A Dark Secret – Chapter 400
मैंने रिया का हाथ छोड़ा और भैरों की तरफ़ मुड़ी। "अस्पताल चल। उस बूढ़े के पास। तीस मिनट में।"
काजल ने कहा, "मैं साथ चलूँगी।"
"नहीं," मैंने कहा। "तू यहाँ रुक। तेरे पास कलम है, तेरे पास याद है — जो तुझे अभी-अभी आई है। उसे लिख। दीवार पर। जो भी याद आए।"
काजल मेरी तरफ़ देखती रही।
"तू मेरे साथ चलेगी," मैंने कहा, "तो तेरा पन्ना फिर जल सकता है। यहाँ रुक, और लिख। कल तक तेरे पास इतना होना चाहिए कि तू अपना पूरा नाम बोल सके।"
काजल ने कलम उठाई।
भैरों गाड़ी की तरफ़ चल दिया। मैं रिया के पास झुकी। "तू अंदर जा। सुधा के पास रह। जो भी लिखा जाए, मत पढ़ना। सिर्फ़ लिखने देना।"
"माँ," रिया ने कहा, "तू लौटेगी ना?"
"हाँ," मैंने कहा। "और लौटते वक़्त जो नाम लाऊँगी, वह सबसे बड़ा नाम होगा।"
मैं गाड़ी में बैठी। भैरों ने गाड़ी घुमाई। पीछे, आँगन में, काजल ने दीवार पर पहला शब्द लिखा। और जैसे ही पहला शब्द लिखा, उन दोनों पीतल की गोलियों में — जो अभी तक मेरी जेब में चुप थीं — एक हल्की गरमाहट आई, जैसे किसी ने उन्हें छूकर छोड़ दिया हो।
मैंने जेब में हाथ डालकर उन्हें सहला दिया। और गाड़ी अस्पताल की तरफ़ भागने लगी।
॥
गाड़ी अस्पताल के गेट पर रुकी और मैंने देखा कि गेट पर ताला लगा है। भैरों ने हॉर्न दिया। अंदर से कोई नहीं आया। मैंने जेब में हाथ डाला — दोनों पीतल की गोलियाँ अब भी गरम थीं, पर हल्की, जैसे बुखार उतर गया हो।
"तीस मिनट कहकर गए थे," भैरों ने कहा। "पैंतालीस हो गए।"
मैंने गाड़ी से उतरकर गेट के अंदर से झाँका। इमरजेंसी वार्ड की बत्ती जल रही थी, पर बरामदे में कोई नहीं था। जिस बूढ़े के पास हम लौट रहे थे, उसके बिस्तर की तरफ़ देखा — वहाँ चादर बिखरी थी और बिस्तर खाली था।
भैरों मेरे पीछे आ गया। "बिस्तर खाली है।"
"दिख रहा है।"
मैं सीढ़ियों से चढ़ी। दूसरी मंज़िल के वार्ड का दरवाज़ा खुला था, अंदर बारह बिस्तरों में से कुछ पर मरीज़ सो रहे थे। मैं सीधी उस आख़िरी बिस्तर तक गई। तकिया के नीचे एक काग़ज़ दबा था। मैंने खींचा। उस पर किसी की लिखाई में सिर्फ़ एक लाइन थी — "जो नाम तुमने पूछा, वह मेरे पास नहीं है। पर जो नाम तुमने कभी पूछा ही नहीं, वह मेरे पास था। — बारह"
भैरों ने काग़ज़ पढ़ा। "यह क्या बकवास है?"
मैंने काग़ज़ जेब में रखा। "यह बकवास नहीं है। यह आदमी भाग नहीं गया। इसे उठा लिया गया। और उठाने वाला जानता था कि हम आ रहे हैं।"
तभी मेरा फोन बजा। रिया का नंबर था।
"माँ, तू कहाँ है?" उसकी आवाज़ तेज़ थी, पर वह डर नहीं रही थी। वह कुछ बताने की जल्दी में थी।
"अस्पताल में। बूढ़ा नहीं मिला। तुम वहाँ सब ठीक?"
"माँ, मुझे सपना आया था।"
मैं रुकी। भैरों मेरी तरफ़ देखने लगा।
"सपना?"
"उस रात भी आया था जब तू पहली बार हवेली गई थी। मैंने तुझे बताया नहीं, क्योंकि तब सब उलझा हुआ था। सपने में एक गली थी — सँकरी, पत्थर की, दोनों तरफ़ पुरानी दीवारें। गली के मोड़ पर एक दीवार पर नीली पुताई थी, और उस पर पीतल का एक टुकड़ा लगा था। मैंने सपने में पढ़ा था — पीतल गली। और माँ, उस गली में मनोहर की कोठरी थी। वही कोठरी जहाँ हम आज गए थे।"
मैंने भैरों की तरफ़ देखा। भैरों की आँखें सिकुड़ी।
"तुम्हें यह अब क्यों याद आया?" मैंने पूछा।
"क्योंकि अभी-अभी सुधा नानी ने दीवार पर लिखना शुरू किया, और जैसे ही उसने पहला अक्षर लिखा, मुझे वह गली फिर दिखी। इस बार वहाँ एक बूढ़ी औरत खड़ी थी, जिसके हाथ में स्याही का घड़ा था। उसने मुझे देखा और बोली — 'तेरी माँ को बता देना, मेरी गली का नाम कभी नहीं बदला।'"
मेरे हाथ में फोन था और मैं उसी वक़्त गाड़ी की तरफ़ चल पड़ी।
"भैरों, अस्पताल से हवेली। अभी।"
"बूढ़ा?"
