा हो. मैंने ऐसा पहले कभी नहीं देखा."
मैंने किवाड़ खोला.
रामदीन पलंग पर लेटा था. पतला, सूखा, सफ़ेद दाढ़ी. उसकी आँखें खुली थीं और छत की तरफ़ देख रही थीं. उसके होंठ हिल रहे थे.
"मीरा…" उसने कहा. आवाज़ आई — भारी, गहरी, जैसे किसी पुराने कुएँ से आ रही हो. "मीरा, तू आ गई."
मैं पलंग के पास गई. "तुम बोल रहे हो."
"मैं नहीं बोल रहा," उसने कहा, और उसकी आँखें मेरी तरफ़ घूमीं. "जो मेरे अंदर है, वह बोल रहा है. मैं तो सिर्फ़ मुँह हूँ."
रिया ने पीछे से कहा, "माँ, उसकी आवाज़…"
"मैं जानती हूँ," मैंने कहा. "यह बाबू हरनाम की आवाज़ है. वही आवाज़ जो पन्ने पर थी."
रामदीन हँसा, और वह हँसी डरावनी थी, क्योंकि होंठ रामदीन के थे और आवाज़ किसी मरे हुए आदमी की. "सही पहचाना. अब सुन." उसकी आवाज़ सख़्त हुई. "मेरे रजिस्टर तक तू पहुँच गई. मेरी मुहर तोड़ने की तैयारी में है. मगर एक बात भूल रही है. रजिस्टर तेरा नाम नहीं माँगता. रजिस्टर आवाज़ माँगता है. और आवाज़ तभी लौटेगी जब तू अपना नाम भूल जाएगी. हमेशा के लिए."
रिया ने कहा, "नहीं."
"हाँ," आवाज़ ने कहा. "देख, मैंने बीस साल पहले सुशीला को भी यही चुनाव दिया था. उसने अपना नाम दे दिया. और उसका नाम रजिस्टर से मिट गया. आज उसका नाम किसी को याद नहीं. तू भी भूल जाएगी. और तेरी बेटी तुझे भूल जाएगी."
मैंने पन्ना जेब से निकाला. "तो यह जला हुआ पन्ना क्यों है? अगर तुम इतने ताक़तवर हो, तो नाम पूरा क्यों नहीं बचा?"
आवाज़ रुकी. एक पल के लिए कमरे में सिर्फ़ मशीन की बीप सुनाई दी.
"क्योंकि कोई और है," मैंने कहा. "जिसने इसे जलाया. जो चालीस साल से इस रजिस्टर से लड़ रहा है. वह रामदीन है. असली रामदीन. जिसने तुम्हें अपने अंदर क़ैद कर रखा था. और आज वह जाग गया है."
रामदीन का शरीर हिला. उसके होंठ काँपे. और फिर आवाज़ बदली — पतली, थकी, फटी हुई. "मीरा…" यह दूसरी आवाज़ थी. "मीरा, मैं रामदीन हूँ. सच्चा. वह मेरे भीतर से बोल रहा था. मैंने चालीस साल उसे भीतर रखा. पर अब वह बहुत ताक़तवर हो गया है. तेरे पास वक़्त कम है."
"कितना?"
"आज आधी रात. उससे पहले रजिस्टर जलाना होगा. पूरा. हर पन्ना. वरना वह तेरा नाम ले लेगा."
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno