A Dark Secret402 / 536

A Dark Secret – Chapter 402

6 min read November 6, 2026

खरीदार ने एक पल भैरों की तरफ़ देखा, और उस एक पल में उसका हाथ ढीला पड़ा।

काजल ने मौक़ा पकड़ा। वह आगे बढ़ी और उसके हाथ से पन्ना खींच लिया।

खरीदार ने पीछे हटकर अपनी कलाई पकड़ी। उस पर काला धागा बँधा था — वही धागा जैसा बूढ़े की कलाई पर था। धागा ज़ोर से कस रहा था, उसकी त्वचा पर निशान बन रहा था।

"तुम्हारा भी नाम है," मैंने कहा।

वह नहीं बोला।

"किसने लिखा?"

वह पीछे हटता गया, गली के अंधेरे में। "मैं तुम्हें नहीं बताऊँगा।"

"तो जा," मैंने कहा। "जब तक तेरा नाम तुझसे पूरा नहीं छिन जाता, तब तक भाग। पर फिर तू लौटेगा — हर कोई लौटता है।"

खरीदार भाग गया। उसके कदमों की आवाज़ गली में गूँजती रही, फिर चली गई।

काजल के हाथ में वह पन्ना था। उसने उसे खोला। दोनों तरफ़ पीला काग़ज़ था, किनारों से जला हुआ, और बीच में स्याही से एक आख़िरी लाइन लिखी थी — "सौदा तोड़ने वाले को हर नाम याद होना चाहिए। एक भी नाम छूटा, तो नाम उसका हो जाएगा।"

रिया मेरे पास आई। उसने पन्ना देखा और कहा, "माँ, हर नाम याद रखना… मतलब सब?"

"हाँ।"

"कितने?"

बूढ़ी औरत ने दरवाज़े से कहा, "इकतालीस नाम अब तक रजिस्टर में दर्ज हैं। कुछ और हैं जो कभी दर्ज नहीं हुए, पर उनका नाम है। असली गिनती किसी को नहीं पता।"

काजल ने पन्ना मेरी तरफ़ बढ़ाया। "यह तेरे पास रहेगा।"

मैंने लिया। पन्ना हल्का था, पर मेरे हाथ में भारी लग रहा था।

बूढ़ी औरत ने कहा, "अंदर चलो। तुम्हें वह सब देखना चाहिए जो मेरे पास है।"

हम आँगन में लौटे। वह हमें उन घड़ों के पास ले गई जो ढके हुए थे। उसने पहला ढक्कन उठाया। अंदर काली स्याही थी।

"ये चालीस साल की स्याही हैं," उसने कहा। "हर घड़ा एक साल का है। हर घड़े में उन नामों की स्याही है जो उस साल उठाए गए।"

काजल के चेहरे का रंग उड़ गया। "मतलब… यहाँ?"

"यहाँ हर नाम है," बूढ़ी औरत ने कहा। "इसीलिए मुझे कभी रजिस्टर में नहीं लिखा गया। मैं इन घड़ों की रखवाली करती हूँ। मेरा नाम नहीं, तो मैं जाती नहीं।"

मैंने पूछा, "तुम्हारा नाम क्या है?"

वह रुकी। उसने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में कुछ ऐसा था जो बहुत पुराना था।

"सुशीला ने मुझे बुलाया था," उसने कहा। "उसने कहा था — 'तेरा नाम मैंने कहीं नहीं लिखवाया, इसलिए तू ज़िंदा रहेगी।' पर मेरा नाम था। मुझे याद है… कुछ… पर पूरा नहीं।"

उसने अपना हाथ मेरी तरफ़ बढ़ाया। "इसीलिए मैं तेरा इंतज़ार कर रही थी। तू मेरा नाम बोल दे।"

मैंने उसका हाथ पकड़ा। "कैसे?"

"तेरे पास कलम है," उसने कहा। "और तेरे पास स्याही है जो रजिस्टर नहीं पढ़ सकता। इसे मेरी हथेली पर लिख। अगर नाम सही हुआ, तो मैं जान जाऊँगी।"

मैंने कुप्पी खोली और कलम डुबोई। फिर उसकी हथेली पर लिखा — एक शब्द, जो मुझे उस पल कहाँ से आया, मुझे नहीं पता।

"सरोज।"

बूढ़ी औरत की हथेली काँपी। उसने अपनी हथेली देखी, फिर मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों से आँसू आए — दो बूँदें, सूखे गालों पर।

"नहीं," उसने कहा। "यह मेरा नाम नहीं है।" वह हँसी, एक छोटी सी हँसी। "मैं सरोज नहीं हूँ। सरोज तो तेरी मौसी है — जो हवेली के नीचे है। मैं उसकी सहेली हूँ। मेरा नाम… मेरा नाम…"

वह रुकी। उसने आँखें बंद कीं। "मुझे नहीं पता। सुशीला ने मुझे कभी नाम से नहीं बुलाया। वह मुझे 'बाई' कहती थी।"

काजल ने कहा, "बाई?"

बूढ़ी औरत ने उसकी तरफ़ देखा। "तू मुझे जानती है?"

काजल कुछ देर उसे देखती रही। फिर उसकी आँखें बड़ी हुईं। "तू… तू वही है जो अस्पताल की तीसरी मंज़िल पर रहती है?"

"हाँ। वहाँ से मैं यहाँ आती हूँ। हर रात। काम करने।"

काजल ने मेरी तरफ़ देखा। "माँ… मेरी माँ को बचाने वाली औरत…"

बूढ़ी औरत ने कहा, "तेरी माँ को मैंने नहीं बचाया। सुशीला ने बचाया। मैंने सिर्फ़ स्याही बनाई।"

वह रुकी, फिर बोली, "पर अब मैं तुम्हें एक बात बताऊँगी जो किसी को नहीं बताई। तुम्हारे दादा ने जब तुम्हारी माँ को रजिस्टर में लिखवाया था, तब मैं वहाँ थी। उसने उसका नाम लिखा और फिर कहा — 'इसका नाम अब यहीं रहेगा, और मेरी बेटी इसे कभी नहीं जानेगी।' उस रात सुशीला ने मुझसे कहा था कि एक दिन ऐसा आएगा जब हवेली के नीचे वाली औरत का नाम बोला जाएगा, और उस दिन ये घड़े खाली हो जाएँगे।"

मैंने कहा, "सरोज का नाम बोलने से?"

"हाँ। पर सरोज का नाम बोलने के लिए पहले उसे याद करना होगा — उसकी गली, उसकी आवाज़। और सरोज की आवाज़ सिर्फ़ एक आदमी याद रखता है।"

"कौन?"

"जिसने चालीस साल उसे सुना है। रामदीन।"

मैंने फोन निकाला। सिग्नल नहीं था। मैंने भैरों की तरफ़ देखा। "गाड़ी तक चल। फोन लगाना है।"

भैरों ने सिर हिलाया और गली की तरफ़ बढ़ा।

मैंने काजल के हाथ से पन्ना लिया और उसे कुप्पी के साथ अपनी जेब में रखा। फिर बूढ़ी औरत — बाई — की तरफ़ मुड़ी।

"तुम यहाँ अकेली मत रुको," मैंने कहा। "खरीदार भाग गया है, पर वह लौटेगा।"

"मैं चालीस साल से अकेली हूँ," बाई ने कहा। "एक रात और सह लूँगी। पर तू जो करने जा रही है, वह जल्दी कर। क्योंकि जब वह लौटेगा, तो अकेला नहीं आएगा।"

मैंने रिया का हाथ पकड़ा। "चल।"

हम गली से बाहर निकले। गाड़ी वहीं खड़ी थी। भैरों ने फोन उठाया और रामदीन का नंबर मिलाया। तीन रिंग के बाद आवाज़ आई।

मैंने फोन लिया। "रामदीन, सुन। तुझे सरोज की आवाज़ याद है?"

दूसरी तरफ़ चुप्पी। फिर रामदीन की आवाज़ आई, धीमी, काँपती। "क्यों पूछ रही है?"

"क्योंकि कल तक हमें उसका नाम बोलना है। और उसका नाम सिर्फ़ उसकी आवाज़ के साथ बोला जा सकता है।"

रामदीन ने कहा, "मैं चालीस साल से उसकी आवाज़ याद रखना चाहता था। पर हर बार जब बोलने की कोशिश की, मेरी आवाज़ रुक गई।"

"अब रुकेगी नहीं," मैंने कहा। "क्योंकि अब तेरे पास नाम है। कल सुबह हवेली के सामने। सबके सामने।"

फोन कटा।

मैंने गाड़ी में बैठते वक़्त पीछे देखा। पीतल गली का मोड़ अंधेरे में डूब रहा था। और उस अंधेरे में कुछ था — एक पतली परछाईं, जो दीवार के सहारे खड़ी थी और मेरी तरफ़ देख रही थी।

मैंने गाड़ी का दरवाज़ा बंद किया।

"भैरों," मैंने कहा, "हवेली।"

गाड़ी चली। रिया ने मेरा हाथ पकड़ा। काजल पीछे बैठी थी, स्याही से सने हाथों को अपनी जाँघों पर रखे हुए।

मैंने जेब में हाथ डाला। पीतल की तीनों गोलियाँ अब ठंडी थीं — एकदम ठंडी, जैसे कभी गरम थीं ही नहीं।

॥

गाड़ी हवेली की गली में घुसी और सामने खरीदार खड़ा था। अकेला नहीं — उसके पीछे दो आदमी थे, एक के हाथ में लोहे की छड़ थी जिससे वह सड़क की मिट्टी खुरच रहा था, दूसरा हाथ में एक टॉर्च दबाए हुए था — पर टॉर्च बंद थी, बस पकड़े हुए था, जैसे हथियार हो।

मैंने ब्रेक मारा। भैरों ने दरवाज़ा खोला और बाहर उतर गया। मैं भी उतरी। रिया पीछे बैठी रही, पर खिड़की का शीशा उसने नीचे कर दिया था, और मैंने देखा कि उसने रजिस्टर अपनी गोद में दोनों हाथों से दबा रखा है।

खरीदार ने अपनी जेब से पन्ना निकाला। वही पीला पन्ना, जिसके किनारे जले हुए थे और जिस पर बाबू हरनाम की आवाज़ कैद थी। उसने उसे हवा में लहराया।

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