A Dark Secret – Chapter 403
"देख रही है?" उसने कहा। "यह पूरा पन्ना है। तेरे सुशीला के नाम वाला। और तेरे बाबू के नाम वाला भी।"
मैंने कहा, "तूने कहा था कि कल सुबह तक का वक़्त है। सुबह अभी आई नहीं।"
"सुबह आने वाली है। और उससे पहले मैं तुझे एक आख़िरी बात कहने आया हूँ।" उसने पन्ने को अपनी हथेली पर रखा। "तेरे पास रजिस्टर है, पर उस रजिस्टर में तेरा नाम नहीं। तेरे पास स्याही है, पर उस स्याही से तू सिर्फ़ अपना नाम बचा सकती है। तेरे पास रामदीन है, पर रामदीन की आवाज़ आज रात बोलेगी या नहीं, यह तू नहीं जानती।"
उसने पन्ना फिर लहराया।
"मुझे हवेली का पिछला दरवाज़ा दे दे। बस दरवाज़ा। वह कुएँ वाली सीढ़ियों तक जाता है। उसके नीचे जो है, वह मेरा है। बदले में यह पन्ना तेरा। और सुशीला का नाम दीवारों से उतर जाएगा। और रामदीन की आवाज़ कभी नहीं रुकेगी।"
मैंने कहा, "नहीं।"
वह मुस्कुराया। "सोच ले।"
"सोच लिया। जब मैं आठ साल की थी, मेरी माँ ने मुझे सिखाया था कि चीज़ें कभी इसलिए नहीं देते कि कोई डरा रहा है।" मैंने एक कदम आगे रखा। "और तेरे पास जो पन्ना है, वह हवेली का पिछला दरवाज़ा माँगकर नहीं बिकता। उसकी कीमत वह औरत है जो उस दरवाज़े के नीचे चालीस साल से बैठी है। और मैं उसे बेचने नहीं आई।"
खरीदार की आँखें झुकी हुई थीं, फिर उसने पन्ना खोल लिया।
"तेरी मर्ज़ी," उसने कहा। "पर पन्ना अकेला नहीं पढ़ा जाता।"
और उसने ज़ोर से पढ़ना शुरू किया।
मैंने उसकी आवाज़ सुनी और मेरे पीर में कुछ ठंडा सरक गया। उसकी आवाज़ बदल रही थी — जैसे कोई पुराना टेप चल रहा हो। वह बाबू हरनाम की आवाज़ में बोल रहा था।
"शर्त पहली — जो इस सौदे में नाम देगा, उसका नाम कभी नहीं उठेगा। शर्त दूसरी — जो रखवाला होगा, वह शहर नहीं छोड़ेगा। शर्त तीसरी — जो तोड़ने निकलेगा, उसे हर वह नाम याद होना चाहिए जो इस शहर ने दिया है। ज़िंदा या मरा, हर नाम। एक नाम छूटा — और सब उलट जाएगा।"
गली की हवा भारी हो गई। मुझे अपना ही साँस सुनाई देने लगा। दीवारों पर कुछ उभर रहा था — पुरानी स्याही की लकीरें, जो खरीदार की आवाज़ के साथ साथ चल रही थीं।
पीछे से रिया की आवाज़ आई, घबराई हुई। "माँ… रजिस्टर ठंडा हो रहा है। मेरे हाथ से चिपक रहा है।"
मैंने पीछे मुड़कर देखा। रिया ने खिड़की से हाथ बाहर निकाला था, और उसकी उँगलियों पर रजिस्टर की जिल्द चिपकी हुई थी, जैसे वह उसे छोड़ना ही नहीं चाहती थी।
सुधा गाड़ी से कूदकर नीचे आई। "पन्ना पढ़ना बंद कर!" वह चिल्लाई। "जितना पढ़ेगा, उतना रजिस्टर सुनता जाएगा! और रजिस्टर जो सुनता है, वह याद रखता है!"
खरीदार नहीं रुका। उसने शर्त चौथी पढ़नी शुरू की।
भैरों आगे बढ़ा। दो कदम में उसने खरीदार की कलाई पकड़ ली, और मैंने देखा — खरीदार की कलाई पर वही काला धागा था, जो बूढ़े की कलाई पर था। धागा अब कस रहा था, बहुत कस रहा था, और खरीदार का हाथ धागे के नीचे नीला पड़ रहा था।
खरीदार ने उसे झटका दिया, और वह भीड़ में पीछे हट गया। मैंने रिया की तरफ़ देखा — रजिस्टर उसके हाथ से छूट रहा था, जैसे किसी ने उसे खींचा हो।
"भैरों!" मैं चिल्लाई। "रिया को पकड़!"
भैरों ने पीछे मुड़कर देखा, और जब तक वह गाड़ी की तरफ़ बढ़ा, खरीदार गली के मोड़ पर पहुँच गया। एक क्षण के लिए मुझे उसका चेहरा दिखा, और फिर वह अंधेरे में मिल गया। उसके साथी भी नहीं दिखे। जैसे वे कभी थे ही नहीं।
गली में सिर्फ़ हम बचे थे, और मिट्टी पर पड़ा वह पीला पन्ना।
मैंने उसे उठाया। पन्ना अब पूरा नहीं था। आधा जल चुका था, और जो बचा था, उस पर एक नाम था, आधा — "सरो…" और बाकी राख।
सुधा मेरे पास आई और उसने पन्ने पर हाथ रखा। "उसने शर्त पढ़ दी," वह धीरे बोली। "अब रजिस्टर सब सुन चुका है। अब वह हर उस चीज़ पर नज़र रखेगा जो हम करेंगे।"
मैंने पन्ने को अपनी जेब में रखा और रिया की तरफ़ बढ़ी। रजिस्टर अब भी उसके हाथ में था, पर ठंडा नहीं — बस साधारण काग़ज़ जैसा।
रिया ने मेरी तरफ़ देखा। "माँ… रजिस्टर का आख़िरी पन्ना फड़फड़ा रहा था। मैंने देखा। जब भैरों उसे पकड़ने आया, तब।"
"क्या था उस पर?"
वह कुछ देर चुप रही। फिर बोली, "तेरा नाम नहीं था।"
मेरा पेट हल्का हुआ।
"रामदीन का था," उसने कहा। "बड़ी-बड़ी स्याही में। और नीचे एक लाइन थी — 'आवाज़ आज माँगी जाएगी।'"
भैरों ने कहा, "हवेली चलें। कोई यहाँ रुकेगा नहीं।"
हम गाड़ी में बैठे। काजल पहले से पीछे बैठी थी, हाथ जोड़े हुए, आँखें बंद। जब गाड़ी चली, तो उसने आँखें खोलीं और मेरी तरफ़ देखा।
"मीरा," उसने कहा। "तूने मेरे दादा की शर्त पढ़ने दी।"
"मैंने नहीं दी। उसने पढ़ी।"
"फ़र्क़ नहीं पड़ता। अब रजिस्टर सुन चुका है। और जो सुनता है, वह माँगता है।" उसकी आवाज़ धीमी थी। "मेरा दादा चालीस साल पहले इसी तरह फँसा था। उसने भी सुना था, और फिर उसने कभी अपना असली नाम नहीं बोला, इसलिए वह पूरा नहीं हुआ।"
रिया ने कहा, "पर आपका नाम तो लौट आया था? उस रात कोठरी में?"
काजल ने कहा, "लौटा था। पर पूरा नहीं। मुझे अपनी गली याद नहीं आती। मुझे याद है कि बचपन में मैं हवेली के पीछे खेलती थी, पर गली का नाम भूल गई हूँ। रजिस्टर ने मुझसे वह छीन लिया।"
गाड़ी हवेली के सामने रुकी।
हवेली का गेट खुला था। और गेट पर कोई नहीं था।
भैरों पहले उतरा, फिर हम। मैंने रिया का हाथ पकड़ा और उसे अपने साथ रखा। काजल पीछे थी, और सुधा सबसे पीछे।
आँगन में जलती हुई एक लालटेन रखी थी। उसके नीचे एक काग़ज़ था जिस पर कुछ लिखा था। मैंने काग़ज़ उठाया और पढ़ा — "तेरी आवाज़ का इंतज़ार है। आज आधी रात। जहाँ तेरा नाम पहली बार लिखा गया था।"
रिया ने कहा, "माँ, जहाँ तेरा नाम पहले लिखा गया था?"
मैंने कहा, "मेरा नहीं। तेरा।" मैं उसकी तरफ़ मुड़ी। "जहाँ रजिस्टर में पहली बार तेरा नाम लिखा गया था — वह रोज़ तेरे सपने में आता है। मुझे सपने में दीवार दिखती है, जिस पर उँगली से नाम लिखा है। पर वह मेरा नाम नहीं है।"
रिया ने देखा, और उसकी आँखें डर से नहीं, बल्कि समझ से भर गईं। "वह मेरा नाम है?"
"बाई ने कहा था कि मेरा नाम रजिस्टर ने खुद बदला था। माँ ने मेरा नाम तेरा कर दिया था। तेरे जन्म से पहले। उसने अपना नाम तेरे नाम के साथ बदल दिया। दोनों एक साथ।"
काजल ने कहा, "इसीलिए रजिस्टर तुझे पहचानता नहीं। वह तुझे मीरा समझता है, पर तू मीरा नहीं है। तू रिया है।"
मैंने काजल की तरफ़ देखा। "तू जानती थी?"
"मुझे सब कल रात पता चला," काजल ने कहा। "जब बाई ने बताया।" उसकी आवाज़ में कुछ और था, जो पहले नहीं था। "मुझे पता चला कि मेरे दादा ने तेरी माँ से एक और वादा लिया था — कि तू बड़ी होगी और एक दिन रजिस्टर को खुद पढ़ेगी। और उस वादे के लिए उसने तेरी माँ को कुएँ के नीचे रखा था।"
रिया ने कहा, "तो अब क्या?"
मैंने कहा, "अब हम इंतज़ार करते हैं। आधी रात का।"
मैंने रजिस्टर माँगा। रिया ने दिया। मैंने उसे आँगन की दीवार के साथ रखा, और सुधा ने उस पर स्याही की पुड़िया खोल दी।
मैंने कहा, "काजल, तुझे एक काम देना है।"
"क्या?"
"तेरे दादा ने इस हवेली में एक तिजोरी में चीज़ें रखी थीं। उनमें से कौन सी चीज़ें तूने खुद मिटाई थीं? सब याद कर। रात तक। क्योंकि आधी रात को जब रामदीन यहाँ आएगा, तब हमें तेरे दादा की हर शर्त गिननी होगी।"
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