A Dark Secret – Chapter 401
पीतल गली पुराने बाज़ार के उस हिस्से में थी जहाँ दिन में भी धूप नहीं पहुँचती। कारीगरों की गलियाँ — जहाँ कभी पीतल के बर्तन बनते थे। अब कुछ दुकानें बंद थीं, कुछ में सामान रखा था। गली इतनी सँकरी थी कि गाड़ी अंदर नहीं जा सकती थी।
मैं उतरी और आगे पैदल चल पड़ी। काजल मेरे पीछे आई। वह अपने आप पर काबू पाने की कोशिश कर रही थी — उसके कदम एक जैसे नहीं पड़ रहे थे।
गली के मोड़ पर एक पुरानी दीवार थी जिस पर नीली पुताई बाकी थी और उस पर पीतल का एक छोटा टुकड़ा लगा था। उस पर पीतल गली खुदा था। मैंने उसे उँगली से छुआ। पीतल ठंडा था।
रिया ने कहा, "यही है। यही वह जगह है जो सपने में थी।"
आगे चलकर गली का अंत आया। वहाँ एक लकड़ी का बड़ा दरवाज़ा था, रंग उतरा हुआ, जिस पर पीतल की दो कीलें लगी थीं। दरवाज़े के ऊपर कोई नंबर नहीं था, पर दीवार पर चूने से पाँच लिखा था — धुँधला, पर पढ़ा जा सकता था।
मैंने दरवाज़ा खटखटाया।
अंदर से कोई आवाज़ नहीं आई।
फिर एक पतली आवाज़ आई। "कौन?"
"मीरा जोशी," मैंने कहा। "सुशीला की बेटी।"
अंदर कुछ देर चुप्पी रही। फिर दरवाज़े के पीछे कुंडी खुलने की आवाज़ आई और दरवाज़ा खुला।
सामने एक बूढ़ी औरत खड़ी थी। बहुत छोटी, झुकी हुई, सफ़ेद बाल छोटे कटे हुए, आँखें धँसी हुईं, पर साफ़। हाथ में कपड़े में लिपटी कोई चीज़ थी। वह मुझे देखती रही, फिर काजल को देखा, और उसके चेहरे पर कुछ हिला।
"तू," उसने काजल से कहा। "तू बड़ी हो गई।"
काजल ने कुछ कहना चाहा, पर आवाज़ नहीं निकली।
बूढ़ी औरत ने दरवाज़ा पूरा खोल दिया। अंदर आँगन था — छोटा, गीला, बीच में वह गोल सूखी जगह जो कभी कुआँ रहा होगा, अब बंद। एक तरफ़ चूल्हा था, दूसरी तरफ़ मिट्टी के घड़े — आठ-दस बड़े घड़े, हर एक ढका हुआ।
"तू सुशीला की बेटी है," उसने कहा। वह मेरे पास आई और मेरा चेहरा देखने लगी। "तेरी माँ ने मुझे कहा था कि एक दिन तू आएगी। उसने कहा था कि तू पूछेगी कि सरोज कहाँ है।"
मैंने कहा, "तुम कौन हो?"
"मेरा कोई नाम नहीं," उसने कहा। "नहीं, ऐसा नहीं कहना चाहिए। मेरा नाम है — लेकिन रजिस्टर में कभी नहीं लिखा गया। मैं उन घड़ों में से हूँ जो बने, पर गिने नहीं गए।"
वह मुड़ी और आँगन के उस पार एक छोटे दरवाज़े की तरफ़ बढ़ी। "अंदर आओ। मैं तुम्हें वह दिखाऊँगी जो तुम्हारी माँ ने मेरे पास छोड़ा था।"
हम अंदर गए। कमरा छोटा था, दीवारें मिट्टी की, छत नीची। एक कोने में चारपाई थी, दूसरे में लकड़ी की अलमारी। और बीच में एक छोटी तिजोरी थी, जिसका रंग पीतल जैसा था।
बूढ़ी औरत ने तिजोरी खोली। अंदर एक कपड़े में लिपटी कोई चीज़ थी।
वह बोली, "तेरी माँ ने इसे मुझे दिया था। उस रात। जिस रात उसने रजिस्टर में तेरा नाम लिखवाया था।"
मेरे हाथ ठंडे पड़ गए। "मेरी माँ?"
"वह मेरे पास आई थी। उसके हाथ में एक पीला काग़ज़ था और उसने कहा — 'इसे किसी को मत देना। जब मेरी बेटी आए, इसे उसे दे देना।'"
उसने कपड़ा खोला। अंदर एक और पीली पुड़िया थी — छोटी, गाँठ बँधी — और एक स्याही से भरा छोटा पीतल का कुप्पी।
"यह स्याही नहीं है," बूढ़ी औरत ने कहा। "यह वह स्याही है जो रजिस्टर नहीं पढ़ सकता। इसे मैंने तेरी माँ के लिए बनाया था। इससे जो लिखा जाए, वह रजिस्टर में नहीं जाता। वह बाहर रहता है।"
मैंने वह कुप्पी उठाई। उसका ढक्कन खोला। अंदर काली स्याही थी जिसमें से वह पुरानी गोंद जैसी महक उठी — पर हल्की, साफ़, जैसे बारिश के बाद मिट्टी।
काजल ने कहा, "इससे मैं अपनी याद वापस लिख सकती हूँ?"
