A Dark Secret – Chapter 398
"मेरा नाम भी किसी दूसरे के हिस्से में जुड़ा हुआ था," वह बोला। "बाबू ने बड़ी चालाकी से लिखा था — हर नाम एक नाम के साथ। देने वाले का नाम लेने वाले के नाम के साथ, दुगना, दोनों गायब। इसलिए मेरे नाम का कोई अलग वजूद ही नहीं बचा था।"
"तो आपकी जान इस कमरे के काग़ज़ों में है?" मैंने पूछा।
"मैंने तुमसे यह नहीं कहा," उसने कहा, और पहली बार उसकी आवाज़ में कुछ खटका।
"कहने की ज़रूरत नहीं," भैरों ने पीछे से कहा। "आपकी कलाई का धागा चादर पर टिक रहा है। जब मैंने दरवाज़ा खोला, यह चादर के साथ चला। यह जगह छोड़ते ही आपकी साँस रुकेगी। साफ़ दिख रहा है।"
बूढ़े ने भैरों की तरफ़ देखा। "तू कौन है?"
"भैरों।"
"भैरों…" उसने नाम चबाया। "भैरों… तेरे बाप का नाम भैरों था क्या?"
"मेरा नाम भैरों है," भैरों ने कहा, ठंडे ढंग से।
बूढ़ा हँसा। "नहीं, मुझे याद आ रहा है। चालीस साल पहले एक आदमी था, इसी शहर में, जिसके हाथ में बहुत तेज़ चलने की आदत थी, और उसका एक ही काम था — हरनाम के नए घरों के दरवाज़ों पर स्याही पोतना। उसे सब भैरों कहते थे। तेरे बाप?"
"मुझे नहीं मालूम," भैरों ने कहा, पर उसकी आवाज़ में वह ज़ोर नहीं था जो पहले था।
बूढ़े ने मेरी तरफ़ देखा। "तू लेने आई है?"
"हाँ।"
"क्या?"
"आपके पास जो है। नाम। सूची। गली। तारीख़। सब।"
"क्यों?"
"क्योंकि आगे आपके पास यह नहीं रहेगा," मैंने कहा। "जब आपकी कलाई का धागा कस जाएगा, यह सूची भी किसी और के हाथ जाएगी। और वह कोई जिसे बोलने की हिम्मत हो, नहीं होगा।"
वह कुछ देर चुप रहा। उसका हाथ चादर के नीचे घूमा, जेब की तरफ़ गया, और फिर बाहर आया। हाथ में एक मोटा लिफ़ाफ़ा था, किनारों से फटा, ऊपर से एक रबर बैंड लिपटा।
"यहाँ है," उसने कहा। "पच्चीस नाम। बीस-पच्चीस साल की मेहनत। सब बिना गली के। मैंने गली कभी नहीं लिखी, क्योंकि गली से पकड़ में आ जाते।"
मैंने लिफ़ाफ़ा लिया। रबर बैंड उतारा। अंदर काग़ज़ों की गड्डी, पुराने पीले पन्ने, कुछ पर नाम साफ़, कुछ पर आधे। हर नाम के नीचे तारीख़। कोई गली नहीं।
"इसमें से कितने अब तक ख़त्म हो चुके?" मैंने पूछा।
"सब," उसने कहा। "इसीलिए यह लिफ़ाफ़ा मरने से पहले तुझे दे रहा हूँ। मरे हुए नामों की सूची है। किसी काम की नहीं। सिवाय एक के।"
"कौन?"
"आख़िरी पन्ना," उसने कहा। "पलट।"
मैंने पन्ने उलटे। आख़िरी पन्ना सबसे पतला था, दो तह का, और उस पर एक ही नाम था — "हरि हरनाम सिंह"। नीचे गली लिखी थी — "पीतल गली"। और नीचे, स्याही में, बाबू हरनाम की मुहर।
"यह तो हमें पहले से पता है," मैंने कहा। "यह तो रजिस्टर में है।"
"रजिस्टर में नाम है," बूढ़े ने कहा। "पर रजिस्टर में गली नहीं है। बाबू ने अपनी गली कभी रजिस्टर में नहीं लिखी। उसे डर था कि अगर कोई उसका नाम-गली-आवाज़ बोल दे, तो वह चला जाएगा। इसलिए गली सिर्फ़ मेरे पास थी। अब तेरे पास है।"
"आवाज़?"
"वह सबसे बड़ी चीज़ है," बूढ़े ने कहा। "और वह मेरे पास कभी नहीं थी। मैंने बाबू की आवाज़ सुनी है — टेप पर, हवेली में। पर असली आवाज़ नहीं सुनी। तुझे उसकी असली आवाज़ चाहिए।"
"कहाँ मिलेगी?"
वह हँसा, और इस बार हँसी के साथ एक छोटी सी खाँसी आई, जिसमें खून था। उसने उसे पोंछा। "वह औरत जो राख पर स्याही डाल रही है," उसने कहा। "सुधा। उसकी माँ ने बाबू की आवाज़ कभी सुनी थी। वह इकलौती औरत है जो उसकी आवाज़ बोल सकती है, और जो ज़िंदा है।"
"सुधा की माँ मर चुकी हैं," मैंने कहा।
"तो फिर सुधा," उसने कहा। "वह अपनी माँ की याद में उसकी आवाज़ रखती है। हर बच्चा अपनी माँ की आवाज़ रखता है, चाहे कुछ और भूल जाए।"
मैंने लिफ़ाफ़ा बंद किया। उसने फिर कुछ कहना चाहा, पर रुक गया।
"बोलिए," मैंने कहा।
"जब तुम उससे बात करो," वह बोला, "मेरा नाम भी पूछ लेना। मुझे याद नहीं। मुझे याद करने के लिए… कुछ चाहिए। एक चीज़।"
"क्या?"
