A Dark Secret – Chapter 399
"रिया, सुन। दीवार पर जो लिखा है, वह मत पढ़।"
"पढ़ना नहीं है," रिया ने कहा। "मैं देख रही हूँ। स्याही खुद फैल रही है, जैसे किसी ने नाम लिखा हो और उँगली से पोंछ दिया हो।"
"काजल कहाँ है?"
"वहीं है। वह दीवार के सामने बैठी है और कह रही है कि उसे कुछ याद आ रहा है।"
"क्या?"
"नहीं बता रही। बस यह कह रही है कि वह पन्ना याद आ रहा है। जो उसने जलाया था।"
मेरा हाथ स्टीयरिंग पर कस गया। "रिया, सुन — काजल से कह कि कुछ भी मत बोले। जब तक मैं न पहुँचूँ, कुछ नहीं।"
"वह नहीं मान रही," रिया ने कहा। "वह बोल रही है — मुझे याद आ रहा है कि उस पन्ने पर क्या था।"
"क्या?"
"वह कह रही है — 'सुशीला' के नीचे एक और नाम था।"
भैरों ने मेरी तरफ़ देखा, सड़क पर आँखें, पर सुन रहा था।
"कौन सा नाम?" मैंने पूछा।
"वह नहीं बता रही," रिया ने कहा। "वह रो रही है।"
मैंने फोन बंद किया। भैरों ने गाड़ी तेज़ की।
रास्ते में मैंने लिफ़ाफ़ा खोला और फिर से आख़िरी पन्ना देखा। "हरि हरनाम सिंह, पीतल गली।" मैंने उस पन्ने को पलटा। पीछे कुछ सूखी स्याही में लिखा था, जो पहली नज़र में चला गया था।
"यह नाम जिसने लिखा, उसे बाबू ने बाद में मिटाया। पर मिटाने से पहले उसने एक चीज़ बचाई — गली। गली मिटाने की कोशिश नहीं की गई। क्यों? क्योंकि बाबू को लगा कि गली से कोई कुछ नहीं कर सकता। गली तो बस एक पता है। पर वह भूल गया — पता और आवाज़, दोनों साथ चाहिए।"
नीचे, बहुत छोटे अक्षरों में, कुछ और था जो मैंने पहले नहीं देखा था — "मकान नंबर पाँच"।
मैंने भैरों की तरफ़ देखा। "पीतल गली में मकान नंबर पाँच किसका है?"
"वही जो हमने खोजा था," भैरों ने कहा, बिना गाड़ी की रफ़्तार कम किए। "वह जगह जहाँ चालीस साल से स्याही बनती है। बूढ़ी औरत का मकान।"
"तो बाबू का असली पता वही है," मैंने कहा। "वह उसी मकान में रहता था जहाँ स्याही बनती थी।"
भैरों चुप रहा, और उसका चुप रहना हाँ में था।
हवेली के बाहर पहुँचते वक़्त बारिश तेज़ हो गई थी। मैंने खिड़की से झाँका। आँगन में दीवार पर स्याही फैली हुई थी, और काजल उसके नीचे बैठी थी, हाथ में पीतल की कलम। सुधा उसके पास खड़ी थी, और रिया दरवाज़े पर।
मैंने गाड़ी से उतरते ही रिया को पुकारा। "रिया रुक जा। तू दरवाज़े पर खड़ी रह।"
"माँ —"
"दरवाज़े पर। बाहर मत आना।"
मैं आँगन में पहुँची। काजल ने मेरी तरफ़ देखा। उसके हाथ में कलम काँप रही थी।
"वह नाम," मैंने कहा। "बोल।"
"नहीं बोल सकती," काजल ने कहा। "जैसे ही बोलूँगी, नाम चला जाएगा।"
"किसका नाम?"
"मेरा," काजल ने कहा। "वह नाम मेरा था। पन्ने पर। सुशीला के नाम के साथ जुड़ा हुआ।"
मेरे पैर जम गए। "मतलब?"
"मेरा नाम भी उस पन्ने पर था," काजल ने कहा। "जो मैंने जलाया। मैंने सोचा था कि मैं सिर्फ़ सुशीला का नाम जला रही हूँ। पर उस पन्ने पर दो नाम थे — सुशीला का और मेरा।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "मेरा नाम मेरे ही हाथ से जल गया।"
सुधा ने कहा, "इसलिए तुझे पन्ना याद नहीं आ रहा था।"
"हाँ," काजल ने कहा। "जो पन्ना तूने जलाया, वह तेरा ही पन्ना था।"
काजल का हाथ काँप रहा था। उसने पीतल की कलम नीचे रख दी और दोनों हाथ घुटनों पर रखकर बैठ गई। बारिश की बूँदें उसके बालों पर गिर रही थीं।
मैंने जेब से बूढ़े का लिफ़ाफ़ा निकाला। "काजल," मैंने कहा। "यह लिफ़ाफ़ा मिला है। इसमें आख़िरी पन्ने पर तेरे दादा की गली लिखी है — पीतल गली, मकान नंबर पाँच।"
काजल ने सिर उठाया। "नंबर पाँच?"