बूढ़ी औरत ने उसकी तरफ़ देखा। "तू अपनी याद में जो खो चुकी है, उसे दोबारा नहीं लिख सकती। पर जो अभी टूटा नहीं, उसे बचा सकती है।"
तभी बाहर गली से आवाज़ आई।
भैरों का हाथ पहले ही दरवाज़े की तरफ़ बढ़ चुका था। उसने दरवाज़े की झिरी से बाहर देखा। फिर मेरी तरफ़ मुड़ा।
"वह आदमी," उसने कहा। "काला कोट, चश्मा। वह गली के मोड़ पर खड़ा है। और उसके हाथ में एक पन्ना है।"
मैंने कुप्पी काजल के हाथ में दी। "इसे रिया के पास रख।"
फिर मैं दरवाज़े की तरफ़ बढ़ी।
बूढ़ी औरत ने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी पकड़ सूखी और मज़बूत थी। "वह पन्ना जो उसके हाथ में है — वह बाबू हरनाम की आवाज़ है। मैंने इसे बनते देखा था, चालीस साल पहले। उस पन्ने पर बाबू ने खुद अपनी आवाज़ बोली थी, जब वह ज़िंदा था। उसमें सौदे की आख़िरी शर्त लिखी है — वह शर्त जो किसी को याद नहीं।"
"कौन सी शर्त?"
"यही कि सौदा तोड़ने वाले को उस वक़्त शहर में मौजूद हर उस आदमी का नाम याद होना चाहिए जो इस सौदे से जुड़ा है — ज़िंदा हो या मरा। एक भी नाम छूटा, और सब उसी वक़्त उलट जाएगा। उसके नाम के साथ जाएगा।"
मैंने दरवाज़ा खोला।
खरीदार गली के मोड़ पर खड़ा था। उसके हाथ में वह पन्ना था — पीला, मुड़ा हुआ, किनारों से जला। उसने पन्ना ऊपर उठाया और मेरी तरफ़ देखा।
"आपने मुझे रखवाला बना दिया," उसने कहा। उसकी आवाज़ में वह मिठास नहीं थी जो काजल की थी, बस एक सूखापन था। "बहुत चालाकी थी। पर याद रखिए — रखवाले के पास जो है, वह रजिस्टर का है। और यह पन्ना रजिस्टर का नहीं है। यह बाबू हरनाम की आवाज़ है। यह अलग है।"
काजल मेरे पीछे आई। "तूने इसे कहाँ से लिया?"
खरीदार ने कहा, "यह तुम्हारे दादा ने मुझे दिया था। मरने से पहले। उन्होंने कहा था — 'जब यह पन्ना खुलेगा, तब मेरा काम पूरा होगा।'"
उसने पन्ना थोड़ा और ऊपर उठाया।
और फिर वह ज़ोर से बोला — एक ऐसी आवाज़ में जो बाबू हरनाम की थी, पर बूढ़ी और टूटी — "पहला नाम… सुशीला जोशी।"
गली की दीवारों पर स्याही उभर आई। मैंने अपनी आँखों के सामने देखा — पत्थर पर, ईंट पर, चूने पर — तीन शब्द, गीले, काली स्याही में।
"अब दूसरा," खरीदार ने कहा। "हरि हरनाम सिंह।"
दीवारें फिर उभरीं।
"तीसरा," उसने कहा, और इस बार वह मेरी तरफ़ देखकर बोला। "मीरा जोशी।"
मेरे पैरों के नीचे की ज़मीन हिली। मैंने दीवार पर देखा — मेरा नाम अपने आप लिखा जा रहा था, बिना किसी हाथ के।
भैरों मेरी तरफ़ बढ़ा। "मीरा!"
मैंने काजल की तरफ़ हाथ बढ़ाया। "कुप्पी दे।"
काजल ने रिया से कुप्पी लेकर मेरी तरफ़ बढ़ाई। मैंने उसे लिया और पीतल गली के पत्थर पर झुकी। मेरी जेब से पीतल की कलम निकाली — वही जो बेंच के नीचे से मिली थी — और कुप्पी में डुबोई।
फिर मैंने पत्थर पर, मेरे नाम के ठीक नीचे, उस स्याही से एक लाइन लिखी — "यह नाम मेरा है। इसे कोई नहीं उठा सकता।"
जैसे ही कलम उठाई, दीवार से मेरा नाम मिटने लगा, धुँधला पड़ने लगा, और जो पत्थर पर मैंने लिखा था वह चमक उठा।
खरीदार तीन क़दम पीछे हटा।
"यह स्याही…" उसने कहा। "यह कहाँ से आई?"
बूढ़ी औरत दरवाज़े पर आ गई थी। उसने कहा, "यह वह स्याही है जो तुम्हारे बाबू ने कभी नहीं चखी। इसे मैंने बनाया था — चालीस साल पहले, एक औरत के कहने पर जिसे तुम्हारे बाबू ने डरा नहीं पाया था।"
खरीदार ने पन्ना कसकर पकड़ा और पीछे मुड़ा। वह गली के मोड़ की तरफ़ भागा, पर भैरों पहले ही उसके रास्ते में खड़ा था।
भैरों ने हाथ बढ़ाया। "पन्ना दे।"
खरीदार ने पन्ना सीने से लगाया। "यह तुम्हारा नहीं।"
"पन्ना दे," भैरों ने दोहराया, और इस बार उसकी आवाज़ में वह शांति थी जो पहले कभी नहीं थी। "मैंने चालीस साल तुम्हारे जैसे आदमियों को देखा है। तुम सब एक जैसे हो — तुम सोचते हो कि काग़ज़ तुम्हें बचा लेगा।"
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