"पता नहीं," उसने कहा। "कुछ भी। जो मेरा हो। जो मेरा लगे।"
वह अपनी जेब में हाथ डालकर कुछ टटोलने लगा। धीरे-धीरे, आँखें बंद करके। फिर उसने एक छोटी चीज़ निकाली — पीतल की एक गोली, उतनी ही छोटी और चपटी जितनी मेरे पास थीं, पर उस पर कुछ खुदा नहीं था, बस खुरदुरी सतह।
"यह," उसने कहा। "यह मेरी गोली है। कोई नाम नहीं है इस पर। इसलिए मैं इसे पकड़कर अपना नाम बोल सकता हूँ। पर बोलने के लिए मुझे किसी और का नाम चाहिए जो याद दिलाए।"
"आप अपना नाम बोलिए," मैंने कहा। "हम सुनेंगे।"
"नहीं," उसने कहा। "मैं नहीं बोल सकता। मेरा नाम जानता है कौन? कोई नहीं।"
तभी भैरों आगे आया। उसने मेरी तरफ़ देखा, फिर बूढ़े की तरफ़। "खाली गोली मत पकड़ो," वह बोला। "रामदीन ने भी खाली गोली पकड़ी थी। उसके साथ सरोज की गोली थी — जिसका नाम उससे जुड़ा था। आपके साथ किसकी गोली है?"
बूढ़े की आँखें एक पल के लिए चमकीं। "किसी की नहीं," उसने कहा। "मैंने किसी से जोड़ा नहीं।"
"तो फिर कोई भी आपका नाम नहीं बोल सकता," भैरों ने कहा।
वह चुप हो गया, और इस बार उसका चुप होना अलग था — न खाली, न थका हुआ, बस कोई छोटी सी हार। उसने गोली चादर पर रख दी। "तो ऐसा ही है," उसने कहा।
तभी बाहर से स्ट्रेचर की आवाज़ आई — वही पुराना स्ट्रेचर, जिसका पहिया बाईं तरफ़ खींचता था। भैरों दरवाज़े की तरफ़ मुड़ा। अनिता आई, हाथ में आधा खुला रजिस्टर, और उसके पीछे सुमित्रा।
"मीरा," अनिता ने कहा, "रिया की फोन आई है। उसने कहा कि काजल ने आँगन की दीवार पर स्याही से कुछ लिखा है और अब वह पढ़ नहीं पा रही।"
"क्या लिखा है?"
"रिया कहती है — मैं नहीं पढ़ सकती, आँखों के आगे स्याही फैल रही है।"
मैंने भैरों की तरफ़ देखा। उसने सिर हिलाया। हम दोनों जानते थे — अस्पताल से निकलते ही बूढ़ा मर जाएगा। पर हवेली में कुछ हो रहा था।
"आप चलिए," बूढ़े ने कहा, अचानक, साफ़ आवाज़ में। "मैं यहीं रहूँगा। तीस मिनट है मेरे पास। तीस मिनट में तुम वापस आ जाओ।"
"तीस मिनट?" मैंने पूछा।
"यह धागा," उसने कलाई दिखाई, "हर बार जब रजिस्टर में कोई लाइन जुड़ती है, एक इंच कसता है। अभी सिर्फ़ दो उँगली खुली हैं। जब पूरा कस जाएगा, मेरी साँस चली जाएगी। मैंने हिसाब लगाया है — तीस मिनट।"
मैंने लिफ़ाफ़ा जेब में रखा। "मैं लौटूँगी," मैंने कहा।
"लौटना ज़रूरी नहीं," वह बोला। "पर एक बात करना। उस लड़की से — सुधा से — कहना कि बाबू की आवाज़ याद आए तो मुझ तक पहुँचाए। मेरा नाम उससे पूछे। मैं भूल गया हूँ।"
"नाम कैसे याद आएगा?"
"जब वह बाबू की आवाज़ बोलेगी," उसने कहा, "तब मुझे शायद अपनी आवाज़ याद आ जाए। और अपनी आवाज़ से अपना नाम।"
मैंने सिर हिलाया। भैरों पहले बाहर निकला। मैं उसके पीछे थी, और दरवाज़े पर रुकी।
"आपका नाम क्या था?" मैंने पूछा।
वह देर तक चुप रहा। फिर बोला, "मुझे तो यह भी नहीं पता कि मेरा नाम था या नहीं।"
मैं दरवाज़े से बाहर निकली। सीढ़ियाँ उतरते वक़्त मेरे पीछे वह फिर बोला, पर आवाज़ इतनी धीमी थी कि मैंने सुना नहीं, बस जाना कि कुछ बोला गया।
अस्पताल के बाहर बारिश शुरू हो चुकी थी, हल्की, वह बारिश जो सिर्फ़ धूल दबाती है और सड़क पर चिकनाहट छोड़ देती है। भैरों ने गाड़ी स्टार्ट की। मैंने रिया को फोन लगाया।
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