"बूढ़ा गया। उसे कोई उठा ले गया। हमें काजल के पास जाना है।"
गाड़ी हवेली के पिछले दरवाज़े पर रुकी। आँगन की दीवार पर काजल ने चार लाइनें लिख दी थीं। वह हाथ में कलम पकड़े खड़ी थी, माथे पर पसीना था। सुधा उसके पीछे बैठी थी और रिया दरवाज़े के पास।
मैंने बूढ़े का लिफ़ाफ़ा जेब से निकाला और खोला। उसमें पच्चीस नामों की सूची थी, और सबसे नीचे एक लाइन — "पीतल गली, मकान नंबर पाँच — बाबू हरनाम सिंह।"
मैंने वह पन्ना काजल के सामने रखा।
"यह गली कौन सी है?"
काजल ने पन्ने पर नज़र डाली। उसका चेहरा एक पल के लिए साफ़ हुआ, फिर सिकुड़ गया।
"पीतल गली," मैंने कहा। "यह कहाँ है?"
काजल ने आँखें बंद कर लीं। "मुझे… मुझे पता है। मैं जानती हूँ।" उसने माथा पकड़ लिया। "बाबू… बाबू मुझे वहाँ ले जाते थे। छोटी थी तब। एक दरवाज़ा था, लकड़ी का, और अंदर आँगन में सूखी गोल जगह…"
वह रुकी। उसकी आँखें खुलीं और उनमें कुछ भी नहीं था।
"मुझे याद नहीं आ रहा," उसने कहा। "मैं जानती हूँ कि मैं जानती हूँ, पर कुछ है ही नहीं।"
उसने फिर कोशिश की। "पीतल गली… पीतल गली का मोड़…"
उसका सिर झुक गया। "दर्द हो रहा है।"
सुधा ने कलम उसके हाथ से ले ली। "बैठ जा।"
"मैं ठीक हूँ।"
"बैठ," सुधा ने कहा, और इस बार उसकी आवाज़ में वह बात थी जो बहस नहीं करती। "यह रजिस्टर का असर है। जो रखवाला है, उसके याद से भी नाम मिटते हैं। तू चालीस साल से हवेली की रखवाली कर रही है, और रजिस्टर ने तेरे अंदर से वे जगहें निकाल दी जो उसके काम की नहीं थीं। तू जानती है कि पीतल गली है, पर तेरी याद में उसका रास्ता नहीं है।"
काजल दीवार के सहारे बैठ गई। मैंने रिया की तरफ़ देखा। वह दरवाज़े के पास खड़ी थी, आँखें बड़ी।
"तूने सपने में जो देखा," मैंने उससे कहा, "वह किसी और की याद नहीं थी। वह उस बूढ़ी औरत की याद थी जो मुझे रात में मिली थी — जिसके हाथ में पीतल की कलम थी। उसने तुझे अपनी गली दिखाई।"
रिया ने कहा, "तो वह औरत कौन है?"
"वह वही है जिसके पास पीतल गली, मकान नंबर पाँच की चाबी है," मैंने कहा। "और वही है जिसने चालीस साल हरनाम के लिए स्याही बनाई है।"
सुधा ने मेरी तरफ़ देखा। "तू उससे मिली?"
"नहीं। पर वह मुझे चौराहे पर मिली थी — उसने गाड़ी रोकी थी और कहा था कि उसका नाम कभी लिखा ही नहीं गया।"
भैरों ने कहा, "तो चलो।"
"रुक," मैंने कहा। "पहले एक बात।" मैंने काजल के सामने झुककर उसका हाथ पकड़ा। "तेरा दादा मकान नंबर पाँच में रहता था?"
काजल ने आँखें ऊपर कीं। "हाँ।"
"वही घर जहाँ अब स्याही बनाने वाली औरत रहती है?"
काजल ने मुझे देखा। कुछ देर वह चुप रही। फिर उसके होंठ हिले।
"हाँ। मुझे याद है… वह घर के पिछले हिस्से में रहती थी। बाबू उसे कभी बुलाते नहीं थे। वह चुपचाप घड़े भरती थी और चली जाती थी।"
मैं खड़ी हो गई। "तो अब चल।"
हम चारों — मैं, रिया, काजल, भैरों — हवेली के आँगन से बाहर निकले। सुधा ने कहा, "मैं यहीं रुकती हूँ। तुम नाम लेकर आओ, मैं बोलूँगी।" मैंने उसकी तरफ़ देखा। "तेरा नाम?"
"मेरा नाम चालीस साल से नहीं उठा," सुधा ने कहा। "मैं कुछ देर और रुक सकती हूँ। तुम जाओ।"
बाहर पुराने बाज़ार की सड़कें खाली थीं। भैरों गाड़ी लेकर आया। रिया पीछे बैठी, काजल उसके साथ। मैं आगे। भैरों ने गाड़ी घुमाई।
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