"हाँ।"
"वह तो…" वह रुकी। "वह तो सुशीला का मकान था।"
मैंने सुधा की तरफ़ देखा। सुधा के चेहरे पर वह भाव आया जो सिर्फ़ उस वक़्त आता है जब कोई बहुत पुरानी गाँठ खुलती है।
"तो बाबू ने अपनी गली नहीं लिखी," मैंने कहा। "उसने अपनी गली की जगह तेरी माँ के मकान का पता लिखा। वह उसके घर में रहता था।"
काजल ने कुछ कहना चाहा, पर सुधा ने उसे रोका। "चुप," सुधा ने कहा। "अब जो बोलना है, वह मैं बोलूँगी।"
उसने मेरी तरफ़ देखा। "उस लिफ़ाफ़े में एक नाम है — वह नाम जो सबसे आख़िर में है, हरि हरनाम सिंह। पर उसके साथ एक और नाम जुड़ा है जो किसी को नहीं दिखा।"
"कौन सा?"
"मेरी माँ का," सुधा ने कहा। "वह नाम उस पन्ने पर नहीं लिखा। वह नाम उस लिफ़ाफ़े की जिल्द के अंदर लिखा है — जो कोई नहीं पढ़ता।"
मैंने लिफ़ाफ़े की तरफ़ देखा। जिल्द अंदर से खुली हुई थी, काग़ज़ की परत के नीचे एक पतली लकीर थी। मैंने उसे नाखून से खोला। परत के नीचे, स्याही से, एक नाम लिखा था।
"सरोज," मैंने पढ़ा।
काजल ने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखें फैल गईं।
"सरोज?" उसने कहा। "वह तो… वह तो कुएँ के नीचे रहती है।"
सुधा ने कहा, "हाँ। और वह नाम तेरे दादा ने नहीं लिखा था। उस नाम को किसी और ने लिखा था — जो उस वक़्त हवेली में था।"
मैंने सुधा की तरफ़ देखा। "कौन?"
सुधा ने काजल की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़। "मनोहर," उसने कहा। "मनोहर ने सरोज का नाम उस लिफ़ाफ़े में लिखा था, चालीस साल पहले। क्योंकि सरोज ने उसे हवेली से बाहर निकलने का रास्ता दिया था। और मनोहर ने बदले में उसका नाम कहीं ऐसी जगह लिख दिया जहाँ कोई नहीं देखता।"
भैरों ने आँगन के दरवाज़े से कहा, "तो सरोज का नाम कभी मिटा नहीं। वह बस कहीं छिपा हुआ है।"
मैंने काग़ज़ को हवा में लहराया। "और अगर यह नाम मिल गया, तो सरोज का नाम वापस आ सकता है। और अगर सरोज का नाम वापस आया, तो उसके साथ वह सब आएगा जो उसने चालीस साल में देखा — हवेली की हर लाइन, रजिस्टर का हर पन्ना, हर तारीख़।"
सुधा ने कहा, "इसीलिए मनोहर ने इसे छिपाया था। वह जानता था कि सरोज का नाम मिलते ही हवेली का पूरा सच बाहर आ जाएगा।"
काजल धीरे-धीरे उठी। "मैं उससे मिलूँगी।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। "क्यों?"
"क्योंकि उसने मेरी माँ को बचाया था," काजल ने कहा। "और मैंने उसे कभी नहीं देखा। चालीस साल में एक बार भी नहीं।"
वह रुकी। उसकी आँखों में वह कुछ आया जो बहुत दिनों से बंद था।
"वह मेरी बुआ है," काजल ने कहा। "और मेरे दादा ने उसे ज़िंदा दफ़ना दिया था — हवेली के नीचे।"
बारिश रुक गई थी। आँगन की दीवार पर स्याही सूख रही थी। रिया दरवाज़े पर खड़ी थी, हाथ में कुछ छोटा पकड़े हुए। मैंने उसे इशारा किया कि आ जाए।
"माँ," रिया ने कहा, और उसकी आवाज़ धीमी थी। "दीवार पर जो लिखा है, वह पढ़ने में आ गया है।"
मैंने पीछे देखा। दीवार पर सिर्फ़ एक शब्द था, छोटा, साफ़ — "देर"।
और उसके नीचे, उसी स्याही से, एक तारीख़।
मैंने रिया का हाथ पकड़ा। "यह तारीख़ कल की है," मैंने कहा। "कल तक वक़्त है।"
सुधा ने कहा, "किस बात का?"
मैंने बूढ़े का लिफ़ाफ़ा उठाया और उसे जेब में रखा। "उस नाम का," मैंने कहा। "जो सरोज का है। कल तक हमें वह नाम बोलना है, और उसके बाद जो होगा — वह हवेली के नीचे वाली औरत के हाथ में है।"
भैरों ने कहा, "तो पहले तुम उस बूढ़े के पास क्यों जा रही थी?"
"क्योंकि," मैंने कहा, "वह मरने से पहले मुझे एक नाम बता सकता है। और वह नाम शायद सरोज का नाम है — जो उसे याद है, और जो उसने मनोहर के कहने पर लिखा था।"
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